लोकतंत्र-मंत्र

केरल का मार्क्सवादी दुराग्रह

केरल की मार्क्सवादी सरकार का दुराग्रह अपनी चरम सीमा पर पहुंचा हुआ है। सत्तारुढ़ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने अपने राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने राज्यपाल को केरल के विश्वविद्यालयों के कुलपति पद से हटाने के लिए एक अध्यादेश तैयार कर लिया है और अब विधानसभा का सत्र बुलाकार वे अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रस्ताव भी पारित करना चाहते हैं। उनसे कोई पूछे कि राज्यपाल के हस्ताक्षर के बिना कौनसा प्रस्तावित अध्यादेश लागू किया जा सकता है और उनके दस्तखत के बिना कौनसा विधेयक कानून बन सकता है याने केरल की विजयन सरकार झूठ-मूठ की नौटंकी में अपना समय बर्बाद कर रही है।

जहां तक उप-कुलपतियों का सवाल है, उनकी नियुक्तियाँ विश्वविद्यालय अनुदान आयोग नियमों के अनुसार ही होनी चाहिए लेकिन उन नियमों का उल्लंघन करके आप अपने मनमाने उम्मीदवारों को चुन लें और फिर राज्यपाल से कहें कि वे आंख मींचकर उन पर मोहर लगा दें। राज्यपाल आरिफ खान ने इस मामले में दृढ़ता दिखाई है और ऐसे उप-कुलपतियों से इस्तीफे देने के लिए कहा है। आरिफ खान के इस दृष्टिकोण को भारत के सर्वोच्च न्यायालय और केरल के उच्च न्यायालय ने दो उप-कुलपतियों के मामलों में बिल्कुल सही ठहराया है।उन्होंने कहा है कि यदि राज्यों के विश्वविद्यालयों को वि.वि.अ. आयोग की मान्यता और वित्तीय सहायता मिल रही है तो उन्हें नियुक्तियों में उसके नियमों का पालन करना अनिवार्य है। केरल के विश्वविद्यालयों और सरकारी दफ्तरों में सारे नियमों को ताक पर रखकर मार्क्सवादी पार्टी के समर्थकों और कार्यकर्ताओं और नेताओं के रिश्तेदारों को भरा जा रहा है। अदालतों ने मार्क्सवादी नेताओं की पत्नियों को दी गई कई बड़ी नौकरियों को गैर-कानूनी घोषित कर दिया है।

कई अपराधी पार्टी कार्यकर्ताओं को सरकारी नौकरियां पकड़ा दी गई हैं ताकि उनके सहारे वे कानून की वैतरणी पार कर जाएं और दो साल की नौकरी के बाद जीवनभर पेंशन के मजे लूटते रहें। केरल की मार्क्सवादी पार्टी में यह राजनीतिक भ्रष्टाचार तो उसका शिष्टाचार बन गया है, लेकिन राजनीतिक शिष्टाचार की सारी मर्यादाएं उसने भंग कर दी हैं। 2019 में कन्नूर के समारोह में राज्यपाल पर हमला करनेवाले पार्टी कार्यकर्ता को दंडित करना तो दूर रहा, मुख्यमंत्री ने उसे अपने निजी स्टाफ में नियुक्त करके उसे सुरक्षा-कवच प्रदान कर दिया है। मर्यादा-भंग का ऐसा ही काम एक मंत्री ने भी कर दिखाया है। मुख्यमंत्री विजयन को शायद अंदाज नहीं है कि यदि वे यही अतिवादी रवैया बनाए रखेंगे तो वे केरल में कहीं राष्ट्रपति शासन को आमंत्रित न कर डालें और उसके साथ-साथ मार्क्सवाद की मिट्टी भी कहीं पलीत न कर दें।

 

आलेख श्री वेद प्रताप वैदिक जी, वरिष्ठ पत्रकार ,नई दिल्ली।

साभार राष्ट्रीय दैनिक  नया इंडिया  समाचार पत्र  ।

 

Share this...
bharatbhvh

Recent Posts

दतिया से भाजपा संदेश – दूसरी पीढ़ी को अवसर और वंशवाद को चुनौती

चौकाने वाली राजनीती की जनक मणि जाने वाली मोदी और शाह की नयी भाजपा ने…

12 hours ago

अयोध्या राम मंदिर- अखिलेश यादव बोले- मंदिर परिसर में काम करने वालों की CDR जांच हो

सपा प्रमुख ने राम मंदिर ट्रस्ट की न्यायिक जांच की भी उठाई मांग, भाजपा पर…

1 day ago

मध्यप्रदेश – पखवाड़े भर राजनीति का अखाड़ा बनेगा बुंदेलखंड

दतिया विधानसभा उपचुनाव के लिए नामांकन पत्र दाखिल करने के तीन दिन निकल जाने के…

2 days ago

राहुल गाँधी ने फिर लगाए पेपर लीक के आरोप

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी…

2 days ago

बारिश बनी आफत: महाराष्ट्र से दिल्ली तक तबाही

नई दिल्ली - भारतभवः देश भर में भरी वरिष्ठ का दौर वायनाड में भूस्खलन ने…

2 days ago

मध्यप्रदेश – अक्सर भूल होती है दिग्विजय को आंकने में

मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह एक ऐसा किरदार हैं जिनका आकलन करने में अक्सर…

4 days ago