कलमदार

मध्यप्रदेश – कौंडियों से तय नहीं होती नेता की औकात

हम इक्कीसवीं सदी में आ जरूर गये लेकिन आज भी हमने किसी की कीमत आंकने के लिए रुपए को पैमाना नहीं बनाया. हम औकात नापने के लिए आज भी कोंडियों के मोहताज हैं, आखिर क्यों,?हाल ही में मप्र के पीएचडी उपाधि धारक मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव ने प्रतिपक्ष के नेता जीतू पटवारी को दो कौडी का नेता कहा. मुझे न बुरा लगा न हैरानी हुई, क्योंकि मुझे पता है कि मोहन बाबू किस शाखा के मृग हैं. जब उनके राष्ट्रीय नेता भाषा के मामले मैं विपन्न हैं तो उनसे भाषाई गांभीर्य की अपेक्षा क्यों करना?मोहन यादव चूंकि मुख्यमंत्री हैं इसलिए उनके कहे का महत्व है. वे गलत क्यों कहेंगे किसी के बारे में. जीतू पटवारी को वे मुख्यमंत्री के नाते मुझसे ज्यादा जानते हैँ. उन्हे विधानसभा के सभी 219 विधायकों की औकात पता होगी. होना चाहिए. मुख्यमंत्री को बताना चाहिए कि जीतू यदि दो कौडी की औकात नहीं रखते तो मप्र के मुख्यमंत्री की औकात कितनी कौडियों की है?कोंडी भारत की मुद्रा से बेहतर कल भी थी, आज भी है. कोडी के लिए टकसाल नहीं चाहिए , कच्चा माल नही चाहिए, कौडी की नकल नहीं हो सकती. कौंडी पसीने, पानी या तेल से खराब नही होती. कौंडी पर आप किसी का मोबाइल नंबर नहीं लिख सकते. कौंडी आखिर समुद्र की बेटी है.
मुझे मोहन यादव के इतिहास ज्ञान पर भी पूरा भरोसा है. वे जानते होंगे कि जीतू पटवारी जिस कांग्रेस का पठ्ठा है उसी कांग्रेस ने 2018 में 15 साल मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान को घर बैठा दिया था. फिर मोहन जी को तो अभी जुम्मा  जुम्मा ढाई साल ही हुए हैं.मैं मुख्यमंत्री मोहन यादव से आजतक मिला नहीं क्योंकि मेरी औकात तो जीतू पटवारी जितनी भी नहीं है तथापि मैं मोहन दादा का शुभचिंतक हूँ. चाहता हूँ कि उनका कोई नुक्सान न हो. वे शिवराज सिंह चौहान की तरह आने वाले विधानसभा चुनाव में हिटविकेट न हो जाएं. उन्हे चाहिए कि वे अपनी भाषा का स्तर हेमंता विसवा और आदित्यनाथ से ऊपर रखें. आखिर पीएचडी धारक हैँ. वे यदि टपोरियों की भाषा बोलेंगे तो कोई अभिभावक अपने बच्चों को पीएचडी नही करने देगा.
                                   मप्र में मोहन बाबू अकेले ही भाषाविद नहीं हैं. उनसे वरिष्ठ कैलाश विजयवर्गीय और विजय शाह और राकेश सिंह को हम सब कैसे भूल सकते हैं? उनकी पार्टी में प्रीतम लोधी जैसे विद्वान और बागी मित्र विधायक भी हैंमोहन बाबू को याद रखना चाहिए कि वे पार्टी विधायकों की पसंद नहीं हैं. वे राजनीति के थोपाराम हैं अर्थात ऊपर से थोपे गए हैं. ऊपर वाला जब तक मेहरबान,तभी तक कोई पहलवान रह सकता है अन्यथा पारस पहलवान की गति उज्जैन में ही देख लीजिये. हमारे प्रदीप चौबे, हमेशा कहते थे कि पंडित जी जिसपे देवी का हस्त होता है उसका पिल्ला भी मस्त होता है बहरहाल हमें जीतू पटवारी से कोई लेना, न मुख्यमंत्री जी से. हमारी चिंता लुढकते रुपये की है लोग यदि कोंडियो से कारोबार करने लगे तो रुपए का क्या होगा.कौंडी और मोहर अब कालातीत मुद्राएं हैं जो कहावतों में ही जिंदा हैं. मोहन जी जैसे विद्वान इन शब्दों का इस्तेमाल कर इन्हे मरने नहीं देते.
श्री राकेश अचल  ,वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनैतिक समीक्षक, मध्यप्रदेश

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