‘’वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम्।
यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते॥‘’
सभ्यताओं का निर्माण केवल शस्त्रों से नहीं, शास्त्रों से होता है, और शास्त्रों को जीवन देने वाला गुरु होता है। किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी सीमाओं, संपदा या सामरिक सामर्थ्य में नहीं, बल्कि उसकी ज्ञान-परंपरा में निहित होती है। भारत को विश्व ने ‘विश्वगुरु’ इसलिए नहीं कहा कि उसके पास सबसे बड़ा साम्राज्य था, बल्कि इसलिए कि उसने मानवता को जीवन जीने की ऐसी दृष्टि दी, जिसमें ज्ञान के साथ चरित्र, विज्ञान के साथ विवेक और प्रगति के साथ संस्कृति का समन्वय था। इस महान परंपरा के केंद्र में सदैव गुरु रहा है।
भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान केवल शिक्षक का नहीं है। शिक्षक विषय का ज्ञान देता है, जबकि गुरु जीवन का बोध कराता है। शिक्षक बुद्धि को विकसित करता है, गुरु अंतःकरण को प्रकाशित करता है। शिक्षक परीक्षा में सफलता का मार्ग दिखाता है, पर गुरु जीवन को सार्थक बनाने की दिशा देता है। यही कारण है कि भारतीय मनीषा ने गुरु को ईश्वर से भी श्रेष्ठ स्थान देते हुए कहा— “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।” यह केवल श्रद्धा का भाव नहीं, बल्कि उस सत्य की स्वीकृति है कि गुरु ही मनुष्य को अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाता है।
गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व महर्षि वेदव्यास को समर्पित है, जिन्होंने वेदों का संहिताकरण कर भारतीय ज्ञान परंपरा को व्यवस्थित स्वरूप दिया। महाभारत, ब्रह्मसूत्र और अठारह महापुराणों के माध्यम से उन्होंने केवल साहित्य की रचना नहीं की, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना को पीढ़ियों तक सुरक्षित रखा। इसलिए गुरु पूर्णिमा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि ज्ञान, परंपरा और कृतज्ञता का राष्ट्रीय पर्व है।
भारतीय इतिहास साक्षी है कि जब-जब किसी युगपुरुष ने इतिहास की दिशा बदली, उसके पीछे किसी गुरु का मार्गदर्शन अवश्य था। महर्षि वशिष्ठ ने श्रीराम को मर्यादा का संस्कार दिया, महर्षि विश्वामित्र ने उन्हें धर्मरक्षा का दायित्व समझाया। सांदीपनि ऋषि ने श्रीकृष्ण को केवल शास्त्रों का ज्ञान नहीं दिया, बल्कि लोककल्याण की दृष्टि भी प्रदान की। आचार्य चाणक्य ने चंद्रगुप्त मौर्य में राष्ट्रनिर्माण की क्षमता पहचानी और समर्थ रामदास ने छत्रपति शिवाजी महाराज के भीतर स्वराज्य की ज्वाला प्रज्ज्वलित की। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि गुरु केवल शिष्य का निर्माण नहीं करता, वह युग का निर्माण करता है।
भारतीय गुरु-परंपरा केवल आध्यात्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रही। महर्षि पाणिनि ने भाषा और व्याकरण को वैज्ञानिक आधार दिया, आर्यभट्ट ने गणित और खगोल विज्ञान में विश्व को नई दिशा दी, आचार्य चरक ने आयुर्वेद के माध्यम से चिकित्सा विज्ञान को समृद्ध किया, महर्षि पतंजलि ने योग को जीवन-दर्शन का स्वरूप प्रदान किया, भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र के माध्यम से कला और सौंदर्यशास्त्र की अद्वितीय परंपरा स्थापित की तथा विश्वकर्मा भारतीय शिल्प, स्थापत्य और सृजन के आदर्श माने गए। इससे स्पष्ट है कि भारत में गुरु केवल धर्मोपदेशक नहीं, बल्कि विज्ञान, साहित्य, चिकित्सा, कला और संस्कृति—जीवन के प्रत्येक क्षेत्र के पथप्रदर्शक रहे हैं।
भारतीय गुरु-परंपरा की एक विशिष्ट अभिव्यक्ति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भी दिखाई देती है। संघ में किसी व्यक्ति को गुरु नहीं माना जाता, बल्कि भगवा ध्वज को गुरु का स्थान दिया गया है। भगवा ध्वज त्याग, तप, ज्ञान, आत्मसंयम और राष्ट्रनिष्ठा का प्रतीक है। यह परंपरा इस सत्य को स्थापित करती है कि व्यक्ति सीमित हो सकता है, किंतु आदर्श शाश्वत होते हैं। गुरु पूर्णिमा पर स्वयंसेवकों द्वारा भगवा ध्वज के समक्ष गुरुदक्षिणा अर्पित करना किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि सनातन आदर्शों के प्रति समर्पण का प्रतीक है।
आज संसार कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) के युग में प्रवेश कर चुका है। कुछ ही क्षणों में लाखों पुस्तकें, शोधपत्र और सूचनाएँ उपलब्ध हो जाती हैं। मशीनें प्रश्नों के उत्तर दे सकती हैं, तथ्यों का विश्लेषण कर सकती हैं और निर्णय लेने में सहायता कर सकती हैं। किंतु एक प्रश्न आज भी शेष है—क्या सूचना ही ज्ञान है? क्या ज्ञान ही विवेक है? और क्या विवेक के बिना मानवता सुरक्षित रह सकती है?
उत्तर स्पष्ट है—नहीं।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता उत्तर दे सकती है, पर जीवन का उद्देश्य नहीं बता सकती। वह तर्क दे सकती है, पर नैतिकता का संस्कार नहीं दे सकती। वह जानकारी दे सकती है, पर करुणा, संवेदना और चरित्र का निर्माण नहीं कर सकती। यही वह स्थान है जहाँ गुरु का महत्व शाश्वत सिद्ध होता है। गुरु केवल ज्ञान नहीं देता, वह मनुष्य को सही और गलत के बीच निर्णय करने का विवेक देता है।
आज शिक्षा का सबसे बड़ा संकट संसाधनों का नहीं, बल्कि उद्देश्य का है। यदि शिक्षा केवल अंक, नौकरी और वेतन तक सीमित रह जाए तो उसका लक्ष्य अधूरा रह जाता है। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य ऐसे नागरिक तैयार करना है जो ज्ञानवान होने के साथ-साथ चरित्रवान, संवेदनशील और राष्ट्रनिष्ठ भी हों। विकसित भारत का निर्माण केवल आधुनिक तकनीक से नहीं, बल्कि ऐसे गुरुओं से होगा जो ज्ञान के साथ संस्कार दें और ऐसे युवाओं से होगा जो सफलता के साथ उत्तरदायित्व को भी अपना लक्ष्य बनाएँ।
गुरु पूर्णिमा केवल अपने गुरु का वंदन करने का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का पर्व है। यह हमें स्मरण कराती है कि गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा उनके बताए मार्ग पर चलने में है। जब तक भारत की शिक्षा में संस्कार, समाज में सदाचार और राष्ट्रीय जीवन में आदर्शों का प्रकाश बना रहेगा, तब तक भारत की गुरु-परंपरा जीवित रहेगी। क्योंकि गुरु केवल व्यक्ति का निर्माण नहीं करता; वह विचार का निर्माण करता है। विचार संस्कृति का निर्माण करते हैं, संस्कृति राष्ट्र का निर्माण करती है। यदि भारत की आत्मा को किसी एक शब्द में अभिव्यक्त करना हो, तो वह शब्द है—’गुरु’।
— शुभानन मधुसूदन खेमरिया
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