राम मंदिर – आस्था पर सवाल नहीं, व्यवस्था पर जवाब चाहिए

राम मंदिर – आस्था पर सवाल नहीं, व्यवस्था पर जवाब चाहिए

श्रीराम जन्म भूमि अयोध्या देश की न जाने कितनी पीढ़ियों ने अपने आराध्य श्री राम चंद्र जी की जन्मभूमि जहाँ मुगलों ने बाबरी मस्जिद बना दी थी उसी स्थान पर मंदिर बनाये जाने की आस में अपने प्राण गवाए । कुछ रामभक्तों ने उस आस के लिए संघर्ष किया और आंदोलन में अपने प्राण न्योछावर कर दिए । समय का फेर बदला और एक धर्मनिरपेक्ष देश में जहाँ लगभग 100 करोड़ आबादी की दिन की शुरुवात ही राम के नाम से होती है उस देश में संविधान के आदेश से श्री राम तम्बू से निकलकर फिर अपने महल में पहुंचे देश में एक साल में दो दिवाली मनाई गयीं । लेकिन महज दो सालो में ही 500 साल पुराने सपनो को बहरी नहीं बल्कि आंतरिक रूप से आघात पहुँचाया गया ।

                            अयोध्या का राम मंदिर करोड़ों भारतीयों की आस्था, विश्वास और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। इस मंदिर के निर्माण में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालुओं ने अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार दान दिया। इसलिए यदि मंदिर से जुड़ी दान राशि के प्रबंधन को लेकर किसी प्रकार के आरोप सामने आते हैं, तो स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में चिंता और प्रश्न उठते हैं राम का नाम केवल धर्म का विषय नहीं, बल्कि मर्यादा, सत्य और न्याय का भी प्रतीक है। ऐसे में यदि दान राशि के उपयोग में अनियमितता या वित्तीय गड़बड़ी के आरोप लगते हैं, तो सबसे अधिक आहत वही श्रद्धालु होता है जिसने इसे अपनी आस्था का योगदान समझकर दान दिया था। इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आरोपों की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच हो। यदि किसी स्तर पर अनियमितता हुई है तो दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए, चाहे उनका पद या प्रभाव कितना भी बड़ा क्यों न हो। वहीं यदि आरोप निराधार हैं, तो जांच के माध्यम से यह तथ्य भी स्पष्ट होना चाहिए ताकि जनता के मन में पैदा हुआ संदेह समाप्त हो सके।

                            सरकार और संबंधित ट्रस्ट की भी जिम्मेदारी है कि वे पूरे मामले में पारदर्शिता बनाए रखें। समय पर तथ्य सार्वजनिक किए जाएं, वित्तीय विवरण स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किए जाएं और जांच प्रक्रिया पर जनता का विश्वास कायम रखा जाए। लोकतंत्र में विश्वास केवल कानून से नहीं, बल्कि जवाबदेही और पारदर्शिता से भी बनता है यह भी याद रखना होगा कि किसी संस्था या मंदिर से जुड़े विवाद को राजनीतिक लाभ-हानि का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए। आस्था को राजनीति का हथियार बनाने के बजाय सत्य को सामने लाना अधिक आवश्यक है। क्योंकि जब मामला करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं से जुड़ा हो, तब हर कदम संयम, जिम्मेदारी और तथ्यों के आधार पर उठाया जाना चाहिए।राम मंदिर देश की अस्मिता का प्रतीक है। उसकी गरिमा केवल भव्य निर्माण से नहीं, बल्कि उसके संचालन में ईमानदारी, पारदर्शिता और नैतिकता से भी बनी रहेगी। जनता को न तो अफवाह चाहिए और न ही आरोप-प्रत्यारोप; जनता को चाहिए स्पष्ट उत्तर, निष्पक्ष जांच और न्याय।आस्था की रक्षा तभी होगी जब व्यवस्था भी उतनी ही पवित्र और जवाबदेह दिखाई दे।

अभिषेक तिवारी 

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