सम्पादकीय

मध्यप्रदेश – दतिया की बेटी और व्यवस्था की विफलता

इस देश में आज भी रोज सुबह अमूमन हर आदमी सबसे पहले खबरों की जुगाली ही करता है कोई मुंह से तो कोई दिमाग से लेकिन कुछ ख़बरें आँखों से यूँ टकराती है कि दिमाग और मुंह दोनों सुन्न हो जाते है और सीधे हमारी आत्मा रुहांसि हो जाती है डर  जाती है और काँप भी जाती है कि यह सब हमरे समाज में आसपास ही हो रहा है और इन सबमे वह व्यवस्था भी शामिल है जिसके भरोसे एक आम आदमी खुशहाल जीवन का सपना संजोता है ।

                       मध्यप्रदेश के दतिया से आई यह खबर केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि हमारी व्यवस्था, पुलिस तंत्र और सामाजिक संवेदनहीनता पर एक कठोर प्रश्नचिह्न है।
एक पीएचडी छात्रा, जिसने 9 दिनों में 5 बार पुलिस से दुष्कर्म की शिकायत दर्ज कराने की गुहार लगाई, अंततः न्याय न मिलने की निराशा में फांसी लगाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। यह केवल आत्महत्या नहीं, बल्कि व्यवस्था द्वारा की गई एक धीमी हत्या है। इस एक लाइन को पढ़कर दिमाग तय नहीं कर पता कि आखिर असली दोषी कौन है ।

                       समाचार के अनुसार, पीड़िता लगातार संबधित थाना टीआई से शिकायत करती रही। उसे बार-बार यही कहा गया—“पहले आरोपी को पकड़ेंगे, तब एफआईआर होगी।” यह कथन न केवल कानून की मूल भावना के विरुद्ध है, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों की भी अवहेलना है। दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराध में तत्काल एफआईआर दर्ज करना पुलिस की कानूनी जिम्मेदारी है, न कि विवेकाधीन विकल्प। सबसे पीड़ादायक तथ्य यह है कि एक युवती, जो उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही थी, जिसने अपने भविष्य के सपने देखे होंगे, उसे न्याय की चौखट पर बार-बार ठुकराया गया। जब संस्थाएं सुरक्षा देने के बजाय मौन हो जाएं, तब व्यक्ति का विश्वास टूटता है। और जब विश्वास टूटता है, तब समाज हारता है।

इस घटना ने एक बार फिर यह सिद्ध किया है कि महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता केवल भाषणों और अभियानों तक सीमित है। “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” जैसे नारे तब खोखले लगते हैं, जब एक बेटी न्याय के लिए दर-दर भटकती है और अंततः अपनी जान दे देती है।यह भी चिंताजनक है कि पीड़िता ने अपने सुसाइड नोट में स्पष्ट रूप से पुलिस की लापरवाही का उल्लेख किया। इसका अर्थ है कि यह केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं, बल्कि संस्थागत असफलता है। यदि समय रहते शिकायत दर्ज होती, मेडिकल परीक्षण होता, आरोपी पर कार्रवाई होती—तो शायद एक जीवन बचाया जा सकता था।अब सवाल केवल आरोपी की गिरफ्तारी का नहीं है। सवाल यह है कि क्या संबंधित पुलिस अधिकारियों पर भी वैसी ही कठोर कार्रवाई होगी? क्या लापरवाही को केवल विभागीय जांच तक सीमित कर दिया जाएगा? यदि ऐसा हुआ, तो यह न्याय नहीं, औपचारिकता होगी।

                               यह मामला हमें बताता है कि भारत में कानून की कमी नहीं, बल्कि उसके ईमानदार क्रियान्वयन की कमी है। पुलिस सुधार, जवाबदेही और महिला सुरक्षा को केवल चुनावी मुद्दा नहीं, प्रशासनिक प्राथमिकता बनाना होगा। दतिया की यह बेटी अब लौटकर नहीं आएगी, लेकिन उसका प्रश्न जीवित रहेगा—“जब मैंने बार-बार मदद मांगी, तब व्यवस्था कहाँ थी?” यदि इस प्रश्न का उत्तर हम ईमानदारी से नहीं खोज पाए, तो अगली खबर किसी और शहर, किसी और बेटी की होगी। नहीं तो नेताओं के भासणो में नारी वंदन कि गाथाएं हम आगे भी सुनते रहेंगे । खैर दतिया कि उस बेटी ने जैम सरे सिस्टम से हारकर मौत को गले लगाने का निर्णय लिया होगा तब उन आखिर के लम्हो में भी उसे उसी न्याय कि उम्मीद रही होगी जो उसे जीते जी न मिल सका और मरने के बाद भी उसे उसका इन्तजार है और भरोषा भी जो उसके इन अल्फांजो में झलकते है । – अभिषेक तिवारी 

“मैं मरने जा रही हूं। कारण है मेरा दोस्त योगेश और उसकी दो बहनें। योगेश ने मुझे ब्लैकमेल किया कि वह मर जाएगा या मार देगा। धमकी दी कि मेरे फोटो और वीडियो वायरल कर देगा। मैं थाने गई, वहां भी कार्रवाई चल रही है।

इसके बावजूद उसकी बहन पूनम और प्रियंका ने मेरे घर आकर हंगामा किया। मेरी दीदी के ससुराल जाकर वहां धमकी दी। इसके बाद ग्वालियर आकर मुझे जान से मारने की धमकी दी। गाली-गलौज की।

गली में चिल्ला-चिल्ला कर मुझे बदनाम किया। इन सब से मुझे तो दिक्कत हो ही रही है, मेरे घर वाले भी परेशान हैं। इसकी पूरी जानकारी योगेश को है। पुलिस से निवेदन है कि योगेश, पूनम और प्रियंका को सजा दी जाए, जिससे आगे कभी ये किसी की जिन्दगी ऐसे नर्क न बनाएं कि इंसान को इतना मजबूर होना पड़े।”

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