मध्यप्रदेश राजनीतिनामा – उमा भारती ने अनजाने में शिवराज की सरकार बनवा दी

मध्यप्रदेश राजनीतिनामा – उमा भारती ने अनजाने में शिवराज की सरकार बनवा दी

राष्ट्रपति चुनाव के मतपत्रओं पर लिख दिया “जय श्रीराम”

वर्ष 2007 में उमा भारती से जुड़े चौदह विधायकों ने राष्ट्रपति चुनाव में अपना वोट खराब करने की योजना बनाई। राष्ट्रपति चुनाव के समय एक-एक विधायक की उपयोगिता बढ़ जाती है। भाजपा से नाराज चल रहे उमा भारती कैम्प के विधायकों ने तब रणनीति बनाई कि वे अपनी ताकत दिखाने के लिए अपने मत पत्रों पर जय श्रीराम लिखकर राष्ट्रपति चुनाव की पेटी में डालेंगे। ऐसा करके वे भाजपा के उम्मीदवार को हरायेंगे और अपनी ताकत भी दिखा सकेंगे। यह बात अलग है कि उनका बोट इससे रिजेक्ट होता। जैसे ही यह बात मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को पता चली, भाजपा का संगठन सक्रिय हो गया। मुख्यमंत्री उस दिन पार्टी से निलंबित चल रहे पूर्व मंत्री गौरीशंकर शेजवार के घर पहुँचे और उन्हें पार्टी में वापस लेते हुए मंत्री बनाने की पेशकश की। शेजवार भी तब तक उमा भारती से खिन्न हो चुके थे और वे भी मौका तलाश रहे थे। जैसे ही शेजवार का निलम्बन समाप्त हुआ वैसे ही उमा भारती कैम्प की पूरी हवा निकल गई। उसके बाद शेजवार बचे हुये डेढ़ साल के लिए फिर से मंत्री बन गये, लेकिन 2008 का अगला विधानसभा चुनाव सांची से हार गये।

उमा भारती ने अनजाने में शिवराज की सरकार बनवा दी

इसके बाद जब 2008 के विधानसभा चुनाव आये तब जनशक्ति पार्टी ने 213 सीटो पर लड़ा और छह पर जीती। उमा भारती खुद टीकमगढ़ से चुनाव लड़ीं और कांग्रेस के यादवेन्द्र सिंह से लगभग नौ हजार वोटों से हार गई। इस चुनाव में जनशक्ति को लगभग पाँच प्रतिशत वोट मिले थे। उमा भारती की पार्टी कहने को तो यह चुनाव शिवराज सिंह को हटाने के लिए लड़ रही थी, लेकिन इसने अंततः शिवराज सिंह को ही सत्ता में वापस लाने में मदद की। हुआ यह कि भाजपा सरकार के खिलाफ जो नाराज़ी के वोट थे वे कांग्रेस और जनशक्ति में विभाजित हो गये। भाजपा के कमिटेड वोटर तो नहीं बंटे उल्टा कांग्रेस के लिए जो वोट विपक्ष होने के नाते मिलना थे वे खराब हो गये। इसके पहले चुनावी साल में उमा भारती और प्रहलाद पटेल के बीच विवाद इतना बढ़ा कि एक दिन प्रहलाद पटेल ने उमा भारती के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए खुद को भारतीय जनशक्ति का अध्यक्ष घोषित कर दिया।” रघुनंदन शर्मा भी जनशक्ति के गुजरात में चुनाव लड़ने के निर्णय के विरोध में वापिस भाजपा  में आ  गए। बाद में  नरेंद्र मोदी  जब प्रधानमंत्री  बने तो उन्होंने रघुनन्दन शर्मा  को लोकसभा के संसदीय  अध्ययन और शोध प्रकोष्ठ का पद दे दिया

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