शिव ही सत्य है, शिव अनंत है शिव अनादि है, शिव भगवन्त है

शिव ही सत्य है, शिव अनंत है शिव अनादि है, शिव भगवन्त है

शिव ही सत्य है, शिव अनंत है। शिव अनादि है, शिव भगवन्त है।। शिव ही ओंकार है, शिव ही ब्रह्म है। शिव ही शक्ति है, शिव भक्ति है

महाशिवरात्रि हिन्दू धर्म का एक अत्यन्त प्राचीन, पवित्र और आध्यात्मिक पर्व है, जो भगवान शिव की आराधना के लिए समर्पित है। भगवान शिव को सृष्टि के त्रिदेवों में संहारक माना गया है, परन्तु वे केवल विनाश के देवता नहीं हैं, बल्कि पुर्ननिर्माण, करुणा, तपस्या, योग और ज्ञान के प्रतीक हैं। महाशिवरात्रि फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। यह पर्व आत्मचिंतन, आत्मसंयम एवं आत्मोन्नति का विशेष अवसर प्रदान करता है। महाशिवरात्रि का पर्व, रात्रि जैसी अज्ञानता, अहंकार और अंधकार से मुक्ति प्रदान करके ज्ञान, शांति और चेतना के प्रकाश की ओर अग्रसर होने का प्रतीक माना जाता है।
महाशिवरात्रि से जुड़ी कई पौराणिक कथायें हैं, जो इस पर्व का महत्व बताती हैं :-

(1) शिव-पार्वती विवाह कथा शास्त्रों के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए वर्षों तक कठोर तपस्या की। उनकी निष्ठा, श्रद्धा एवं समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने महाशिवरात्रि के दिन माता पार्वती से विवाह किया। यह विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि पुरुष और प्रकृति, चेतना और शक्ति के मिलन का प्रतीक है। यही कारण है कि इस दिन दाम्पत्य जीवन में प्रेम, विश्वास और सामंजस्य की कामना की जाती है।

(2) समुद्र मंथन और विषपान समय हलाहल नामक भयानक विष उत्पन्न हुआ, तब समस्त सृष्टि के विनाश का संकट उत्पन्न हो गया। उस समय भगवान शिव ने संसार की रक्षा के लिए उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। यह विष उनके कंठ में ही रुक गया, जिससे उनका कंठ नीला हो गया और वे नीलकंठ भी कहलाये। यह घटना शिव के त्याग, बलिदान और परोपकार का अद्भुत उदाहरण है। देवताओं और असुरों द्वारा किये गये समुद्र मंथन के

(3) शिवलिंग का दिव्य प्राकृट्य एक अन्य मान्यता के अनुसार, भगवान शिव इसी दिन एक अनंत अग्नि स्तम्भ के रूप में प्रकट हुए थे, जिसका न तो कोई आदि था और न अंत। यह निराकार ब्रह्म का प्रतीक है। शिवलिंग उसी निराकार एवं अनंत शिवत्व का प्रतीक माना जाता है, जिसकी पूजा महाशिवरात्रि के दिन विशेष रूप से की जाती है।
महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व अत्यन्त गहन है। यह पर्व केवल ब्रह्म पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि आंतरिक शुद्धि और आत्मिक जागरण का अवसर प्रदान करता है। भगवान शिव को आदि योगी और आदि गुरु कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इसी दिन उन्होंने योग और ध्यान का ज्ञान सप्त ऋषियों को प्रदान किया था। इस कारण महाशिवरात्रि योग, ध्यान, साधना और आत्मचिंतन के लिए सबसे उत्तम मानी जाती है। इस रात्रि को जागरण करने का विशेष महत्व है। रात्रि जागरण मनुष्य को आलस्य, अज्ञान और नकारात्मक विचारों से दूर रखता है। ध्यान, मंत्र, जाप और साधना से चेतना का स्तर ऊँचा होता है एवं आत्मिक शांति प्राप्त होती है।

व्रत, पूजा और अनुष्ठान का महत्व महाशिवरात्रि के दिन भक्तजन व्रत रखते हैं और शिवभक्ति में लीन रहते हैं। यह व्रत शरीर और मन दोनों की शुद्धि का साधन माना जाता है। शिवलिंग पर जल, दूध, दही, घी, शहद और शक्कर अर्पित किया जाता है, जिसे पंचामृत अभिषेक कहते हैं। प्रत्येक पदार्थ का अपना प्रतीकात्मक अर्थ होता है जल जीवन और शुद्धता, दूध पवित्रता और करुणा, दही स्थिरता, घी तेज और ऊर्जा, शहद मधुरता और एकता, का प्रतीक माना जाता है। बेलपत्र भगवान शिव को अत्यन्त प्रिय है। त्रिदल बेलपत्र, त्रिगुण, सत्य, रज और तप के संतुलन का प्रतीक है। शिव पर बेलपत्र अर्पित करने से मनुष्य अपने दोषों से मुक्ति की कामना करता है। इसके साथ ही मंत्र जाप “ॐ नमः शिवाय” का जाप अत्यन्त पुण्यदायक माना जाता है। यह मंत्र मन को शांत करता है और आत्मा को परम चेतना से जोड़ता है।
सामाजिक और नैतिक महत्व भगवान शिव का जीवन सादगी, त्याग और वैराग्य का आदर्श प्रस्तुत करता है। वे कैलाश पर्वत पर निवास करते हैं, भस्म धारण करते हैं और अल्प में संतोष का जीवन जीते हैं। यह हमें भौतिक लालसाओं से ऊपर उठकर सरल और संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देता है। महाशिवरात्रि समाज में संयम, सहनशीलता, करुणा और अहंकार त्याग जैसे मूल्यों को बढ़ावा देती है। यह पर्व हमें यह सिखाता है कि शक्ति का प्रयोग विनाश के लिए नहीं, बल्कि सृजन और संरक्षण के लिए होना चाहिए।

वैज्ञानिक और मानसिक दृष्टिकोण आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि से भी महाशिवरात्रि का महत्व स्वीकार किया जा सकता है। उपवास से शरीर का विषहरण होता है और पाचनतंत्र को विश्राम मिलता है। ध्यान और मंत्र जाप से मानसिक तनाव कम होता है, एकाग्रता बढ़ती है और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। भारत के विभिन्न भागों में महाशिवरात्रि बड़े उत्साह से मनाई जाती है। काशी, उज्जैन, हरिद्वार, केदारनाथ, सोमनाथ जैसे शिवधामों में विशेष आयोजन होते हैं। मेले, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों से वातावरण भक्तिमय हो जाता है। यह पर्व भारतीय संस्कृति की एकता और आध्यात्मिक गहराई को दर्शाता है।

महाशिवरात्रि केवल एक पर्व ही नहीं, बल्कि जीवन को समझने और सुधारने का अवसर है। यह हमें आत्मशुद्धि, आत्मसंयम और आत्मज्ञान की ओर प्रेरित करती है। भगवान शिव की आराधना से मनुष्य अपने भीतर की नकारात्मक शक्तियों का नाश कर सकता है और एक शांत, संतुलित एवं उद्देश्यपूर्ण जीवन की ओर अग्रसर हो सकता है। महाशिवरात्रि हमें यह संदेश देती है कि सच्ची शक्ति बाहरी नहीं बल्कि आन्तरिक होती है। शिवतत्व को अपनाकर मनुष्य अपने जीवन को सार्थक और दिव्य बना सकता है।

“महाशिवरात्रि की शुभकामनाएँ”
डॉ. नीलिमा पिम्पलापुरे लेखिका, शिक्षाविद समाजसेविका, सागर

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