छात्रों के सवाल पर सियासत क्यों खामोश है ?

छात्रों के सवाल पर सियासत क्यों खामोश है ?

भारत में बीते  एक महीने में दो बड़े छात्र आंदोलन ने बेपटरी और मनमर्जी से चल रही शिक्षा व्यवस्था को ललकारा है । दिल्ली के जंतर-मंतर से उठी छात्रों की आवाज अब झारखंड तक पहुंच गई है। परीक्षा में कथित गड़बड़ियों और पेपर लीक जैसे आरोपों से नाराज छात्र सड़क पर हैं, लेकिन सवाल यह है कि जब युवाओं के भविष्य से जुड़ा मुद्दा सामने आता है, तो राजनीतिक दलों और मीडिया की आवाज अचानक धीमी क्यों पड़ जाती है? दिल्ली के आंदोलन में प्रधानमंत्री के घर के बहार धरना देने वाला विपक्ष झारखण्ड के मुद्दी पर चुप है । छात्र आंदोलन किसी पार्टी का आंदोलन नहीं होता। वह उस पीढ़ी की बेचैनी का प्रतिनिधित्व करता है, जिसके हाथ में किताबें हैं, आंखों में नौकरी का सपना है और सामने प्रतियोगी परीक्षाओं की लंबी कतार। एक परीक्षा की तैयारी में युवा महीनों नहीं, कई बार वर्षों लगा देता है। उसके साथ परिवार की उम्मीदें और आर्थिक संसाधन भी जुड़े होते हैं। ऐसे में यदि परीक्षा व्यवस्था पर सवाल उठता है या पेपर लीक की आशंका पैदा होती है तो नुकसान केवल एक परीक्षा का नहीं होता—युवा का भरोसा टूटता है।

                                       दिल्ली में छात्रों का आंदोलन हो या झारखंड में परीक्षा को लेकर उठ रही आवाजें, दोनों जगह एक सवाल समान है—क्या सरकारें युवाओं को केवल चुनाव के समय याद करती हैं? और क्या छात्र राजनैतिक दलों के लिए मात्र वोट बैंक है दिल्ली आंदोलन के बाद देश के बड़े नेता रील बनाकर जेन जी को रिझाने में लगे हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों या फिर राहुल गाँधी मोहन भगवत सभी जेन जी को इम्प्रेस कर रहे है लेकिन क्या जेन जी का आंदोलन इसलिए था की आप उनकी तरह लाइफ स्टाइल अपनाये या फिर इसलिए की देश की शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार हो ! सबसे चिंताजनक बात यह है कि छात्र आंदोलनों को भी राजनीतिक चश्मे से देखा जाने लगा है। यदि आंदोलन सरकार के खिलाफ है तो विपक्ष उसे अपना मुद्दा बनाना चाहता है, लेकिन कई बार उसकी सक्रियता भी चयनात्मक दिखाई देती है। दूसरी तरफ सत्ता पक्ष के सामने समस्या यह है कि वह हर विरोध को विपक्ष की राजनीति बताकर असली सवाल से बचने की कोशिश कर सकता है।लेकिन छात्रों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनकी समस्या सत्ता की है या विपक्ष की।उन्हें चाहिए निष्पक्ष परीक्षा, पारदर्शी व्यवस्था और अपने भविष्य की सुरक्षा।अगर पेपर लीक हुआ है तो दोषियों तक पहुंचना चाहिए। अगर परीक्षा प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। और अगर आरोप गलत हैं तो सरकार को तथ्यों के साथ सामने आकर छात्रों के संदेह दूर करने चाहिए।

                                      जंतर मंतर पर हुए आंदोलन ने मीडिया की भूमिका पर भी सवाल खड़े किये है लोकतंत्र में मीडिया की जिम्मेदारी केवल सत्ता के बयान दिखाना नहीं है। जिस मुद्दे पर हजारों छात्र सड़क पर हों, उस मुद्दे की पड़ताल करना भी पत्रकारिता का दायित्व है।दुर्भाग्य से आज खबर की प्राथमिकता कई बार इस बात से तय होती दिखाई देती है कि उसमें राजनीतिक टीआरपी कितनी है। किसी बड़े नेता का बयान सुर्खियां बन जाता है, लेकिन परीक्षा केंद्र के बाहर खड़े उस छात्र की आवाज पीछे छूट जाती है जिसने अपना एक साल दांव पर लगाया है।आज का युवा पहले की तुलना में ज्यादा जागरूक है। वह सोशल मीडिया के जरिए सूचनाएं जुटाता है, सवाल पूछता है और अपने अधिकारों को समझता है और अपनी ताकत का अहसास भी करता है ।यही कारण है कि छात्र आंदोलन को केवल भीड़ या राजनीतिक प्रदर्शन मानना बड़ी भूल होगी। इसलिए दिल्ली हो या झारखंड—छात्रों की आवाज को सत्ता बनाम विपक्ष की लड़ाई में नहीं बदलना चाहिए उसके भविष्य के साथ राजनीति नहीं, न्याय होना चाहिए।

अभिषेक तिवारी 

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