—सियासत में किताब संविधान की,साजिश अराजकता की …
सौजन्य – ना काहू से बैर/राघवेंद्र सिंह
नया इंडिया/भोपाल
कभी उड़ता पंजाब फ़िल्म ने पूरे देश को चिंता में डाल दिया था । दूध दही घी छाछ की नदियाँ बहने की कहावत वाली धरती पर पानी से ज़्यादा शराब की खपत हो रही है। यह अतिशयोक्ति लग सकती है । मगर हालात इससे भी अधिक खतरनाक है जिसे सूखा नशा (ड्रग्स)कहा जाता है। यह भारत के ख़िलाफ़ भयावह साज़िश है। देश के युवा निशाने पर हैं। मोदी सरकार ने इसके ख़िलाफ़ बिगुल बजाया है। नक्सल के खात्मे के बाद 2029 तक देश को नशा मुक्त करना है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस संकल्प को शनिवार को भोपाल की धरती से फिर दोहराया है । यह एक युद्ध है बल्कि उससे भी बढ़कर टॉस्क है ये। स्कूल कॉलेज से लेकर कॉर्पोरेट सेक्टर में भी सूखे नशे ने भारत टैलेंट को जकड़ रखा है। दुनिया के कई मुल्क भारत को कमजोर करने के लिए नशे का जाल फैलाने में लगे हैं । इसमें राजनेता,अफसर, विदेशी एजेंटों के बड़े गिरोह काम कर रहे हैं । जो ड्रग्स की आड़ में बच्चों को देश द्रोह के अपराध में फांस रहे हैं । नशा मुक्त भारत नक्सल मुक्ति से भी बड़ा काम है । इस अभियान में सबको मदद करना चाहिए ताकि यह हर हाल में सफल हो सके । इस काम में लगे सभी लोगों को शुभ कामनाएँ ।
गांव,कस्बे से लेकर देश – दुनिया से बड़बोलेपन और अविश्वास का ऐसा दौर दौरा चल रहा है कि कोई किसी के काबिल ए एतबार ही नही रहा ।
मुख्यमंत्री का मंत्रियों पर भरोसा घट रहा है। इसलिए सरकार मंत्री से कम अफसरों के ज़रिए चलाने की परिपाटी बढ़ रही है । इससे सरकारों के अंदर खाने असंतोष में इजाफा । नतीजतन विधायकों व कार्यकर्ताओं में नाराजगी। संगठन की सरकार में कम होती अहमियत। नाराज और उदास कार्यकर्ता की सक्रियता में कमी । आम जनता में असंतोष। मैदानी हालत यह कि विपक्ष को बढ़त मिलती दिखाई दे रही है । हैरत की बात यह है कि भाजपाई दुखी होने के बजाए इससे खुश हो रहा है क्योंकि शासन प्रशासन में उसकी उपेक्षा ने घर बैठने पर विवश कर दिया है। विपक्ष के लिए शुभ संकेत है बशर्ते वह माहौल का राजनीतिक लाभ उठा ले । मध्य प्रदेश में बढ़ते भ्रष्टाचार ने सत्ता -संगठन के सभी फोरम व संघ परिवार के लगभग सभी आनुषंगिक संगठनों को लाचारी की तरफ़ धकेल दिया है। संघ के एक पदाधिकारी का कहना था कि राज्यों को लेकर मैदानी हकीकत सबको पता है । सही समय पर इसका समाधान खोज लिया जाएगा। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव व नौकरशाहों की मनमानी -भ्रष्टाचार को पार्टी के भीतर बाहर गंभीरता के साथ टारगेट किया जा रहा है। दिल्ली दरबार को भी कई चैनल के मार्फ़त संकेत व सूचनाएं दी गई हैं । मगर सीएम डॉ यादव व उनकी टीम पर केंद्रीय नेतृत्व का भरोसा बरकार है।इस बीच संवैधानिक संस्थाओं के संबंध में अविश्वास का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। सरकार से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पर संदेह और सवाल किए जा रहे हैं। इसके पीछे साजिश भी है और सरकार की ग़लतियाँ भी । नेता और पार्टियां, उनके अफ़सरान औक़ात से ज़्यादा अंहकार के अतिरेक में डूब रहे हैं। गलतफहमियों का ये भूत क्या सत्ता क्या विपक्ष , सबके सिर चढ़ कर बोल रहा है । मुद्दा कुछ वजनी है और इसे दो मशहूर शायर की ज़ुबानी समझने-समझाने की कोशिश करते हैं-
शायर अज़हर इक़बाल फ़रमाते हैं-
एक शागिर्द अपने उस्ताद के पास पहुँचा और कहने लगा कि उस्ताद मैंने एक शेर कहा है। उस्ताद ने कहा कि भाई सुनाओ। शागिर्द ने शेर सुनाया-
“कम से कम दो दिल तो होते इश्क में, एक रखते एक खोते इश्क में …”
उस्ताद तजुर्बेकार इंसान थे, कहने लगे कि इसमें जरा सी तब्दीली कर लो-
इस शेर को ऐसे पढ़ा करो कि –
“कम से कम सौ दिल तो होते इश्क में। रफ्ता-रफ्ता सब को खोते इश्क में “
शागिर्द अपने दूसरे उस्ताद के पास पहुँचा और उनसे भी यही कहा कि मैंने एक शेर कहा है। उन्होंने भी कहा कि भाई सुनाओ। शागिर्द ने शेर सुनाया कि –
“कम से कम सौ दिल तो होते इश्क में, रफ्ता-रफ्ता सब को खोते इश्क में…”
ये उस्ताद और भी ज़्यादा तजुर्बेकार थे। कहने लगे कि ये शेर तुम्हारा नहीं हो सकता। शागिर्द ने बड़ी हैरानी से पूछा लेकिन क्यों? तो उस्ताद कहने लगे तुम्हारी दो दिल से ज़्यादा की औक़ात नहीं है…सियासत से लेकर नौकरशाही में जो हैं उनकी कमाई से लेकर हुकूमत करने सौ सौ दिल की तरह ख्वाहिश हैं मगर बकौल शायर का इशारा है कि उनकी औक़ात एक दो बार से ज़्यादा जीतने की नही है ।
दावे और वादे किए गए थे भय- भ्रष्टाचार मुक्त गुड गवर्नेंस देने के । अनुभव और मैदानी रिपोर्ट बताती है कि बिना रिश्वत पत्ता नही खड़कता है ।शिक्षक से सियासदाँ रहे मशहूर शायर उदय प्रताप सिंह जो कहते हैं वह दो सांसदों की पार्टी रही भाजपा के सत्तासीन होने से लेकर कांग्रेस, सपा -बसपा, आप,डीएमके, एडीआईएमके, तृणमूल कांग्रेस, शिवसेना,रांकपा, जेडी-आरजेडी आदि आदि सब पर एकदम मुफ़ीद है – उनका कहना है-
“पुरानी कश्ती को पार लेकर फ़कत हमारा हुनर गया है,
नए खेवैया कहीं न समझें नदी का पानी उतर गया है…”
साथ ही वे यह भी कहते हैं मैं कितने साल रहा सियासत में, तो उसी सियासत के हवाले से एक शेर – आसमानी दावे करने वाले नेताओं के लिए…-
“तुम होशमंदी के ऊँचे दावे, किसी मुनासिब जगह पे करते , ये मैकदाँ है यहाँ से कोई कहीं गया बेखबर गया…”
प्रदेश से लेकर देश में सरकार विरोधी वातावरण बनने के पूर्व कांग्रेस ने चुनाव में लोकतंत्र के लिए संविधान की किताब लेकर प्रचार का दौर शुरू किया था । उस में मिली असफलता ने महंगाई-बेरोजगारी के मुद्दे पर अराजकता फैलाने की साजिश की तरफ बढ़ा सा दिया है । पूर्व में विपक्ष को सत्ता के लायक़ सफलता नही मिली तो उसने ईवीएम, वोट चोरी के मुद्दे को उछाला। पेपर लीक कांड की आड़ में युवाओं को सड़क पर उतरने का आव्हान के साथ हिंसा फैलाकर तख्त पलट के सपने। एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) (Special Intensive Revision)
के मार्फ़त चुनाव आयुक विवाद फिर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की आड़ में पीएम नरेन्द्र मोदी के इस्तीफ़े की मांग। इसके लिए सीजेपी की मदद से युवाओं को सड़क पर लाने की मुहिम। भ्रष्टाचार व कानून व्यवस्था के सवाल पर अधिकांश कलेक्टर-एसपी से लेकर सिपाही-चपरासी तक (ईमानदारों से माफ़ी के साथ ) लेनदेन में लिप्त हैं। जन समर्थन के मामले में इससे कांग्रेस को हर दिन लाभ है और भाजपा प्रतिदिन नुक़सान हो रहा है । सत्ता की नाव के खिवैया ये न समझें कांग्रेस का पानी उतर गया है… भाजपा की पुरानी कश्ती को लेकर अनुभवी नेताओं का हुनर ही पार लाया था…
आलेख
श्री राघवेंद्र सिंह – लेखक मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनैतिक विश्लेषक हैं ।

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