अजित को जीतने की कोशिशें आखिर क्यों ?

अजित को जीतने की कोशिशें आखिर क्यों ?

महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना गठबंधन की सरकार है लेकिन भाजपा को मजा नहीं आ रहा । भाजपा को अपने साथ एनसीपी के अजित पवार भी चाहिए ताकि सरकार और मजबूत हो जाये। मजबूत ही न हो जाये बल्कि भविष्य के लिए एनसीपी महाराष्ट्र और दिल्ली में भी भाजपा के लिए कोई खतरा न रहे। इस समय जहां भाजपा देश की सबसे बड़ी पार्टी है वहीं उसे देश की सबसे ज्यादा असुरक्षित पार्टी भी कहा जा सकता है। देश का एक भी ऐसा प्रांत नहीं है जहां भाजपा बेफिक्र होकर राज कर पा रही हो। उत्तर प्रदेश को भी आप अपवाद नहीं मान सकते। एनसीपी पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद पंवार की पार्टी है इस दशक के पिछले पन्ने पलटकर देखिये तो आपको पता चलेगा की भाजपा देश में राम राज की स्थापना के लिए सतत प्रयत्नशील है ,लेकिन इसके लिए उसे हर प्रांत में बिभीषणों की जरूरत पड़ती रही है । भाजपा ने रामराज की स्थापना के लिए जनादेश के साथ ही दूसरे तमाम रास्ते भी ईमानदारी से इस्तेमाल किये हैं। जहां जनादेश नहीं मिला वहां धनादेश से सत्ता हासिल कर ली और जहां धनादेश नहीं मिला वहां बिभीषणों के जरिये सत्ता हासिल कर ली। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बिभीषन नहीं मिले ये और बात है।
                                          महाराष्ट्र में भाजपा शिवसेना को दो फाड़ कर सत्ता में बैठी है लेकिन उसे भरोसा नहीं हो रहा की प्रदेश में सत्ता भाजपा -शिवसेना गठबंधन की है भी या नही। इसीलिए अब महाराष्ट्र में शरद पवांर की पार्टी एनसीपी को दो फांक करने की कोशिश में लग गयी है। एनसीपी में शरद पंवार के भतीजे अजित पवांर पार्टी को भाजपा के साथ जोड़ने के लिए उतावले है। वे अविश्वसनीय नेता है। पहले भी पार्टी को बेचने की कोशिश कर चुके है। इस बार शायद वे मुख्यमंत्री बनने की शर्त पर एनसीपी तोड़ना चाहते हैं। लेकिन चचा शरद पंवार उन्हें ऐसा करने नहीं दे रहे।आपको याद होगा की भाजपा ने हिन्दू राजनीति की एक प्रबल धुरी रही शिवसेना को दो फांक करने में कामयाबी हासिल की है।
महाराष्ट्र में भाजपा लम्बे समय के बाद भी अपना एकछत्र शासन कायम करने में कामयाब नहीं हुई है। 1993 के बाद महाराष्ट्र में भाजपा की कोशिशें शुरू हुईं लेकिन आजतक उसे अपनी डैम पर सरकार बनाने का मौक़ा नहीं मिला । उसे कभी शिवसेना का बगलगीर होना पड़ा तो कभी एनसीपी की पालकी उठाना पड़ी। भाजपा ने 2014 में शिवसेना के साथ मिलकर सरकार बनाई थी ,और तब से अकेले सरकार बनाना भाजपा का एक अधूरा सपना ही है।भाजपा के शीर्ष नेता अमित शाह की जादूगीरी भी महाराष्ट्र में भाजपा को दोनों पांव जमाने की जगह नहीं दिला पाए। लगता है कि अब भाजपा अपने सहयोगी नहीं बल्कि कांग्रेस कि मित्रों को तलाश कर उन्हें कांग्रेस से अलग करने की कोशिश कर रही ह। एनसीपी पर शायद इसी गरज से उसने डोरे डाले हैं। याद रहे की एनसीपी इन दिनों भी कांग्रेस कि साथ है। महाराष्ट्र में भी और महाराष्ट्र के बाहर भी। विपक्षी एकता की धुरी भले न हो एनसीपी लेकिन उसकी भूमिका महत्वपूर्ण है। जब तक एनसीपी कांग्रेस कि साथ है तब तक भाजपा कि लिए उसकी चुनौती समाप्त होने वाली नहीं है। एनसीपी को कमजोर किये बिना भाजपा का मजबूत होना नामुमकिन है क्योंकि आज भी एनसीपी भारतीय राजनीति में एक प्रतीतक स्वर है। भाजपा इधर महाराष्ट्र में एनसीपी को तोड़ने की कोशिश कर रही है उधर भाजपा की नजर राजस्थान में सचिन पायलट पर लगी ह। भाजपा चाहती है की यदि सचिन राजस्थान में भाजपा कि लिए बिभीषन की भूमिका स्वीकार कर लें तो भाजपा का काम आसान हो सकता है। पता नहीं क्यों सचिन अभी तक कांग्रेस से छोड़-छुट्टी नहीं कर पाए हैं जबकि उनके हर कदम से कांग्रेस को नुक्सान हो रहा है। कांग्रेस में अब वे न घर कि हैं और न घाट के। राजस्थान की ही तरह भाजपा को छत्तीसगढ़ में भी कोई बिभीषन अभी तक नहीं मिला है,मजबूरन इन दोनों प्रदेशों में भाजपा को अकेले ही विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का मुकाबला करना पडेगा।
                                            पिछले पांच साल में कांग्रेस और भाजपा के बीच जंग लगातार चल रही है। भाजपा अपना एक बुर्ज मजबूत करती है तो उसका दूसरा बुर्ज कमजोर हो जाता ह। जैसे अभी हाल में ही कर्नाटक में भाजपा के वरिष्ठ नेता कांग्रेस में शामिल हो गए हालांकि वे भाजपा के लिए बहुत महत्वपूर्ण थे। मध्यप्रदेश में भी कर्नाटक की ही तरह ऍन मौके पर यदि ऐसी ही भगदड़ शुरू हो जाये तो किसी को हैरान नहीं होना चाहिए। मध्यप्रदेश में भाजपा का दुर्ग ढ़हने से बचने के लिए संघ और भाजपा का नेतृत्व जीजान से जुटा हुआ है ,क्योंकि भाजपा को पता है की अकेले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष वीडी शर्मा के बूते कुछ ज्यादा होने वाला नहीं है। देश में वर्ष 2024 का रन्न शुरू होने से पहले समूची हिंदी पट्टी में यदि भाजपा की एक भी ईंट खिसकती है तो उसकी विजय यात्रा को धक्का लग सकता है ,क्योंकि दक्षिण से भाजपा को बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं ह। कहीं का ईंट और कहीं का रोड़ा जोड़े बिना उसका सत्ता में बने रहना अब असम्भव सा हो गया है। भानुमती का कुनबा अब भाजपा की जरूरत भी है और मजबूरी भी। भाजपा के कुनबे में पूर्व में रह चुके राजनितिक दल अब शायद ही लौट कर वापस आएं,ऐसे में परिदृश्य का रोचक होना स्वाभाविक है। फिलहाल सबकी नजर महाराष्ट्र पर ह। महाराष्ट्र में जो होना है जल्द हो जाएगा।

श्री राकेश अचल जी  ,वरिष्ठ पत्रकार  एवं राजनैतिक विश्लेषक मध्यप्रदेश  ।

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