सागर के एडवोकेट अजय श्रीवास्तव की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

सागर के एडवोकेट अजय श्रीवास्तव की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

किसी फार्मेसी पाठ्यक्रम को अनुमोदन मिलने के बाद उसे हर साल पुनः अनुमोदन लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता : हाई कोर्ट

वार्षिक रिन्यूअल, PERC वसूली और नो एडमिशन ईयर की नीति पर अदालत की सख्त टिप्पणी

सागर देशभर के फार्मेसी कॉलेजों पर वर्षों से वार्षिक अनुमोदन और भारी-भरकम का बोझ डालने वाली फार्मेसी काउंसलिंग ऑफ़ इंडिया (PCI) को दिल्ली हाईकोर्ट से बड़ा कानूनी झटका लगा है। 29 मई 2026 को दिए गए अपने निर्णय में दिल्ली हाईकोर्ट ने PCI की अपील को खारिज करते हुए स्पष्ट कर दिया कि एक बार फार्मेसी एक्ट 1948 की धारा 12 के तहत किसी फार्मेसी पाठ्यक्रम को अनुमोदन मिल जाने के बाद उसे हर वर्ष पुनः अनुमोदन लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। मुख्य न्यायाधीश देवेन्द्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ ने कहा कि PCI द्वारा जारी 14 दिसंबर 2023 के सर्कुलर के माध्यम से संस्थानों को हर वर्ष SIF भरने, PERC शुल्क जमा करने और CONTINUATION OF APPROVAL. लेने के लिए मजबूर करना कानून के अनुरूप नहीं है। अदालत ने यह भी माना कि ऐसा करने का अधिकार फार्मेसी एक्ट में कहीं भी प्रदान नहीं किया गया है। कानून में नहीं तो PCI कैसे बना सकती है नियम ? सुनवाई के दौरान PCI ने तर्क दिया कि कोर्स और कोर्स ऑफ स्टडी और अलग-अलग अवधारणाएं हैं तथा प्रत्येक शैक्षणिक वर्ष को अलग कोर्स ऑफ स्टडी मानकर वार्षिक अनुमोदन लिया जा सकता है। लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि बी फार्मा; डी फार्मा; एम फार्मा का पूरा कार्यक्रम ही कोर्स ऑफ स्टडी है, उसका प्रत्येक वर्ष अलग कोर्स नहीं माना जा सकता। अदालत ने यहां तक टिप्पणी की कि यदि PCI का तर्क स्वीकार कर लिया जाए तो इसका अर्थ होगा कि B.PHARM का विद्यार्थी चार अलग-अलग कोर्स ऑफ स्टडी कर रहा है, जो पूरी तरह अव्यावहारिक और कानून की भावना के विपरीत है।

निगरानी के नाम पर अवैध वसूली नहीं

फार्मेसी शिक्षण संस्थानों का एक बड़ा आरोप रहा है कि PCI ने निगरानी और गुणवत्ता नियंत्रण के नाम पर PERC शुल्क वसूलने तथा हर वर्ष अनुमोदन प्रक्रिया थोपने की परंपरा बना ली थी। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि PCI के पास पहले से ही धारा 12(3) के तहत जानकारी मांगने, धारा 16 के तहत निरीक्षण करने और धारा 13 के तहत अनुमोदन वापस लेने की पर्याप्त शक्तियां मौजूद हैं इसलिए वार्षिक अनुमोदन की बाध्यता का कोई औचित्य नहीं बनता। फार्मेसी शिक्षा क्षेत्र में बड़ा संदेश इस फैसले को देशभर के हजारों फार्मेसी कॉलेजों के लिए राहत के रूप में देखा जा रहा है। लंबे समय से संस्थान यह आरोप लगाते रहे हैं कि PCI ने अपने प्रशासनिक सर्कुलरों और हैंडबुक के माध्यम से ऐसे दायित्व थोप दिए थे जिनका आधार स्वयं फार्मेसी एक्ट में नहीं है। अब दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि किसी भी वैधानिक संस्था को कानून से ऊपर जाकर नए दायित्व या आर्थिक भार लगाने का अधिकार नहीं है। यदि किसी संस्थान में कमियां हैं तो PCI को फार्मेसी एक्ट की धारा 13 के तहत निर्धारित कानूनी प्रक्रिया अपनानी होगी, न कि हर वर्ष अनुमोदन रोकने या नो एडमिशन ईयर की धमकी देने की नीति।

क्या वसूली गई रकम और भीम की समीक्षा होगी?

सवाल अब भी बाकी इस फैसले के बाद फार्मेसी शिक्षा जगत में एक बड़ा प्रश्न उठ खड़ा हुआ है कि आखिर वर्षों से वसूले गए PERC शुल्क और वार्षिक अनुमोदन प्रक्रिया का कानूनी आधार क्या था ? यदि यह व्यवस्था कानून के अनुरूप नहीं थी, तो क्या देशभर के संस्थानों से वसूली गई रकम और लागू की गई प्रक्रियाओं की भी समीक्षा होगी? दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला केवल एक अपील की हार नहीं, बल्कि फार्मेसी शिक्षा क्षेत्र में नियामकीय जवाबदेही और वैधानिक सीमाओं की पुनर्स्थापना के रूप में देखा जा रहा है। अब निगाहें PCI और केंद्र सरकार की अगली रणनीति पर टिकी हैं।

कोर्ट की इस लड़ाई में सबसे आगे रहे एड अजय श्रीवास्तव की अपील इस ऐतिहासिक निर्णय पर प्रतिक्रिया देते हुए इस न्यायालयीन लड़ाई से जुड़े एसएलएस फार्मेसी कॉलेज संचालक एवं एडवोकेट अजय श्रीवास्तव ने कहा कि, यह केवल कॉलेज या कुछ संस्थानों की जीत नहीं, बल्कि देशभर के फार्मेसी कॉलेजों की सामूहिक जीत है। उनका कहना है कि पिछले दो वर्षों से यह कानूनी संघर्ष फार्मेसी शिक्षा क्षेत्र के हितों की रक्षा के लिए लड़ा जा रहा है और अभी यह लड़ाई समाप्त नहीं हुई है। उन्होंने आशंका व्यक्त की कि बटड्डु इस निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दे सकती है, इसलिए सभी फार्मेसी संस्थानों को एकजुट होकर इस मामले में सहयोग करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब नियामक संस्थाएं कानून की सीमाओं से बाहर जाकर निर्णय लेने लगती हैं, तब न्यायपालिका ही संस्थानों के अधिकारों की अंतिम रक्षा करती है। उन्होंने देशभर के कॉलेज संचालकों, शिक्षकों और फार्मेसी शिक्षा से जुड़े सभी हितधारकों से अपील की कि वे इस संघर्ष को किसी एक संस्थान की लड़ाई न मानें, बल्कि फार्मेसी शिक्षा के भविष्य और संस्थानों के वैधानिक अधिकारों की रक्षा का अभियान समझकर इसमें अपना योगदान दें।

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