खतरा कोकरोच नहीं प्रचंड गर्मी है

खतरा कोकरोच नहीं प्रचंड गर्मी है

भारत को खतरा कोकरोच से ज्यादा पड रही प्रचंड गर्मी से है. लेकिन इसकी चर्चा कहीं हो नहीं रही. जबकि वैज्ञानिकों को अब एक बार फिर से 150 साल पहले आए सुपर अल नीनो के लौटने का डर सता रहा है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इन दिनों जैसे हालात बन रहे हैं. उसकी वजह से 1877 में आए सुपर अल नीनो जैसी स्थिति फिर से बन सकती है. तब दुनिया भर में करीब 5 करोड़ लोगों की मौत हो गई थी और कई साल तक दुनिया के अधिकतर हिस्से में धरती बांझ हो गई थी.दिन तापमान रिकॉर्ड तोड़ रहा है. भोपाल हो या कोलकाता, सब जगह पारा चढ़ता ही जा रहा है. मौसम वैज्ञानिक दुनियाभर में गर्मी की बदतर हो रही स्थिति को देखकर चिंतित हैं. आज से करीब 150 साल पहले धरती पर मौसम का ऐसा कहर बरपा था, जिसकी कल्पना कर आज भी लोग सिहर जाते हैं. तब पूरी दुनिया एक रेयर सुपर अल नीनो इफेक्ट का शिकार हो गई थी. धरती का तापमान करीब 3 डिग्री तक बढ़ गया था. चारों तरफ आकाल, सूखा और भुखमरी के हालात बन गए थे. सुपर अल नीनो ने ऐसी तबाही मचाई थी कि 5 करोड़ लोग तड़प- तड़प कर मर गए थे. सिर्फ भारत में एक करोड़ से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी.अब, पूर्वानुमानों से पता चलता है कि इस साल के अंत में पानी का तापमान औसत से 3 डिग्री सेल्सियस (5.4 डिग्री फारेनहाइट) से अधिक हो सकता है. इससे आने वाला सुपर एल नीनो लगभग 150 साल पहले वाले सुपर एल नीनो से भी अधिक शक्तिशाली हो जाएगा.वाशिंगटन पोस्ट में वाशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी की एसोसिएट प्रोफेसर दीप्ति सिंह के हवाले से छपी रिपोर्ट के मुताबिक 1870 के दशक जैसी एक साथ कई वर्षों तक चलने वाली सूखे की स्थिति फिर से उत्पन्न हो सकती है. मानसून की बारिश न होने से भारत सबसे बुरी तरह प्रभावित क्षेत्रों में से एक था. यहां लंबे समय तक सूखा और अकाल जैसे हालात बन गए थे.एक अनुमान के मुताबिक, भारत में एक करोड़ से ज्यादा लोगों की जान चली गई थी. जबकि, उत्तरी चीन में विनाशकारी सूखे के कारण फसलें बर्बाद हो गईं. ब्राजील में नदियां सूख गई थीं और कृषि व्यवस्था ठप हो गई थीं. वहीं अफ्रीका, दक्षिणपूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों में भी भीषण सूखा और जंगल की आग का कहर बरपा था.
                                                         सुपर अल नीनो ने सबसे बड़े अकाल को जन्म दिया था. इसने दुनिया भर में समाजों को कमजोर कर दिया. . कमजोर आबादी वाले क्षेत्रों में मलेरिया, प्लेग, पेचिश, चेचक और हैजा जैसी बीमारियों का भी प्रकोप तेजी से फैला था.स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क एट अल्बानी के पॉल राउंडी के मुताबिक यह वर्ष संभावित रूप से 1877 के बाद से सबसे बड़ी अल नीनो घटना हो सकती है. इस बीच, जलवायु वैज्ञानिक कैथरीन हेहो ने कहा है कि इसका मानव समाज और मानव कल्याण पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है.अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु पैटर्न है जो हर दो से सात साल में एक गर्म अल नीनो और एक ठंडा ला नीना स्टेज के बीच घटित होता है. अल नीनो के इस चक्र के दौरान, प्रशांत महासागर में जमा होने वाला गर्म पानी फैल जाता है और पृथ्वी के औसत सतही तापमान को बढ़ा देता है. यह गर्मी अंत में वायुमंडल में निकल जाती है, जिससे हमारे पृथ्वी का तापमान महीनों तक बढ़ जाता है. जहां समुद्र की सतह का तापमान 2°C (3.6°F) से अधिक हो जाता है. इस घटना को अक्सर ‘सुपर एल नीनो’ कहा जाता है. हालांकि वैज्ञानिक स्वयं इस शब्द का प्रयोग नहीं करते हैं.मौजूदा हालात से पता चलता है कि ट्रोपिकल पेसेफिक इलाके में समुद्र की सतह का तापमान इस सदी में किसी भी अन्य समय की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ रहा है. हालांकि, अभी इसकी पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यह एक बहुत मजबूत संकेत है कि एक शक्तिशाली अल नीनो मौसम प्रणाली विकसित हो रही है.जलवायु पूर्वानुमान के प्रमुख विल्फ्रान मौफौमा ओकिया ने कहा है कि जलवायु मॉडल अब काफी हद तक एकमत हैं और अल नीनो की शुरुआत और उसके बाद आने वाले महीनों में इसके और अधिक तीव्र होने की संभावना है जो अपने उच्च स्तर पर पहुंच सकता है. मौसम विभाग के मॉडलिंग से पता चलता है कि समुद्र की सतह का तापमान औसत से 1.5 डिग्री सेल्सियस (2.7 डिग्री फारेनहाइट) अधिक हो सकता है और यह भी कहा गया है कि यह इस सदी में अब तक की सबसे मजबूत अल नीनो घटना हो सकती है.जानकार कहते हैं कि आपादा भले ही बडी हैकिंतु डेढ सौ साल में विज्ञानं ने इतनी तरक्की तो कर ही ली है कि इस भावी संकट का मुकाबला किया जा सके, लेकिन इसकी कितनी कीमत दुनिया को चुकाना पडेगी, ये कोई नहीं जानता?
श्री राकेश अचल  ,वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनैतिक समीक्षक, मध्यप्रदेश  

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