लोकतंत्र-मंत्र

मुसलमानों पर मोहन भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागव ने ‘पांचजन्य’ साप्ताहिक को दी गई एक भेंट वार्ता में ऐसी कई बातें कही हैं, जिन पर देश के लोगों और खास तौर से संघ के स्वयंसेवकों को विशेष ध्यान जाना चाहिए। उन्होंने पहली बात यह कही है कि भारत के मुसलमानों को किसी से डरने की जरुरत नहीं है। उन्हें वैसे ही निर्भय रहना चाहिए, जैसे अन्य भारतीय रहते हैं। आजकल देश और विदेशों के कई बुद्धिजीवी यह महसूस करते हैं कि जब से मोदी सरकार कायम हुई है, भारत के मुसलमान बहुत डर गए हैं। कुछ हद तक यह बात सही है लेकिन इसका मूल कारण यह सरकार उतना नहीं है, जितना कि कुछ सिरफिरे ‘हिंदुत्ववादी लोग’ हैं, जो कि नफरत फैलाते हैं और अपने व्यवहार से लोगों में डर पैदा करते हैं। भाजपा सरकार को इन उग्रवादी और तथाकथित ‘हिंदुत्ववादियों’ के खिलाफ सख्त कदम उठाने में कोताही क्यों करनी चाहिए? सच्चाई तो यह है कि वे हिंदुत्व की मूल भावना को समझते ही नहीं हैं। उनमें यूरोप और अरब देशों की मजहबी अतिवादिता दिखाई पड़ती है। मजहब के नाम पर उन मुल्कों में अब भी भयंकर अत्याचार जारी हैं। यह विदेशी मजहबी अंधापन आप भारत में भी देख सकते हैं। कोई यहोवा या अल्लाह को माने, इसमें कोई बुराई नहीं है लेकिन इसके लिए अरबों और गोरों की नकल करना क्या जरुरी है? कोई व्यक्ति किसी धर्म या विचारधारा को माने लेकिन उसके पहले वह अपने आप को सच्चा और पक्का भारतीय बनाए, क्या यह जरुरी नहीं है?

अब आप देखें कि सउदी अरब के वर्तमान शासक शाहजादे सलमान ने तथाकथित अरबी और इस्लामी परंपराओं में कितने बड़े बदलाव कर दिए हैं। मोहन भागवत हमारे मुसलमानों से भी यह बराबर कहते रहे हैं कि उनका और हिंदुओं का डीएनए एक ही है। क्या किसी हिंदू या मुसलमान नेता ने आज तक ऐसी बात कही है? उनकी इस बात से कई पोंगापंथी मुसलमान और हिंदू चिढ़ भी सकते हैं लेकिन भारत ही नहीं, संपूर्ण दक्षिण और मध्य एशिया के देशों को जोड़ने में यह कथन निर्णायक भूमिका निभाएगा। मोहन भागवत मस्जिदों में गए और इमामों से उन्होंने संवाद किया, क्या यह कम बड़ी बात है? यह ठीक है कि भारत के मुसलमानों ने कई मजबूरियों में इस्लाम को कुबूल कर लिया लेकिन वे विदेशी आंक्रांताओं के वारिस नहीं हैं। उन आक्रांताओं की संतानें भी अब पूर्णरूपेण भारतीय हो गई हैं। यह ठीक है कि लगभग हजार साल तक विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत को दबाने की कोशिश की है और उसके विरुद्ध भारतीय लोग लगातार लड़ते रहे हैं लेकिन वह वैमनस्य और वह अहंकार किसी भी रूप जिंदा नहीं रहना चाहिए। मोहनजी ने इस बात पर भी जोर दिया है कि भारतीयों पर इस समय कोई विदेशी आक्रमण तो नहीं हो रहा है लेकिन भारत विदेशियों का नकलची बन रहा है। वह उनकी भोगवादी प्रवृत्तियों को अपना रहा है। मोहन भागवत के इस कथन पर हमारे देश के तथाकथित नेता गण, खासकर भाजपा के लोग ध्यान दें, यह जरुरी है। सच्ची भारतीयता तो ‘त्येन त्यक्तेन भुंजीथा’ याने त्याग के साथ उपभोग में ही निवास करती है।

आलेख श्री वेद प्रताप वैदिक जी, वरिष्ठ पत्रकार ,नई दिल्ली।

साभार राष्ट्रीय दैनिक  नया इंडिया  समाचार पत्र  ।

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