राजनीति में कुछ भी अनायास या अनियोजित नहीं होता है और अगर आपको लगे कि कुछ अनायास हो रहा है या अनप्लांड हो रहा है तो समझना चाहिए कि उसे उसी तरह से प्लान किया गया है। यानी उसकी योजना ऐसी बनी है कि वह अनप्लांड लगे। यह बात अमेरिका के एक राष्ट्रपति ने कही थी। पूरी दुनिया की राजनीति पर यह बात समान रूप से लागू होती है। तभी प्रयागराज में शंकराचार्य को लेकर जो कुछ हो रहा है और उसके बाद विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी का जो नया नियम लाया गया हैं उसे अनायास हुए नहीं मानना चाहिए। सरकार ने किसी योजना के तहत यूजीसी के नए नियम लागू किए हैं। उसने सामान्य वर्ग को अलग थलग करने और उसे उत्पीड़क साबित करने का जो नियम बनाया है वह संयोग नहीं है, बल्कि किसी प्रयोग का हिस्सा है।
इस समय पूरे देश में यूजीसी की ओर से लाए गए समानता के नए नियम पर विवाद हो रहा है। यूजीपी ने प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीच्यूट रेगुलेशन 2026 के नाम से नए नियम जारी किए हैं। इसका उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव खत्म करना बताया गया है। इस तरह का एक नियम 2012 में बना था, जो पहले से उपलब्ध था। उसमें कुछ बदलाव करके उसे नए रूप में प्रस्तुत किया गया है। 2012 के नियम में सिर्फ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति यानी एससी और एसटी को उत्पीड़न से बचाने का प्रावधान किया गया था। अब उसमें अन्य पिछड़ी जातियों यानी ओबीसी को भी जोड़ दिया गया है। साथ ही महिलाएं और दिव्यांगजनों को भी शामिल किया गया है। महिलाओं और दिव्यांगों में हर वर्ग के छात्र शामिल होंगे।
इसका मतलब है कि सामान्य वर्ग के एक छोटे से समूह को पहले से ही अत्याचारी या उत्पीड़क मान कर बाकी लोगों को उससे बचाने का प्रावधान किया गया है। 2012 के कानून में भेदभाव या उत्पीड़न की फर्जी शिकायत करने पर कार्रवाई का प्रावधान था, जिसे नए नियमों में हटा दिया गया है। यानी एससी, एसटी, ओबीसी, महिला और दिव्यांग अगर चाहें तो किसी भी सामान्य वर्ग के छात्र के खिलाफ झूठी शिकायत दर्ज करा सकते हैं और शिकायत गलत पाए जाने पर उनके खिलाफ किसी तरह की दंडात्मक कार्रवाई नहीं हो सकती है। हर संस्थान में इक्विटी कमेटी और इक्विटी स्क्वॉयड बनाने का प्रावधान किया गया है, जिसमें बदलाव करके यह नियम बनाया गया है कि इसमें सामान्य वर्ग के किसी व्यक्ति को रखना अनिवार्य नहीं होगा।
सोचें, क्या इससे भी ज्यादा भेदभाव या असमानता की कोई व्यवस्था हो सकती है? इसमें एक समूह को पहले से अपराधी मान कर उसे सजा के योग्य ठहरा दिया गया है। यह सामाजिक विद्वेष बढ़ाने वाला नियम है, जो कानून विरूद्ध है और संविधान विरूद्ध है। यह प्राकृतिक न्याय के मूल सिद्धांत के भी विरूद्ध है। भारत सरकार ने जब अंग्रेजों के जमाने की भारतीय दंड संहिता समाप्त की और उसकी जगह भारतीय न्याय संहिता लागू की तो कहा कि अंग्रेजों ने दंड का प्रावधान किया था लेकिन अब सरकार न्याय की व्यवस्था ले आई है।
क्या यही न्याय की व्यवस्था है कि आप एक समूह को पहले से अपराधी मान लेंगे? सवाल है कि आरोप लगाए जाने और दोष सिद्ध होने से पहले किसी को अपराधी कैसे माना जा सकता है? भारत में न्याय की व्यवस्था महर्षि याज्ञवल्क्य के समय बनी, जिसमें वाचस्पति ने नव्य न्याय की धारणा जोड़ी। इसके मुताबिक दोष सिद्धि से पहले किसी को अपराधी नहीं माना जा सकता है। संविधान का अनुच्छेद 14 और 15 कानून के समक्ष सबकी समानता और धर्म, जाति, नस्ल, लिंग, क्षेत्र आदि के आधार पर किसी किस्म के भेदभाव को निरस्त करता है। लेकिन यहां भारत सरकार ने जाति के आधार पर एक समूह को पहले ही अपराधी मान लिया है। किसी सभ्य समाज में ऐसी व्यवस्था की कल्पना भी कैसे की जा सकती है?
इसी तरह का एक बिल मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार भी ले आई थी। कम्युनल वायलेंस बिल की मूल अवधारणा हिंदू को दंगाई मानने की थी। ऐसा कानून बन रहा था, जिसके मुताबिक कही भी दंगा होगा तो हिंदू को दोषी माना जाएगा। ठीक उसी तरह का नियम सरकार ले आई है, जिसके मुताबिक किसी भी शिक्षण संस्थान में अगर भेदभाव होता है या उत्पीड़न की घटना होती है तो सामान्य वर्ग के छात्र या शिक्षक को उसका दोषी माना जाएगा। एससी, एसटी, ओबीसी, महिला और दिव्यांग कभी भी आरोपी या दोषी नहीं बनाए जाएंगे।
अब जरा इसके व्यावहारिक पक्ष की कल्पना करें। किसी भी शिक्षण संस्थान में जाने वाले सामान्य वर्ग के छात्र के ऊपर कितना मानसिक दबाव होगा। वह हर समय इस आशंका में रहेगा कि उपरोक्त पांच समूहों का कोई छात्र उसके खिलाफ शिकायत कर सकता है और उसका करियर समाप्त कर सकता है। क्या सरकार कथित ऐतिहासिक गलतियों को दुरुस्त करने के लिए रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन के जरिए सामान्य वर्ग के छात्रों को उच्च शिक्षा से दूर करना चाहती है?
सरकार ने यह काम ऐसे समय में किया है, जब सामाजिक स्तर पर असमानता कम हो रही है, समाज ज्यादा समरस बन रहा है और सत्तारूढ़ दल खुद ही व्यापक हिंदू एकता के लिए काम कर रहा है। दूसरी ओर आर्थिक स्तर पर असमानता बढ़ रही है। सरकार का यह नियम विभिन्न जातियों और समाजों के बीच वैमनस्य और भेदभाव बनाने वाला प्रतीत होता है।
अगर इसके राजनीतिक पहलुओं को देखें तो क्या भारतीय जनता पार्टी और उसकी केंद्र सरकार को लग रहा है कि वह सामान्य वर्ग को अलग थलग करके या उसके प्रति द्वेष दिखा कर एससी, एसटी और ओबीसी के बड़े जातीय समूह को अपने साथ करे लेगी और इससे उसे चुनावी जीत का स्थायी फॉर्मूला मिल जाएगा? क्या वह कांग्रेस और प्रादेशिक पार्टियों की बहुजन राजनीति के जवाब के तौर पर यह नियम लेकर आई है?
ऐसा होना नहीं चाहिए क्योंकि भाजपा के नेता अर्थव्यस्था, कूटनीति, प्रौद्योगिकी आदि समझें न समझें राजनीति बखूबी समझते हैं। उनके पता होता है कि किस बात से चुनावी नुकसान होगा और किस बात से फायदा होगा। तभी हैरानी हो रही है कि राजनीतिक रूप से नुकसान पहुंचाने वाला इतना बड़ा कदम इस सरकार ने कैसे उठाया।
गौरतलब है कि भारतीय जनता पार्टी ने देश के अल्पसंख्यकों को पहले ही अपने से अलग कर दिया है। उत्तर प्रदेश में खुल कर 80 और 20 की लड़ाई बताई जाती है। लेकिन यह विभाजन राष्ट्रीय स्तर पर भी है। भाजपा ने 20 फीसदी अल्पसंख्यकों को अपने से अलग मान लिया है। उसे 80 फीसदी हिंदुओं की राजनीति करनी है। अब क्या वह इस 80 फीसदी के समूह को और छोटा करने की जोखिम ले सकती है? क्या इसमें से 15 फीसदी सामान्य वर्ग बाहर हो जाए तो भाजपा 65 फीसदी के वोट की राजनीति करके चुनाव जीत सकती है? ध्यान रहे सामाजिक स्तर पर एससी और एसटी का टकराव ओबीसी के साथ ज्यादा है।
एससी, एसटी उत्पीड़न कानून के तहत 80 से 90 फीसदी मामलों में आरोपी पिछड़ी जातियों के हैं। इस कानून के दुरुपयोग के अनगिनत मामले सामने आ चुके हैं और अदालतों ने इस पर अनेक बार टिप्पणियां की हैं। लेकिन शिक्षण संस्थान में ओबीसी को भी एससी और एसटी के साथ ही उत्पीड़न के शिकार वर्ग में शामिल किया जा रहा है। क्या इससे तीनों समूहों के बीच समाज में भी समरसता स्थापित हो जाएगी? इसमें संदेह है लेकिन इससे एससी, एसटी व ओबीसी के साथ सामान्य वर्ग के संबंधों में तनाव जरूर बढ़ जाएगा। क्या सरकार यह तनाव बढ़ाना चाहती है?
अगर राज्यवार देखेंगे तो भाजपा को राजनीतिक नुकसान की संभावना और ज्यादा दिखेगी। मिसाल के तौर पर झारखंड में मुस्लिम, ईसाई और आदिवासी भाजपा के खिलाफ हैं। अगर सामान्य वर्ग भी खिलाफ हुआ तो भाजपा के पास क्या बचेगा? उत्तर प्रदेश में 80 और 20 की लड़ाई है। 80 में से 10 फीसदी यादव को पहले ही भाजपा ने अलग कर दिया है। अगर बचे हुए 70 फीसदी में से 20 से 25 फीसदी सामान्य वर्ग के लोग अलग हुए तो भाजपा के पास क्या बचेगा राजनीति करने को?
भाजपा के नेता इतने नासमझ तो नहीं हैं कि वे यह मानने लगें कि शिक्षण संस्थानों में एससी, एसटी के साथ ओबीसी को भी शोषित वर्ग में शामिल कर देने से उत्तर प्रदेश और बिहार में यादव भाजपा को वोट देने लगेंगे। दो तीन राज्यों के उदाहरण का विस्तार पूरे देश में किया जा सकता है। सो, कुल मिला कर यूजीसी का यह नियम सामाजिक विद्वेष बढ़ाने वाला और समानता की भावना के विपरीत तो है ही साथ ही भाजपा को बड़ा राजनीतिक नुकसान पहुंचाने वाला भी हो सकता है। कहीं ऐसा न हो कि चौबे जी छब्बे जी बनने चलें और दुबे जी बन कर रह जाएं।
सौजन्य – नया इंडिया समाचार पत्र
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