कलमदार

मत जमा कीजिए

मत जमा कीजिए। सच कहूं तो ये बात जितनी साधारण लगती है, उतनी ही गहरी है। जीवन में जितनी ज़रूरत है, उतना ही रखिए। उससे ज्यादा जो भी है, वो सिर्फ सामान नहीं होता, वो आपके भीतर बैठा हुआ डर होता है, जो आपको चैन से जीने नहीं देता। खबरें देख रहा था। पेट्रोल पंप पर लंबी लाइनें लगी हुई हैं। लोग टैंक फुल करवा रहे हैं, जैसे कल से दुनिया रुक जाएगी। गैस के सिलेंडर घरों में जमा किए जा रहे हैं। कोई तेल उठा रहा है, कोई आटा, कोई चीनी। बाजार में कमी अभी आई भी नहीं है, लेकिन लोगों के मन में कमी पहले ही पैदा हो चुकी है। हम ये सब देख कर चुप हो जाते हैं। क्योंकि ये सिर्फ खबर नहीं है, ये इंसान के मन की हालत है। ये डर है, जो हमें जरूरत से ज्यादा लेने पर मजबूर करता है।कल एक रेस्त्रां वाले से बात हुई। उसने अपने स्टोर में इतना सामान भर लिया था कि जैसे महीनों का राशन जमा कर लिया हो। मैंने पूछा, भाई इतना क्यों?
वो बोला, क्या पता कल ये सब न मिले। अगर तेल खत्म हो गया, अगर चीनी नहीं मिली, तो मेरा काम कैसे चलेगा?मैंने उससे कहा, अगर हर आदमी तुम्हारी तरह सोचने लगे तो फिर सच में कुछ भी नहीं बचेगा। कमी हालात से नहीं आती, कमी पैदा की जाती है। और सबसे बड़ी बात, अगर हालात इतने खराब हो भी गए कि लोगों के पास खाने के पैसे नहीं होंगे, तो तुम्हारे रेस्त्रां में कौन आएगा? वो चुप हो गया।
क्योंकि सच अक्सर बहुत सीधा होता है, लेकिन हम उसे स्वीकार नहीं करना चाहते।
दरअसल जमाखोरी चीजों की नहीं होती, मन की होती है। हमें लगता है कि अगर हमने ज्यादा इकट्ठा कर लिया तो हम सुरक्षित हो जाएंगे। लेकिन सच्चाई ये है कि जितना ज्यादा हम जमा करते हैं, उतना ही असुरक्षित महसूस करते हैं।
मुझे एक सुबह याद आ रही है। गुड़गांव के एक बड़े होटल में ठहरा था। सुबह नाश्ते का समय खत्म होने वाला था। अनाउंसमेंट हुआ कि साढ़े दस बजे के बाद बुफे बंद हो जाएगा।
बस फिर क्या था। जैसे किसी ने लोगों के भीतर छिपे डर को जगा दिया हो।
लोग अपनी सीट से उठे और प्लेटों पर टूट पड़े। कोई फल भर लाया, कोई चार ऑमलेट का ऑर्डर दे रहा था। कोई इडली डोसा उठा लाया, तो कोई तीन तीन गिलास जूस लेकर बैठ गया। टोस्ट, मक्खन, शहद, सॉस, सब कुछ प्लेटों में भर लिया गया।
मै अपनी कुर्सी पर बैठे ये सब देख रहा था। सामने सिर्फ दूध और कॉर्नफ्लेक्स था। उन्हें पता था कि वो कितना खा सकते हैं।
लेकिन बाकी लोगों को भी तो पता था। हर आदमी अपनी भूख जानता है।
फिर भी वो जरूरत से ज्यादा क्यों उठा रहे थे?
क्योंकि उन्हें डर था कि थोड़ी देर बाद ये सब नहीं मिलेगा।
कुछ मांएं अपने बच्चों को जल्दी जल्दी खिला रही थीं। बच्चे मना कर रहे थे, लेकिन मांएं कह रही थीं कि खा लो, बाद में नहीं मिलेगा।
साढ़े दस बज गए। बुफे बंद हो गया। लोग अपनी सीटों पर बैठे थे, लेकिन अब उनके सामने चुनौती ये नहीं थी कि खाना मिलेगा या नहीं। चुनौती ये थी कि इतना सारा खाना खत्म कैसे होगा?
कोई दो तीन गिलास जूस नहीं पी सकता। कोई चार ऑमलेट नहीं खा सकता।
धीरे धीरे सब उठने लगे। प्लेटों में खाना बचा रह गया।
फल वैसे ही पड़े थे। जूस आधा भरा था। टोस्ट ठंडे हो चुके थे।
मैंने देखा, जिस डर में लोगों ने इतना सब इकट्ठा किया था, वही डर अंत में बेकार साबित हुआ। सब कुछ वहीं छूट गया।
यही जीवन है। हम सब अपनी अपनी प्लेट में जरूरत से ज्यादा भर रहे हैं। हमें लगता है कि ये सब हमारा है, ये सब हमें सुरक्षित रखेगा। लेकिन अंत में हम सब कुछ यहीं छोड़ कर चले जाते हैं।
हम जानते हैं कि हम सब कुछ इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे। हम जानते हैं कि हमारे बाद ये सब किसी और के काम आएगा या फिर बेकार चला जाएगा।
फिर भी हम जुटाते हैं।
क्यों? क्योंकि हमें डर लगता है। डर से बड़ा कोई अभाव नहीं होता। जिस दिन आप डर गए, उसी दिन आपने अपने हिस्से से ज्यादा लेना शुरू कर दिया।
आज जो लोग पेट्रोल भरवा रहे हैं, जो लोग सिलेंडर जमा कर रहे हैं, जो लोग राशन भर रहे हैं, वो सिर्फ चीजें नहीं जमा कर रहे, वो अपना डर जमा कर रहे हैं।
और ये डर कभी खत्म नहीं होता। आज पेट्रोल का डर है, कल पैसे का होगा, परसों नाम का होगा।
जीवन का सच बहुत सीधा है। दुनिया एक रेस्त्रां की तरह है। यहां हर किसी का समय तय है। हर किसी की भूख तय है।
आप चाहे जितना भी इकट्ठा कर लीजिए, आप उससे ज्यादा खा नहीं सकते। आप चाहे जितना भी जमा कर लीजिए, आप उसे अपने साथ ले नहीं जा सकते। मेरा मानना है, जिंदगी का मजा जीने में है, जमा करने में नहीं। जो लोग जमा करते रहते हैं, वो अक्सर जीना भूल जाते हैं। उनकी प्लेट भरी रहती है, लेकिन मन खाली रहता है।
और जो लोग जरूरत भर लेते हैं, वो हर कौर का स्वाद लेते हैं।
उन्हें पता होता है कि ये पल फिर नहीं आएगा।
इसलिए वो उतना ही लेते हैं, जितना उन्हें आनंद दे सके।
मत जमा कीजिए। क्योंकि जमाखोरी सिर्फ अनैतिक नहीं है, ये जीवन के खिलाफ है।
अगर हर आदमी सिर्फ उतना ही ले जितना उसे चाहिए, तो दुनिया में कभी कमी नहीं होगी। लेकिन अगर हर आदमी जरूरत से ज्यादा उठा ले, तो सबसे बड़ा भंडार भी छोटा पड़ जाएगा।
आज का समय हमें यही सिखा रहा है कि असली सुरक्षा बाहर नहीं, भीतर होती है।
अपने मन को भरोसा दीजिए। जो आज मिला है, वो कल भी मिलेगा। और अगर नहीं भी मिला, तो भी आप उतना ही खाएंगे, जितनी आपकी भूख है।
इसलिए आज एक छोटा सा फैसला कीजिए। घर में जगह बनाइए, दिल में भी जगह बनाइए। जितना चाहिए उतना रखिए। बाकी छोड़ दीजिए।
क्योंकि अंत में, सब कुछ यहीं रह जाना है।
जमा कीजिए, सुंदर यादों को। अच्छी कहानियों को।
– दमोह कलेक्टर के सरकारी फेस बुक एकाउंट से साभार कॉपी।
श्री सुधीर कुमार कोचर
लेखक मध्यप्रदेश में दमोह जिला कलेक्टर हैं ।

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