कलमदार

बंगाल के हाल – बीजेपी धर्मशाला ही है सामिक मोशाय

मै बंगाल भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य का मुरीद हो गया हूँ. सामिक भाजपा के ऐसे पहले नेता हैं जिन्होने बुलंद आवाज में दलबदल को न सिर्फ नकारा है बल्कि साफतौर पर कहा है कि भाजपा कोई धर्मशाला नहीं है कि जो चाहे सो मुंह उठाकर भाजपा में शामिल हो जाए. पूरे 61 साल के सामिक संघनिष्ठ भाजपा नेता के साथ ही लेखक और मुखर वक्ता रहे हैं इसलिए मुझे हैरानी है कि इतना कडवा सच वे कैसे बोल पाये, क्योंकि 46 साल की भाजपा को 2014 के बाद नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने मिलकर एक सियासी धर्मशाला ही तो बनाने का अभियान चलाया है. फलस्वरूप भाजपा का कांग्रेसीकरण हो चुका है.है.भाजपा को धर्मशाला ही नहीं अपितु वाशिंग मशीन तक कहा जाने लगा है.
.आपको बता दूं कि 4 मई को जब बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी को प्रचंड जीत मिलने के बाद से ही राज्य का नजारा बदल गया. केसरिया झंडों और गुलाल के साथ लोग सड़क पर उतरे. टीएमसी समर्थकों के जज्बात बदले.पूरे राज्य में कुछ ही घंटों में कई टीएमसी समर्थकों ने केसरिया चोला पहन लिया. नई सरकार के शपथ लेते के बाद टीएमसी राज में बनाए गए यूनियन ऑफिसों पर बीजेपी का झंडा और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की तस्वीरें लग गईं. बीजेपी में शामिल होने की होड़ भी लग गई.आज कुल 20 दिन में ही हालात ऐसे बने कि बंगाल बीजेपी की पहली औपचारिक बैठक में ही प्रदेश अध्यक्ष सामिक दा को स्पष्ट करना पड़ा कि फिलहाल किसी भी नए सदस्य को पार्टी में शामिल नहीं किया जाएगा. भट्टाचार्य ने दूसरे दलों के सदस्यों को पार्टी में शामिल करने वाले पदाधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी भी दे दी.भट्टाचार्य का कहना है कि बीजेपी कोई धर्मशाला या ऐसी जगह नहीं है, जहां कोई भी घुस जाए। हम उन लोगों को पार्टी में शामिल नहीं करेंगे, जिन्होंने बीजेपी कार्यकर्ताओं की हत्या की है.बीजेपी के दरवाज़े उन लोगों के लिए कभी नहीं खुलेंगे, जो सालों-साल भ्रष्टाचार, वसूली और आतंक की राजनीति में शामिल रहे हैं.
                                                          सामिक भट्टाचार्य का कहना है कि भाजपा उन कार्यकर्ताओं की पार्टी है, जो इसके आदर्शों, नीतियों और देश के हितों के अनुसार काम करते हैं. यह अवसरवादियों या स्वार्थी लोगों के लिए कोई पनाहगाह नहीं है.अब लगता है कि या तो सामिक बौरा गये है या फिर मोशा के तमाम फैसलों पर उंगली उठाने का दुस्साहस कर रहे हैं.अकेले पश्चिम बंगाल में ही नहीं अपितु हर राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद पार्टी बदलने का ट्रेंड पुराना रहा है. बंगाल तो इसका जीता- जागता उदाहरण है.2011 में जब तृणमूल कांग्रेसने जीत हासिल की थी, तब लाल किला कहे जाने वाले पश्चिम बंगाल के सचिवालय से लेकर सडक तक हरे रंग का बोलबाला हो गया था.वाम मोर्चे के दौर में बनाए गए ऑटो-रिक्शा, टैक्सी यूनियन समेत कई ट्रेड संगठनों के दफ्तर पर तृमूका का कब्जा हो गया था. इन संगठनों के कार्यकर्ताओं ने पार्टी बदल ली और वाम मोर्चे के प्रतीकों को खत्म कर दिया.अब बीजेपी के सत्ता में आने के बाद कोलकाता समेत पश्चिम बंगाल के अधिकतर इलाकों में ट्रेड यूनियनों के ऑफिसों का रंग बदलने लगा. टीएमसी के पार्षद और जिले के कार्यकर्ताओं में अभी भी भाजपा में शामिल होने की होड़ लगी है. जब इसकी भनक बीजेपी के प्रदेश नेताओं को लगी तो उन्होंने पार्टी में शामिल होने की पॉलिसी के साथ बीजेपी के तृणमूल करण के खिलाफ प्रदेश अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को चेतावनी देना पडी..नई नीति के मुताबिक, बीजेपी के कार्यकर्ता विपक्षी दलों के कार्यालयों और ट्रेड यूनियनों पर कब्जा करने पर भी सख्त रोक लगा दी गई है. सामिक भट्टाचार्य ने कहा कि पार्टी विरोधी गतिविधियों, रंगदारी वसूली और सिंडिकेट चलाने पर तत्काल कार्रवाई की जाएगी. पार्टी पदाधिकारियों के आचरण पर नजर रखने के लिए एक अनुशासन समिति का गठन किया गया है.उन्होंने पार्टी के बैनरों के लिए प्रोटोकॉल में बदलाव भी किए हैं. अब पोस्टर और बैनर पर सीएम शुभेंदु अधिकारी की तस्वीर प्रदेश अध्यक्ष से पहले लगानी होगी.अब देखना ये है कि सामिक भट्टाचार्य की मुहिम को पार्टी हाई कमान की सहमति मिलती है या नहीं, क्योंकि दल-बदल और खरीद -फरोख्त को ही अपना परम धर्म मानने वाले मोशा की जोडी शायद ही सोमिक के फैसले को पचा सके. आप जानते हैं कि भाजपा का हाजमा दलबदलुओं को पचाने में अव्वल नंबर का है.
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श्री राकेश अचल  ,वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनैतिक समीक्षक, मध्यप्रदेश

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