भारतीय जनता पार्टी और केंद्र सरकार की एक विशेषता है—वह अपने हर बड़े फैसले के समर्थन में समय के साथ नया तर्क खोज लेती है। यदि कोई नीति अपने मूल उद्देश्य पर खरी नहीं उतरती, तो उसके पक्ष में एक नया नैरेटिव तैयार कर दिया जाता है। ई-20 (20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित) पेट्रोल इसका ताजा उदाहरण बनता दिखाई दे रहा है।जब पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की नीति शुरू हुई थी, तब सरकार ने इसके पीछे दो बड़े उद्देश्य बताए थे। पहला—विदेश से कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम होगी, और दूसरा—देशवासियों को अपेक्षाकृत सस्ता ईंधन मिलेगा। लेकिन वर्षों बाद यदि आम नागरिक अपने अनुभव के आधार पर इस नीति को परखे, तो तस्वीर अलग नजर आती है।
जब एथेनॉल मिश्रण की शुरुआत हुई थी, तब देश के कई हिस्सों में पेट्रोल की कीमत करीब 60 रुपये प्रति लीटर थी। आज लगभग सभी पेट्रोल पंपों पर सामान्य पेट्रोल की जगह ई-20 पेट्रोल उपलब्ध है, लेकिन कीमत 100 रुपये प्रति लीटर के आसपास पहुंच चुकी है। यानी जिस नीति से राहत मिलने की उम्मीद थी, वह आम आदमी की जेब को कोई राहत नहीं दे सकी।यही नहीं, कच्चे तेल के आयात में उल्लेखनीय कमी आने का दावा भी आम चर्चा का विषय नहीं रह गया है। अब सरकार और भाजपा के नेताओं की ओर से इस नीति के समर्थन में एक नया संदेश सामने आ रहा है।
भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और राज्यसभा सांसद विनोद तावड़े ने सोशल मीडिया पर लिखा—
“ई-20 की हर बूंद में किसान का सम्मान, हर सफर में आत्मनिर्भर भारत का अभिमान।”
निस्संदेह, यदि गन्ना उत्पादक किसानों को एथेनॉल उद्योग से लाभ मिलता है तो यह स्वागतयोग्य बात है। किसानों की आय बढ़ाना किसी भी सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या किसी नीति का मूल्यांकन उसके घोषित उद्देश्यों के आधार पर नहीं होना चाहिए? यदि जनता से कहा गया था कि इससे पेट्रोल सस्ता होगा और आयात बिल घटेगा, तो इन दोनों दावों पर सरकार को स्पष्ट जवाब देना चाहिए। यदि अब नीति का मुख्य आधार किसानों का हित है, तो सरकार को यह भी बताना चाहिए कि किसानों को वास्तविक आर्थिक लाभ कितना मिला, किन राज्यों को मिला और इसका बोझ उपभोक्ता पर कितना पड़ा।नीतियां समय के साथ बदल सकती हैं, उनके उद्देश्य भी विस्तृत हो सकते हैं। लेकिन लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण चीज पारदर्शिता और जवाबदेही है। सरकार को यह बताना चाहिए कि मूल वादों का क्या हुआ और यदि परिस्थितियां बदली हैं तो उसके कारण क्या हैं।
आखिरकार, किसानों का सम्मान और उपभोक्ताओं का हित—दोनों साथ-साथ चल सकते हैं। देश को ऐसे विमर्श की जरूरत है जिसमें आंकड़ों और तथ्यों के आधार पर चर्चा हो, न कि केवल बदलते राजनीतिक नारों के सहारे।
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