कलमदार

मशहूर उर्दू शायर बशीर बद्र अब हमारे बीच नहीं रहे

1955 में मिसरिख (सीतापुर) के तरही मुशायरे की सदारत एक सूरत सीलदार कर रहे थे तीन शायर अपना कलाम पढ़ चुके थे कि शायर की हैसियत से नीखेज और नौजवान बशीर बद्र ने अपना शेर पढ़ा “उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाए” इस पर महफ़िल झूम ही रही थी कि बुजुर्ग सदरे मुशायरा ने मुशायरे के खत्म होने का एलान कर दिया, उनका कहना था कि इस जमीन में इससे बेहतर शेर मुम्किन नहीं।
– खुर्शीद अफ़सर बिसवाँनी

28 मई 2026 ईद की शाम लफ्जों की दुनियां का एक एंसा सितारा आसमानी रोशनी में समा गया जिसके होने का अहसास ही दिलों में सुकुन भर देता था इक नाम

बशीर बद्र 

बशीर बद्र की पैदाइश कानपुर में हुई, उनके बुजुर्ग ईरान से आए थे। लाहौर, दिल्ली वगैरा के बाद फैज़ाबाद में मुक़ीम (निवासी) रहे। आज भी बशीर बद्र के खानदान के लोग फ़ैज़ाबाद लखनऊ में रहते हैं। डॉ. बशीर बद्र की वालिदा का नाम आलिया बेगम और वालिद का नाम शाह मी. नज़ीर था। बशीर बद्र जब दसवीं जमाअत (कक्षा) में पढ़ते थे तब उनके वालिद इस दुनिया से रुखसत (विदा) हो गए और ख़ानदान की ज़िम्मेदारी बशीर बद्र के कंधों पर आ गई।वालिद साहब की मौजूदगी में बशीर बद्र ने शायरी करना शुरू कर दिया था। उनका पहला शेर जिस पर उनके वालिद ने नाराज़ होकर शायरी करने से मना किया था वो ये है:
हवा चल रही है उड़ा जा रहा हूँ तेरे इश्क़ में मैं मरा जा रहा हूँ
(डॉ. बशीर बद्र, उम्र ग्यारह बरस)
बशीर बद्र शुरू से ही मीजूं-तबा (योग्य) थे। उनका ये शेर इस बात की तरफ इशारा करता है कि आशिक़ मिज़ाज होने के साथ-साथ हवा के दोश पर उड़ना और ज़माने के साथ चलना चाहते हैं। बशीर बद्र ग़ज़ल के मक़बूल-तरीन (सर्वप्रिय) शायर हैं और हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के नुमाइंदा रसाइल में बशीर बद्र की ग़ज़लें पाबंदी से शाए (छपती) होती रहती हैं। बशीर बद्र की मक़बूलियत (लोकप्रियता) का राज़ ये भी है कि वो मुशायरों के भी बहुत मक़बूल शायर हैं लेकिन अदबी हलकों में उनकी हद दर्जा-पज़ीराई (स्वीकृति) की जाती रही है। यही वजह थी कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में एम.ए. उर्दू निसाब में उनकी ग़ज़लें शामिल रही हैं। आज बशीर साहेब हमारे बीच नहीं है देश दुनिया के बड़े कलमकारों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी ।

मशहूर उर्दू शायर बशीर बद्र अब हमारे बीच नहीं रहे। 91 वर्ष की आयु में उनका निधन केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि उर्दू अदब की उस नरम, मोहब्बत भरी आवाज़ का खामोश हो जाना है जिसने कई पीढ़ियों को जीने, बिछड़ने और याद रखने का सलीका सिखाया।

बशीर बद्र उन चुनिंदा शायरों में थे जिन्होंने कठिन उर्दू को आम आदमी की ज़ुबान बना दिया। उनकी ग़ज़लों में न किताबों का बोझ था, न बनावट की नुमाइश। वे सीधे दिल में उतरती थीं।
“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो…”
जैसे शेर आज भी लोगों की ज़िंदगी का हिस्सा हैं।

उनका जीवन संघर्षों से भरा रहा। 1987 के मेरठ दंगों में उनका घर और वर्षों की साहित्यिक पूंजी जलकर राख हो गई। इस हादसे ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया, लेकिन उनकी शायरी में इंसानियत और मोहब्बत का स्वर कभी कम नहीं हुआ। बाद में उन्होंने भोपाल को अपना ठिकाना बनाया और वहीं से अपनी रचनात्मक यात्रा जारी रखी।

बशीर बद्र की सबसे बड़ी ताकत थी उनकी सादगी। वे प्रेम को भी लिखते थे, अकेलेपन को भी और समाज के टूटते रिश्तों को भी। उनकी ग़ज़लें मुशायरों में तालियां बटोरती थीं, तो आम लोगों की डायरी में जगह भी बनाती थीं। यही कारण है कि उनकी लोकप्रियता साहित्यिक मंचों से निकलकर आम जनमानस तक पहुंची।

देश ने उन्हें पद्मश्री जैसे सम्मान दिए, लेकिन उनका असली सम्मान करोड़ों चाहने वालों के दिलों में था। अंतिम दिनों में वे डिमेंशिया जैसी बीमारी से जूझ रहे थे और याददाश्त कमजोर हो चुकी थी। यह विडंबना ही है कि जिसने लोगों को यादगार शेर दिए, वही धीरे-धीरे यादों से दूर होता गया।

आज जब बशीर बद्र नहीं हैं, तब महसूस होता है कि उर्दू शायरी का एक पूरा दौर विदा हो गया। लेकिन सच्चे शायर कभी मरते नहीं। वे अपने अल्फ़ाज़ में ज़िंदा रहते हैं — महफ़िलों में, किताबों में और लोगों की तन्हाइयों में।

बशीर बद्र साहब को विनम्र श्रद्धांजलि।

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