धर्म-ग्रंथ

पटनेश्वर धाम- 800 साल पुराना है शिव मंदिर, अनोखी है इससे जुड़ी कहानी

रानी का पटनेश्वर स्वप्न, बना इकलौता धाम जहां महाशिवरात्रि से पहले होता है शिव विवाह
पटनेश्वर धाम, महाशिवरात्रि को हजारों श्रद्धालु करेंगे दर्शन, लक्ष्मी बाई खेर ने कराया था निर्माण
रहली मार्ग पर ढाना के नजदीक पटना गांव में बने ऐतिहासिक शिव मंदिर को पटनेश्वर धाम कहा जाता है। यहां के इतिहास और भक्तों की कहानी इस मंदिर को अपने आप में अनूठा बनाती हैं। करीब 800 साल पुराने इस मंदिर का निर्माण सागर के तत्कालीन राजा की पत्नी लक्ष्मी बाई खेर ने कराया था। लक्ष्मीबाई खेर अक्सर रहली जाया करती थीं और जाते समय उनका पड़ाव पटना गांव में पढ़ता था, यहां पर उन्होंने शिव मंदिर का निर्माण कराया था। गांव का नाम पटना होने के कारण मंदिर पटनेश्वर धाम कहलाने लगा। यहां भगवान शिव स्वयंभू हैं। भगवान भोलेनाथ यहां पंचायतन रूप में विराजमान है।
महादेव के तिलक के साथ विवाह समारोह प्रारंभ
जहां तक भगवान शिव की बात करें, तो उनका विवाह महाशिवरात्रि के दिन होता है। लेकिन बुंदेलखंड के ऐतिहासिक पटनेश्वर मंदिर में भगवान महादेव का विवाह समारोह बसंत पंचमी से शुरू हो जाता है और महाशिवरात्रि तक चलता है। खास बात ये है कि ये परंपरा करीब 100 साल पुरानी है और इसका उल्लेख गजेटियर में भी किया गया है। विवाह समारोह की परंपरा अनुसार, सबसे पहले तिलक का कार्यक्रम होता है। जिस तरह किसी भी विवाह समारोह में सबसे पहले दूल्हे का तिलकोत्सव होता है, तो उसी तरह पटनेश्वर में भगवान महादेव की तिलकोत्सव होता है।
पटनेश्वर मंदिर का इतिहास
मंदिर समिति के के मुताबिक, सागर रेहली मार्ग पर सागर से करीब 20 किमी दूर ढाना कस्बे के नजदीक प्राचीन और ऐतिहासिक पटनेश्वर मंदिर स्थित है। मंदिर का निर्माण सागर की मराठा रानी लक्ष्मीबाई खैर द्वारा कराया गया था। उनके सपने में भगवान शिव आए थे, तब उन्होंने मंदिर का निर्माण करवाया। कहा जाता है कि रानी लक्ष्मीबाई खैर काफी धर्मपरायण थी और उन्होंने सागर के साथ-साथ रहली में कई मंदिरों का निर्माण कराया था. जिनमें हरसिद्ध मंदिर रानगिर, टिकीटोरिया मंदिर, पंढरीनाथ मंदिर और जगदीश मंदिर प्रमुख हैं। रानी लक्ष्मीबाई खैर मंदिरों के दर्शन के लिए अक्सर सागर से रहली जाया करती थीं, तो उनका काफिला ढाना के पास विश्राम के लिए रूकता था. वहीं रानी लक्ष्मीबाई खैर ने भगवान शिव का मंदिर स्थापित कराया था. आज इस मंदिर की पहचान पटनेश्वर मंदिर के नाम से है और यहां कई तरह के आयोजन और कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं।
सात दिन तक चलेगा मेला, महाशिवरात्रि पर भव्य आयोजन
भगवान शिव की विवाह परम्परा तिलक के साथ शुरू होती है। साथ ही रूद्र यज्ञ का शुभारंभ हो जाता है। दूसरे दिन महादेव का महाअभिषेक, तीसरे दिन भगवान शिव का सहस्त्र अर्जन और चौथे दिन महाआरती होती है। इसके बाद महाशिवरात्रि को भगवान महादेव का विवाह संपन्न होता है। बसंत पंचमी से लेकर महाशिवरात्रि के दिन तक बुंदेलखंड में होने वाले विवाहों की परम्पराए पटनेश्वर मंदिर में निभाई जाती हैं। महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां विशाल मेला भरता है, जहां हजारों की संख्या में शिवभक्त इकट्ठा होते हैं।
बाजीराव पेशवा से जुड़ा इतिहास
दरअसल, महाराजा छत्रसाल और बाजीराव पेशवा के युद्ध के बाद बुंदेलखंड के इतिहास में मराठाओं का उदय हुआ था। महाराजा छत्रसाल वृद्धावस्था में पहुंच गए थे। तब मुगल शासक मोहम्मद बंगश ने उन पर हमला कर दिया था। जैतपुर में युद्ध के दौरान छत्रसाल हार रहे थे। इस दौरान उन्होंने कई हिंदू राजाओं से मदद मांगी थी लेकिन मुगलों से टकराने कोई तैयार नहीं था। तब बाजीराव पेशवा ने छत्रसाल की मदद की और छत्रसाल ने युद्ध जीतने पर बुंदेलखंड में बाजीराव पेशवा के लिए उपहार स्वरूप कई गढ़ भेंट किए थे। बाजीराव पेशवा ने अपने विश्वस्त गोविंद राव खेर के लिए ये इलाका सौंपा था और फिर गोविंद राव खैर की वंशज रानी लक्ष्मी बाई ने ये मंदिर बनवाया।
सोमवार को लगता है भक्तों का तांता
भगवान शिव का अभिषेक और श्रावण सोमवार के अवसर पर हजारों की संख्या में भक्तों का तांता लगता है। सावन में यहां भगवान शिव का दर्शन पूजन और अभिषेक किया भजन कीर्तन होता है। अभी वर्तमान में गुरु पूर्णिमा के पर्व से श्रावण मास माह राम नाम संकीर्तन होगा। प्रत्येक सोमवार को अनुष्ठान होते हैं। सावन मास में पटनेश्वर धाम का दर्शन और पूजन करना विशेष फलदाई है। दिव्य अलौकिक सौंदर्य लिए भगवान यहां विराजमान है। सुबह मंगल आरती से रात्रि की आरती तक नित्य रोज पूजन अर्चन यहां पर होता है।

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