सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने दिए पुनर्विचार के संकेत, कमेटी बनाने पर भी विचार। सामान्य वर्ग की नाराजगी बनी राजनीतिक चिंता, क्या चुनावी दबाव में बदलेगा यूजीसी का कानून?
नई दिल्ली। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए दिशानिर्देशों को लेकर देश में शुरू हुआ विवाद अब केंद्र सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनता दिखाई दे रहा है। उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने और समानता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से जनवरी 2026 में जारी किए गए नए नियमों पर केंद्र सरकार ने अब पुनर्विचार के संकेत दिए हैं। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि इन दिशानिर्देशों की दोबारा समीक्षा की जाएगी और इस उद्देश्य से एक कमेटी गठित करने पर भी विचार किया जा रहा है।गुरुवार, 5 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ को बताया कि सरकार इस मामले की जांच कर रही है, ताकि छात्रों की चिंताओं का समाधान किया जा सके और किसी भी वर्ग को भेदभाव या असुरक्षा का अनुभव न हो।सुप्रीम कोर्ट ने भी सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि हर छात्र के हितों की रक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। इसके बाद अदालत ने मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह के लिए टाल दी।
यूजीसी के नए नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव के खिलाफ मजबूत व्यवस्था तैयार करना था। लेकिन नियमों की कुछ व्यवस्थाओं को लेकर सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों और संगठनों ने गंभीर आपत्तियां उठाईं। विरोध करने वालों का तर्क था कि नियमों में शिकायतों के निस्तारण की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिसमें किसी भी वर्ग के साथ अन्याय या संभावित दुरुपयोग की गुंजाइश न रहे।विवाद बढ़ता गया और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। अदालत ने नए नियमों पर रोक लगाते हुए प्रथम दृष्टया उन्हें अस्पष्ट और दुरुपयोग की आशंका वाला बताया था। अदालत ने निर्देश दिया कि नए नियम तैयार होने तक वर्ष 2012 के दिशानिर्देश प्रभावी रहेंगे।
इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि वर्ष 2019 में दायर याचिकाओं से जुड़ी है। ‘अबेदा सलीम तडवी बनाम भारत संघ’ और इससे संबंधित याचिकाओं में उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था की मांग की गई थी। ये याचिकाएं रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं की ओर से दायर की गई थीं। दोनों की मौत के पीछे संस्थानों में कथित जातिगत भेदभाव के आरोप लगाए गए थे। इन्हीं मांगों के बाद यूजीसी ने जनवरी 2026 में नए दिशानिर्देश अधिसूचित किए। हालांकि, इन नियमों की कुछ व्यवस्थाओं को लेकर उठा विवाद अब सरकार और न्यायपालिका के बीच विचाराधीन है।
सामान्य वर्ग की नाराजगी बनी भाजपा के लिए चुनौती?
इस पूरे घटनाक्रम का एक राजनीतिक पहलू भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यूजीसी के नए नियमों को लेकर सामान्य वर्ग के एक हिस्से में भाजपा के प्रति नाराजगी देखने को मिली है। सोशल मीडिया पर ऐसे लोग भी सरकार की आलोचना करते दिखाई दिए हैं, जो अब तक भाजपा के समर्थक माने जाते रहे हैं।हाल के बिहार और उत्तर प्रदेश के एमएलसी चुनावों में भाजपा के प्रदर्शन को लेकर भी सामान्य वर्ग की नाराजगी को एक संभावित कारण के रूप में चर्चा में लाया जा रहा है। हालांकि, चुनावी परिणामों के पीछे कई राजनीतिक और स्थानीय कारण होते हैं, इसलिए इस नाराजगी को अकेला कारण मानना उचित नहीं होगा।लेकिन उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों की राजनीतिक अहमियत को देखते हुए भाजपा के लिए यह मुद्दा संवेदनशील जरूर है। पार्टी नहीं चाहेगी कि शिक्षा और आरक्षण से जुड़े किसी विवाद के कारण उसके पारंपरिक समर्थक वर्गों में असंतोष और गहरा हो।
दरअसल, यूजीसी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए मजबूत व्यवस्था बने, लेकिन साथ ही किसी भी विद्यार्थी को बिना पर्याप्त जांच और निष्पक्ष प्रक्रिया के अन्याय का सामना न करना पड़े।किसी भी छात्र के साथ जाति के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। इसी तरह किसी भी वर्ग के विद्यार्थी को केवल अपनी पहचान के कारण आशंकित या असुरक्षित महसूस नहीं होना चाहिए। नियमों की विश्वसनीयता तभी कायम होगी, जब वे सभी के लिए समान न्याय और पारदर्शिता सुनिश्चित करेंगे।अब देखना यह होगा कि केंद्र सरकार की प्रस्तावित समीक्षा से यूजीसी के नियमों में क्या बदलाव आते हैं। क्या सरकार ऐसा संतुलित कानून तैयार कर पाएगी, जो भेदभाव के खिलाफ प्रभावी हो और किसी भी वर्ग के अधिकारों का हनन न करे?
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