UGC के नियम न लागू हैं और न होंगे – मोहन भगवत

UGC के नियम न लागू हैं और न होंगे – मोहन भगवत

UGC के नए इक्विटी नियमों पर भागवत के बयान से बढ़ी बहस: सवाल नियमों से ज्यादा प्रक्रिया और अधिकार का

नई दिल्ली। उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी UGC के 2026 के इक्विटी नियम एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक बहस के केंद्र में हैं। इसी बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने इन नियमों को लेकर कहा है कि ये अभी केवल प्रस्तावित नियम हैं और इन्हें कानूनी रूप नहीं दिया गया है। यह टिप्पणी उन्होंने 15 सितंबर 2026 को राजस्थान के भीलवाड़ा में जैन संत आचार्य पुलक सागर महाराज से मुलाकात के दौरान की।

भागवत के इस बयान ने इसलिए भी चर्चा पैदा की है क्योंकि इन नियमों को लेकर मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि UGC के नियम लागू होंगे या नहीं, बल्कि यह भी है कि उच्च शिक्षा में समानता और भेदभाव रोकने की व्यवस्था किस रूप में होनी चाहिए।

                               UGC ने Promotion of Equity in Higher Educational Institutions Regulations, 2026 को जनवरी 2026 में अधिसूचित किया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी को इन नियमों को फिलहाल लागू करने से रोक दिया था। अदालत ने प्रथम दृष्टया नियमों की भाषा को अस्पष्ट बताते हुए इनके दुरुपयोग की संभावना पर भी चिंता जताई थी। कोर्ट के आदेश के तहत 2012 के पुराने नियमों को फिलहाल जारी रखा गया है। यानी वर्तमान स्थिति यह है कि 2026 के नए नियम प्रभावी रूप से लागू नहीं हैं और 2012 के नियम फिलहाल जारी हैं।

                              इस मामले में एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम अगस्त 2026 में सामने आया। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह 2026 के UGC इक्विटी नियमों पर पुनर्विचार कर रही है। सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को यह जानकारी दी थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने UGC से विस्तृत जवाब मांगा और मामले की सुनवाई आगे के लिए टाल दी।  इस घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि नियमों के भविष्य पर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है।

भागवत के बयान का असली सवाल क्या है?

भागवत का यह कहना कि नियम “कानून नहीं बनेंगे”, स्वाभाविक रूप से एक बड़ा राजनीतिक सवाल खड़ा करता है—क्या यह संघ की ओर से एक सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणी है या सरकार की आगामी नीति का संकेत?इसका स्पष्ट उत्तर अभी उपलब्ध नहीं है। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी में केंद्र सरकार ने यह घोषणा नहीं की है कि वह नियमों को स्थायी रूप से समाप्त कर रही है। इसके विपरीत, अगस्त में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने केवल इतना कहा था कि नियमों पर पुनर्विचार चल रहा है।इसलिए भागवत के बयान को फिलहाल एक महत्वपूर्ण राजनीतिक-सामाजिक संकेत के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन इसे सरकार के अंतिम निर्णय के रूप में प्रस्तुत करना जल्दबाजी होगी।

बहस के दो पक्ष

इस पूरे विवाद में दो प्रमुख चिंताएं सामने आई हैं। एक ओर, UGC के 2026 नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए मजबूत व्यवस्था तैयार करना था। दूसरी ओर, नियमों की कुछ धाराओं की भाषा और संभावित दुरुपयोग को लेकर आपत्तियां उठीं। सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने अंतरिम आदेश में नियमों की अस्पष्टता और संभावित दुरुपयोग को लेकर चिंता दर्ज की थी। यही कारण है कि विवाद को केवल “समानता बनाम असमानता” के सवाल तक सीमित करना पर्याप्त नहीं होगा। असली चुनौती ऐसी व्यवस्था तैयार करने की है जो किसी भी छात्र के साथ जाति के आधार पर भेदभाव को रोके और साथ ही शिकायत निवारण की प्रक्रिया निष्पक्ष, स्पष्ट और दुरुपयोग से सुरक्षित हो।

फिलहाल तीन बातें सबसे महत्वपूर्ण हैं—
पहली, 2026 के UGC नियम सुप्रीम कोर्ट की रोक के कारण लागू नहीं हैं।
दूसरी, केंद्र सरकार ने अदालत में कहा है कि वह इन नियमों पर पुनर्विचार कर रही है।
तीसरी, भागवत ने सार्वजनिक रूप से इनके भविष्य को लेकर स्पष्ट टिप्पणी की है।

अब देखना यह है कि सरकार पुनर्विचार के बाद क्या कदम उठाती है और सुप्रीम कोर्ट के सामने इस मामले का अंतिम स्वरूप क्या निकलता है।यह विवाद केवल UGC के एक नियम का नहीं है। यह सवाल भी है कि देश के विश्वविद्यालयों में समानता, सामाजिक न्याय, शिकायत और अधिकारों के बीच संतुलन किस तरह बनाया जाए।

⇑ वीडियो समाचारों से जुड़ने के लिए  कृपया हमारे चैनल को सबस्क्राईब करें , धन्यवाद।

Share this...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *