भाजपा-कांग्रेस –  सड़कों पर शक्ति प्रदर्शन से दिल्ली तक सियासी संदेश

भाजपा-कांग्रेस –  सड़कों पर शक्ति प्रदर्शन से दिल्ली तक सियासी संदेश

मध्यप्रदेश में भाजपा की तीन बड़ी रैलियां, तो कांग्रेस का दिल्ली के रामलीला मैदान में शक्ति प्रदर्शन; चुनाव आयोग और लोकतंत्र के मुद्दों पर आमने-सामने दोनों दल

भोपाल। मध्यप्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक नई प्रतिस्पर्धा दिखाई दे रही है। यह प्रतिस्पर्धा जनसमस्याओं, विकास कार्यों या जनहित के मुद्दों पर नहीं, बल्कि रैलियों में भीड़ जुटाने और राजनीतिक ताकत दिखाने की है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही सड़क पर उतरकर एक-दूसरे को अपनी ताकत का अहसास कराने में जुटी हैं। भाजपा जहां मध्यप्रदेश के तीन बड़े शहरों में रैलियों के जरिए कांग्रेस को घेरने की तैयारी में है, वहीं कांग्रेस दिल्ली के रामलीला मैदान में बड़ी रैली आयोजित कर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के खिलाफ मोर्चा खोलने जा रही है।सियासत का यह मुकाबला अब प्रदेश की सीमाओं से निकलकर राष्ट्रीय मंच तक पहुंच गया है। भाजपा ने अपने अभियान की शुरुआत इंदौर से कर दी है। पार्टी ने ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ अभियान के तहत विशाल पदयात्रा आयोजित कर कांग्रेस और राहुल गांधी पर निशाना साधा। इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल, केंद्रीय मंत्री मनसुख मांडविया और पार्टी के राष्ट्रीय प्रभारी सांसद विप्लव कुमार देव सहित कई वरिष्ठ नेता शामिल हुए। प्रदेश के मंत्री, विधायक और सांसद भी इस शक्ति प्रदर्शन का हिस्सा बने।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कांग्रेस की राजनीति को नकारात्मक बताते हुए कहा कि मध्यप्रदेश की जनता कांग्रेस की अराजकता स्वीकार नहीं करेगी। वहीं प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं को लेकर कांग्रेस के विरोध पर सवाल उठाए। केंद्रीय मंत्री मनसुख मांडविया ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश विकसित भारत के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है।भाजपा का यह अभियान इंदौर तक सीमित नहीं रहेगा। पार्टी 2 नवंबर को जबलपुर और 3 नवंबर को भोपाल में भी बड़ी रैलियां आयोजित करने की तैयारी में है। इन कार्यक्रमों में भी केंद्रीय नेताओं और संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों की मौजूदगी प्रस्तावित है।

कांग्रेस की नजर दिल्ली के रामलीला मैदान पर

दूसरी ओर कांग्रेस ने भी अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने के लिए दिल्ली का मैदान चुना है। पार्टी 1 नवंबर को रामलीला मैदान में ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ अभियान के तहत बड़ी रैली करने जा रही है। कांग्रेस का मुख्य मुद्दा मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका है। पार्टी का आरोप है कि मतदाता सूची से जुड़े सवाल लोकतंत्र और निष्पक्ष चुनाव व्यवस्था के लिए गंभीर हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी मध्यप्रदेश से अधिक से अधिक कार्यकर्ताओं को दिल्ली पहुंचाने में जुटे हैं। इसके लिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की ओर से नियुक्त पर्यवेक्षक जिलों में बैठकें कर रहे हैं। विधायकों और जिला स्तर के पदाधिकारियों को कार्यकर्ताओं की भागीदारी सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। ग्वालियर-चंबल क्षेत्र से बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं को दिल्ली पहुंचाने की रणनीति बनाई गई है। वहीं प्रदेश के दूसरे जिलों से भी अलग-अलग संख्या में कार्यकर्ताओं को ले जाने की तैयारी की गई है।

दोनों दलों के इन शक्ति प्रदर्शनों के पीछे केवल एक-दूसरे का विरोध नहीं, बल्कि अपने-अपने राजनीतिक संगठन की ताकत साबित करने की कोशिश भी दिखाई देती है। भाजपा अपने संगठन, सरकार और सत्ता की ताकत के सहारे कांग्रेस को यह संदेश देना चाहती है कि मध्यप्रदेश में उसका जनाधार मजबूत है। दूसरी तरफ कांग्रेस दिल्ली में विपक्षी एकजुटता और मतदाता सूची के मुद्दे को राष्ट्रीय बहस बनाने की कोशिश कर रही है। लेकिन इस पूरी सियासी कवायद के बीच एक सवाल भी महत्वपूर्ण है। क्या लोकतंत्र की मजबूती का पैमाना रैलियों में जुटने वाली भीड़ है या फिर जनता के सवालों का जवाब देने की राजनीतिक इच्छाशक्ति?

– अभषेक तिवारी 

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