सम्पादकीय

नीट परीक्षा रद्द लेकिन संकट अभी जारी है

ज़रा एक क्षण के लिए उन लाखों बच्चों की मनःस्थिति की कल्पना कीजिए जिन्होंने इस वर्ष 12वीं की परीक्षा दी, मेडिकल प्रवेश के लिए नीट की तैयारी की, इंजीनियरिंग के लिए जेईई मेन्स दिया और अपने भविष्य के सपनों को साकार करने की उम्मीद में दिन-रात मेहनत की। उनकी उम्र मुश्किल से 17 या 18 वर्ष होगी। यह वह उम्र होती है जब जीवन संभावनाओं से भरा दिखाई देता है। लेकिन आज वही बच्चे अनिश्चितता, निराशा और मानसिक तनाव के ऐसे दौर से गुजर रहे हैं, जिसके लिए वे जिम्मेदार नहीं हैं। क्या यह उनका कड़वा अनुभव नहीं होगा जो इस देश की व्यवस्था से उनका विश्वास डिगा देंगे ।

                         नीट परीक्षा का मामला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। तीन मई को परीक्षा देकर लाखों छात्र और उनके परिवार राहत की सांस ले रहे थे। वर्षों की तैयारी के बाद उन्हें लगा था कि अब परिणाम की प्रतीक्षा करनी है। लेकिन पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली की विफलताओं ने सब कुछ उलट दिया। परीक्षा रद्द हुई और छात्रों को फिर से परीक्षा देने के लिए मजबूर होना पड़ा। जिस बच्चे ने मानसिक रूप से एक कठिन परीक्षा पूरी कर ली थी, उसे फिर उसी तनाव और दबाव के चक्र में लौटना पड़ा। यह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि लाखों युवाओं की भावनाओं पर सीधा आघात है।लेकिन संकट यहीं समाप्त नहीं होता। 12वीं बोर्ड परीक्षा के परिणामों ने एक और गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है। इस वर्ष उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन के लिए ऑनस्क्रीन मार्किंग प्रणाली लागू की गई। तकनीक का उपयोग स्वागतयोग्य है, लेकिन यदि उसका परिणाम व्यापक असंतोष और अविश्वास के रूप में सामने आए तो उसकी समीक्षा आवश्यक हो जाती है। बड़ी संख्या में छात्र अपने अंकों से असंतुष्ट हैं। कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जहाँ प्रतियोगी परीक्षाओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले छात्र बोर्ड परीक्षा में अपेक्षा से बहुत कम अंक प्राप्त कर सके। यह मानना कठिन है कि जेईई मेन्स में 90 पर्सेंटाइल प्राप्त करने वाला छात्र 12वीं में 75 प्रतिशत अंक भी न ला सके। यदि ऐसे मामले अपवाद नहीं बल्कि बड़ी संख्या में सामने आ रहे हैं, तो यह मूल्यांकन प्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। संभव है कि सभी दावे सही न हों, लेकिन जब लाखों छात्र पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन कर रहे हों, तब व्यवस्था को आत्ममंथन करना चाहिए, न कि शिकायतों को मात्र भावनात्मक प्रतिक्रिया मानकर खारिज कर देना चाहिए। सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि पुनर्मूल्यांकन की प्रक्रिया भी छात्रों के लिए एक नई परीक्षा बन गई है। पोर्टल का बार-बार क्रैश होना, आवेदन प्रक्रिया में तकनीकी समस्याएँ और सीमित समय सीमा ऐसे युवाओं की चिंता और बढ़ा रही हैं जो पहले से ही परिणामों को लेकर तनाव में हैं। यदि लगभग दो लाख छात्र कुछ ही दिनों में पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन करते हैं, तो यह केवल तकनीकी समस्या नहीं बल्कि विश्वास के संकट का संकेत है।

                                      दरअसल समस्या परीक्षा, अंक या परिणाम से कहीं बड़ी है। समस्या यह है कि हमारी व्यवस्था छात्रों को एक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि आंकड़ों के रूप में देखने लगी है। किसी फाइल में दर्ज एक संख्या, किसी सर्वर पर अपलोड एक डेटा या किसी रिपोर्ट का एक प्रतिशत। लेकिन इन आंकड़ों के पीछे सपने हैं, संघर्ष हैं, परिवारों की उम्मीदें हैं और एक पूरी पीढ़ी का भविष्य है।सरकारों का दायित्व केवल परीक्षा आयोजित करना नहीं है। उनका दायित्व यह भी है कि युवाओं का विश्वास बना रहे। यदि परीक्षा प्रणाली पर भरोसा टूटेगा, यदि मूल्यांकन पर संदेह बढ़ेगा और यदि शिकायत निवारण व्यवस्था असंवेदनशील होगी, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान देश को ही होगा। प्रतिभाशाली युवा व्यवस्था से निराश होंगे और यह निराशा किसी भी समाज के लिए शुभ संकेत नहीं है।आज आवश्यकता दोषारोपण की नहीं, बल्कि संवेदनशीलता की है। सरकार, परीक्षा एजेंसियों और शिक्षा बोर्डों को यह समझना होगा कि वे सिर्फ परीक्षाएँ नहीं करा रहे हैं, बल्कि करोड़ों युवाओं के भविष्य का प्रबंधन कर रहे हैं। हर निर्णय लेते समय उन्हें यह याद रखना चाहिए कि फाइलों के पीछे इंसान हैं, और उन इंसानों के सपनों का मूल्य किसी भी प्रशासनिक सुविधा से कहीं अधिक है।किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसकी इमारतों, सड़कों या आर्थिक आंकड़ों से नहीं होती। उसकी पहचान इस बात से होती है कि वह अपने युवाओं के साथ कैसा व्यवहार करता है। आज यह प्रश्न हमारे सामने खड़ा है—क्या हम अपने बच्चों को अवसर दे रहे हैं, या उन्हें ऐसी व्यवस्था के हवाले कर रहे हैं जहाँ उनका संघर्ष और उनकी पीड़ा केवल एक आंकड़ा बनकर रह जाती है? और इस व्यवस्था में सुधर की कोई समयसीमा तय है भी की नहीं ! #bharatbhvh

अभिषेक तिवारी भारतभवः 

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