सम्पादकीय

मिलावट – भारत की छुपी हुई लेकिन गंभीर बीमारी

आज के इस बदलते परिवेश में क्या आपने गौर किया है कि नई तकनीक ने किस कदर हमारी जीवनशैली को प्रभावति किया है हां किया है और इस बात पर चर्चाएं भी जोरों पर है अस्सी के दशक में आये टलीविजन से लेकर नई सदी के मोबाइल ने और फिर सोशल मीडिया के तेज बहाव के साथ हमारी जीवनशैली पूरी तरह से बदली हुई है । लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा नुकसान हमारी भोजन करने की परंपरा को हुआ है और इसका सबसे बड़ा कारण है खाद्ध सामग्री में पुरजोर मिलावट ।भारत में मिलावट की समस्या एक गंभीर सामाजिक, स्वास्थ्य और आर्थिक चुनौती बन चुकी है।
खाने में ज़हर का होना जीवन में खतरा होना है । यह कोई अलंकारिक वाक्य नहीं, बल्कि आज के भारत की कड़वी सच्चाई है।
भोजन, दवाइयों,दूध, तेल, मसाले, यहां तक कि हवा और पानी में भी मिलावट आम बात हो गई है।मुनाफे की अंधी दौड़ ने मानव जीवन को दांव पर लगा दिया है। क्या आज के दौर में एसा कुछ भी नहीं है जो अपने वास्तविक स्वरूप में हमारे सामने हो क्या सबकुछ मिलावटी है ।

मिलावट का अर्थ है किसी उत्पाद में जानबूझकर नकली निम्न गुणवत्ता वाले या हानिकारक तत्वों को मिलाना ताकि लागत घटे और लाभ बढ़े।यह केवल आर्थिक धोखाधड़ी नहीं बल्कि जनस्वास्थ्य पर सीधा हमला है।

भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण FSSAI की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार 25 प्रतिशत से अधिक खाद्य नमूने मानकों पर खरे नहीं उतरते।

दूध, मावा, मसाले, तेल, और मिठाइयों में सबसे ज़्यादा मिलावट पाई गई।

NCRB 2022 की रिपोर्ट के अनुसार,

देश में हर साल हज़ारों केस मिलावटी वस्तुएँ बेचने के दर्ज होते हैं।लेकिन दोषियों को सज़ा मिलने की दर बेहद कम है। यह तथ्य और अधिक चौकाता है कि यदि मिलावट किसी व्यक्ति के जीवन के साथ सीधा खिलवाड़ है तो फिर उस पर कानून की सख्ती क्यों नहीं होती जबकि खाद पदार्थो में मिलावट सीधे हमारे स्वास्थ पर हमला है भारत में इन गंभीर भ्रष्टाचार के लिये कानून तो खख्त है लेकिन वह अंतिम छोर पर आते आते दम तोड़ देता है ।भारत में खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियमए 2006 लागू है जिसके अंतर्गत मिलावट साबित होने पर ₹10 लाख तक का जुर्माना और 6 महीने से लेकर आजीवन कारावास तक की सज़ा हो सकती है।

लेकिन समस्या यह है कि जाँच की रफ्तार धीमी है । भ्रष्टाचार और राजनीतिक दबाव केस को कमज़ोर कर देते हैं , उपभोक्ता अक्सर शिकायत दर्ज ही नहीं करतेपर एंसा नहीं है कि इस समस्या का कोई समाधान ही नहीं है अगर सरकार और नागरिक इसे गंभीरता से लें तो सुधार संभव है सख़्त निगरानीए नियमित जाँच , फ़ास्ट.ट्रैक कोर्ट्स में मुकदमे , खाद्य निरीक्षकों की जवाबदेही से जहां इसे प्रशासनिक तौर पर हल किया जा सकता है तो जनता भी इन विषयो पर जाकरूक होकर इस बीमारी से बाहर आ सकती है आज के दौर में मिलावट एक अदृश्य महामारी बन चुकी है जो हमारे शरीर समाज और सिस्टम को भीतर से खोखला कर रही है। ज़रूरत है कि हम न केवल उपभोक्ता बल्कि जागरूक नागरिक बनें।जब हर नागरिक सवाल करेगा तभी मिलावट की दुकानें बंद होंगी। साफ़ सोचिए सही खरीदिए तभी हम एक सुरक्षित भारत बना पाएंगे। इसके साथ ही मिलावट करने वाले भी नैतिकता के साथ इस कृत्य के दुष्परिणामो को समझें ।

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