लोकतंत्र-मंत्र

ख्यालों के पुलाव में पुलिस की वर्दी

पिछले आठ साल से भाजपा ” एक निशान,एक विधान ‘का नारा देकर आगे बढ़ रही है। भाजपा के इस नारे में कोई बुराई नहीं है लेकिन ये फार्मूला देश की विविधता की वजह से कामयाब नही हो पाया है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने एक बार फिर ‘पुलिस की वर्दी ‘ में एकरूपता का सुझाव दिया है। भाषा, वेशभूषा और संस्कृति में विविधता के चलते ही देश में ‘एक निशान और एक विधान का सपना तो आधा -अधूरा पूरा हो गया किन्तु एक भाषा का सपना अभी तक अधूरा ही है,’आधा है चंद्रमा,रात आधी ‘ की तरह। प्रधानमंत्री जी का सुझाव है तो काबिले तारीफ, किंतु अव्यावहारिक। भारत जैसे विशाल देश में सब कुछ एक कर पाना ख्याली पुलाव बनाने से ज्यादा कुछ नहीं है। भले ही ये मामला सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। भारत में हर राज्य की पुलिस का अपना ध्येय वाक्य,अपनी वर्दी और अपना रंग है। पुलिस संयोग से राज्य का विषय है जिसे केंद्र अपने ढंग से नहीं रंग सकता।

हमने तीन साल पहले जम्मू कश्मीर से उसका निशान और विधान छीना, किंतु इसके लिए राज्य के तीन टुकड़े करना पड़े,जबकि हासिल कुछ नहीं हुआ। विखंडन की पीड़ा झेल रहे राज्य का अधिकांश भाग पहले की ही तरह अशांत है। वहां तीन साल बाद भी लोकतंत्र की बहाली नहीं हो सकी। देश की पूर्ण बहुमत की भाजपा सरकार चाहकर भी एक भाषा के मामले में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकी। आखिर सरकार भी जनमत की ताकत से अनजान तो नहीं है। जब आप राष्ट्र भाषा की व्यवस्था करने में असमर्थ हैं तो खामखां पुलिस वर्दी में एकरूपता का ख़्वाब किस हैसियत से देख रहे हैं ? देश में आखिर लोकतंत्र है! प्रधानमंत्री जी दर असल मूल मुद्दों से मुंह चुराने में सिद्ध हस्त हैं। वे शायद नहीं जानते कि उनकी सरकार पुलिस सुधार के लिए बने आयोगों की पुरानी सिफारिशों पर ही अमल नहीं कर पाई है,नया आयोग बनाकर नयी सिफारिशें हासिल करना तो दूर की बात है। प्रधानमंत्री जी जानना नहीं चाहते कि आज भी देश में प्रति एक हजार आबादी पर एक सिपाही काम कर रहा है। सरकारें पुलिस कल्याण के नाम पर जो कर रही हैं वो भी ‘ऊंट के मुंह में जीरा ‘की तरह है। पुलिस की वर्दी में एकरूपता आवश्यक भी नहीं है और आसान भी नहीं। फिर भी यदि प्रधानमंत्री जी चाहें तो जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं, वहां इस तरह का प्रयोग किया जा सकता है। हमारी पुलिस की वर्दी का रंग खाकी है। देश काल और परिस्थिति के अनुसार इसका निर्धारण किया गया था। लेकिन अब युग बदल गया है इसलिए पुलिस की वर्दी का रंग और डिजाइन भी बदला जाना उचित लगता है। लेकिन ये तभी संभव है जब इसके लिए सभी राज्य सहमत हों।

आज जिस ढंग की राजनीति हो रही है उसमें पुलिस की वर्दी में एकरूपता दिवास्वप्न से ज्यादा कुछ नहीं। दुनिया के बहुत से देशों में पुलिस की वर्दी ही नहीं चरित्र भी बदला है।एक जमाने में सबसे ज्यादा भ्रष्ट माने जाने वाली अमेरिका की पुलिस आज सबसे ज्यादा सक्रिय, विनम्र और भरोसेमंद होने के साथ ही ईमानदार पुलिस मानी जाती है। अमेरिका में कानून और व्यवस्था,वन,उपवन और राष्ट्रीय पुरा संपदा के लिए अलग अलग पुलिस है।भारत में पुलिस भ्रष्ट भी है और अमानुषिक भी। हमारी पुलिस का ध्येय वाक्य भले ही ‘देशभक्ति जन सेवा हो किन्तु उसका आचरण है एकदम विपरीत। भारत की पुलिस आज भी सत्ता की गुलाम है। पुलिस कानून के हिसाब से नहीं सत्ता की जरूरत के हिसाब से काम करती है। कब पुलिस मंत्री की भैंस खोजने में लगा दी जाए कोई नहीं जानता। पुलिस को कब अदालत के बाहर ही अपराधियों का काम तमाम करने को कह दिया जाए, भगवान को भी पता नहीं होता। ऐसे में पुलिस की वर्दी भर में एकरूपता से क्या हासिल हो सकता है! भारत में मौजूदा पुलिस की स्थापना 1843 में हुई । सर चार्ल्स नेपियर ने औपनिवेशिक आयरिश कांस्टेबुलरी की तर्ज पर सिंध में एक पुलिस प्रणाली की स्थापना की।नेपियर की पुलिस ने ईस्ट इंडिया कंपनी को आयरिश कॉन्स्टेबुलरी की तर्ज पर पुलिस की एक सामान्य प्रणाली स्थापित करने के लिए प्रेरित किया। बाद में, 1857 में विद्रोह के पहले युद्ध के बाद, ब्रिटिश भारत सरकार ने 1860 में एक पुलिस आयोग की स्थापना की।तब से अब तक 179 साल बीत चुके हैं। गंगा में न जाने कितना पानी बह चुका है, किंतु पुलिस को आज जैसा होना चाहिए,वैसी वो है नहीं। काश प्रधानमंत्री जी का सपना पूरा हो सकता। 

व्यक्तिगत विचार-आलेख-

श्री राकेश अचल जी ,वरिष्ठ पत्रकार , मध्यप्रदेश  ।

 

Share this...
bharatbhvh

Recent Posts

“सुरखी विधानसभा के विद्यालयों में गूंजा सेवा, संस्कार और हरियाली का संदेश

युवा  नेता आकाश सिंह राजपूत ने साइकिल वितरण, छात्र सम्मान एवं वृक्षारोपण से जीता सभी…

15 hours ago

सांसद वानखेड़े ने रेल मंत्री से सागर लोकसभा क्षेत्र में रेल सुविधाओं के विस्तार की मांग उठाई

बीना में वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन और मंडी बामोरा में प्रयागराज एक्सप्रेस के स्टॉपेज की…

15 hours ago

संजय दत्त @ 67 : गलतियों से गिरकर, संघर्ष से उठकर सुपरस्टार बनने की कहानी

भारतीय सिनेमा में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं जिनकी पहचान केवल उनकी फिल्मों से नहीं,…

22 hours ago

ई-20 पेट्रोल – सस्ता ईंधन का वादा, अब ‘किसानों के सम्मान’ का नया तर्क?

भारतीय जनता पार्टी और केंद्र सरकार की एक विशेषता है—वह अपने हर बड़े फैसले के…

2 days ago

गुरु: जो युग को दृष्टि देता है

‘’वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम्। यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते॥‘’ सभ्यताओं का निर्माण केवल…

3 days ago

CJP के प्रदर्शन के बाद तेज हुई ‘रिजर्वेशन हटाओ’ बहस, 51 लाख फॉलोअर्स का दावा

नई दिल्ली। जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में हुए विरोध प्रदर्शन के…

4 days ago