सम्पादकीय

पश्चिम बंगाल में कमल का खिलना – सबसे बड़ी जीत!

हाल ही में हुए 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में कई बड़े राजनीतिक संदेश छिपे हैं राज्य सरकारों की वापसी और राजनीतिक बदलाव ने एक बार फिर जनता की अंगुली में छिपी लोकतंत्र की ताकत दिखाई है लेकिन यदि किसी एक परिणाम ने राष्ट्रीय राजनीति की दिशा बदलने का संकेत दिया है तो वह है पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत। लंबे संघर्ष लगातार राजनीतिक हिंसा वैचारिक टकराव और संगठनात्मक मेहनत के बाद आखिरकार बंगाल की धरती पर कमल खिल गया है। यह जीत केवल एक राज्य की सत्ता प्राप्ति नहीं बल्कि भाजपा के लिए एक वैचारिक रणनीतिक और मनोवैज्ञानिक विजय है। और दशकों बाद मिली इस जीत की बढ़त भाजपा के लिये दशकों तक रहने वाली है

पश्चिम बंगाल लंबे समय तक वामपंथ का गढ़ रहा 34 वर्षों तक वाम मोर्चा का शासन और उसके बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस का मजबूत वर्चस्व जिसे संघर्ष से खींचा गया था इन दोनों के बीच भाजपा के लिए जगह बनाना आसान नहीं था। लेकिन नई भाजपा ने बंगाल में सत्ता हासिल करने को एक मिशन की तरह लिया और उसमें 12 साल बाद सफलता भी पाई । 2014 से पहले बंगाल में भाजपा का राजनीतिक अस्तित्व लगभग नगण्य था। लेकिन लोकसभा चुनावों से लेकर पंचायत नगर निकाय और विधानसभा तक पार्टी ने धीरे.धीरे अपनी जमीन तैयार की। यह सफर केवल चुनावी नहीं बल्कि वैचारिक संघर्ष भी था।भाजपा कार्यकर्ताओं ने बंगाल में वर्षों तक राजनीतिक हिंसा विरोध और सामाजिक प्रतिरोध का सामना किया। कई क्षेत्रों में पार्टी संगठन खड़ा करना ही चुनौती था। लेकिन भाजपा कार्यकर्ताओं ने इन हालातों में भी हार नहीं मानी और सत्ताधारी दल के तमाम हथकंडो का डटकर मुकाबला किया । केंद्रीय नेतृत्वविशेषकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने बंगाल को रणनीतिक प्राथमिकता दी। और पिछले चुनावों में हुई बारीक गलतियों से सबक लेकर 2026 के चुनाव को अपने अस्तित्व से जोड़ा गया । बूथ स्तर तक संगठन विस्तार का तानाबाना बुना गया ममता बर्नजी के कोर बोटर माने जाने वाले महिला वोट बैंक में सेंध लगाई और युवा मतदाताओं पर फोकस कर बेरोजगारी के मुददे को हवा दी हिंदुत्व और सांस्कृतिक पहचान का विमर्श को लगातार चर्चाओं में रहने दियाभ्रष्टाचार कट मनी और तुष्टिकरण के आरोप से राज्य सरकार की मजबूत घेराबंदी की केंद्रीय योजनाओं के लाभार्थियों से सीधा संवाद किया और राज्य सरकार पर योजनाओं के लाभ से वंचित करने के आरोप लगायेइन सभी प्रयासों ने भाजपा को विपक्ष से सत्ता के केंद्र तक पहुंचाया।

बंगाल में जीत भाजपा के लिए केवल सीटों की जीत नहीं बल्कि उस नैरेटिव की जीत है जिसमें पार्टी ने राष्ट्रवाद बनाम तुष्टिकरण और विकास बनाम भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया। यह संदेश पूरे देश में गया है कि भाजपा अब केवल हिंदी पट्टी की पार्टी नहीं रही। उत्तर प्रदेश गुजरात मध्यप्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में भाजपा पहले से मजबूत थी लेकिन पूर्वी भारत विशेषकर बंगाल उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती था।बंगाल की जीत से पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत में पार्टी की पकड़ और मजबूत होगी।ममता बनर्जी राष्ट्रीय विपक्ष की एक मजबूत आवाज मानी जाती रही हैं। यदि बंगाल में उनकी सत्ता कमजोर होती है तो विपक्षी एकता की राजनीति पर भी असर पड़ेगा।यह 2029 की राष्ट्रीय राजनीति के लिए बड़ा संकेत है। बंगाल में लोकसभा की 42 सीटें हैं। यदि विधानसभा में भाजपा मजबूत सरकार बनाती है तो इसका सीधा असर लोकसभा चुनावों पर भी पड़ेगा। इसलिए यह जीत दिल्ली की सत्ता के समीकरण तक जाती है। तो सवाल यह है कि इन चुनाव परिणामों में विपक्ष के लिये क्या संदेश छिपा है यह परिणाम केवल तृणमूल कांग्रेस की हार नहीं बल्कि विपक्ष के लिए एक चेतावनी है कि केवल भाजपा विरोध से राजनीति नहीं चलेगी। जनता अब परिणाम विकास और प्रशासनिक विश्वसनीयता चाहती है। बंगाल ने एक बार फिर साबित किया है कि लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता का होता है।और इस बार जनता ने संदेश साफ दिया है परिवर्तन केवल नारा नहीं सत्ता का निर्णय भी बन सकता है।

अभिषेक तिवारी 

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