सम्पादकीय

जेन-ज़ेड के आंदोलन ने मोदी सरकार को आईना दिखाया !

भारतीय राजनीति में लंबे समय से यह धारणा बनती जा रही थी कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के सामने विपक्ष बिखरा हुआ है और बड़े जनआंदोलन धीरे-धीरे कमजोर पड़ गए हैं। ऐसे माहौल में यदि युवा वर्ग—विशेषकर जेन-ज़ेड (Gen Z)—शिक्षा, परीक्षाओं और अवसरों जैसे मुद्दों पर बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरता है, तो यह स्वाभाविक रूप से राजनीतिक बहस का विषय बनता है।हाल के आंदोलन ने यह संदेश अवश्य दिया है कि युवाओं की अपेक्षाएँ केवल राजनीतिक नारों से पूरी नहीं होतीं। रोजगार, पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया, निष्पक्ष परीक्षाएँ और शिक्षा व्यवस्था में भरोसा—ये ऐसे मुद्दे हैं जो सीधे उनके भविष्य से जुड़े हैं। जब इन्हीं प्रश्नों पर असंतोष बढ़ता है, तो उसका असर राजनीति पर भी दिखाई देता है।

                               किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए जनआंदोलन केवल विरोध नहीं, बल्कि जनभावनाओं का संकेत भी होते हैं। यदि बड़ी संख्या में छात्र या युवा परीक्षा प्रणाली, भर्ती प्रक्रिया या शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं, तो सरकार के सामने दो रास्ते होते हैं—पहला, संवाद और सुधार; दूसरा, केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया। दीर्घकालिक दृष्टि से संवाद और सुधार अधिक प्रभावी माने जाते हैं।युवाओं का विश्वास किसी भी सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी होता है। यदि यह विश्वास कमजोर पड़ता है, तो केवल राजनीतिक नुकसान ही नहीं, संस्थाओं की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न उठ सकते हैं। विपक्ष के लिए ऐसे आंदोलन राजनीतिक अवसर अवश्य बन सकते हैं, लेकिन अवसर और विश्वास अलग-अलग बातें हैं। केवल सरकार की आलोचना करने से विपक्ष को स्थायी लाभ नहीं मिलता। यदि विपक्ष शिक्षा सुधार, रोजगार और पारदर्शिता पर ठोस नीति और विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत करता है, तभी वह जनता का भरोसा जीत सकता है। दूसरे शब्दों में, सरकार की कठिनाई अपने-आप विपक्ष की सफलता नहीं बन जाती।

                              आज का युवा पहले की पीढ़ियों से अलग है। वह सोशल मीडिया पर सक्रिय है, जानकारी तेजी से प्राप्त करता है और किसी भी मुद्दे पर तुरंत अपनी राय बनाता है। उसकी प्राथमिकताएँ जाति और पारंपरिक राजनीतिक पहचान से आगे बढ़कर अवसर, कौशल, रोजगार और बेहतर शासन की ओर अधिक केंद्रित हैं।यही कारण है कि यदि युवाओं की आकांक्षाएँ पूरी नहीं होतीं, तो उनका असंतोष तेजी से संगठित रूप ले सकता है।लोकतंत्र में शांतिपूर्ण आंदोलन और सरकार के प्रति सवाल लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं। उसी तरह सरकार को भी अपनी नीतियों का पक्ष रखने और आवश्यक सुधार करने का अवसर मिलता है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि संवाद बना रहे और संस्थाओं पर जनता का विश्वास मजबूत हो।

                              यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगी कि किसी एक आंदोलन ने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि युवाओं के मुद्दे अब राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में हैं। यदि सरकार इन्हें गंभीरता से लेकर ठोस सुधार करती है, तो वह अपने प्रति विश्वास को और मजबूत कर सकती है। वहीं विपक्ष के लिए यह अवसर है कि वह केवल आलोचना तक सीमित न रहकर व्यावहारिक और विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत करे।लोकतंत्र में अंततः सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि जनता की आवाज़ सुनी जाए, संस्थाओं की विश्वसनीयता बनी रहे और युवाओं के भविष्य से जुड़े प्रश्नों का समाधान समय पर और पारदर्शी तरीके से किया जाए।

अभिषेक तिवारी 

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