राजनीतिनामा

सावरकर : राहुल का कोई दोष नहीं !

राहुल गांधी की अच्छी-खासी भारत-यात्रा चल रही है, लेकिन पता नहीं क्या बात है कि वक्त-बेवक्त उसमें वे पलीता लगवा लेते हैं। पहले उन्होंने जातीय-जनगणना के सोये मुर्दे को उठा दिया, जिसे उनकी माता सोनिया गांधी ने खुद दफना दिया था और अब उन्होंने महाराष्ट्र में जाकर वीर सावरकर के खिलाफ बयान दे दिया है। क्या उन्हें पता नहीं है कि विनायक दामोदर महाराष्ट्रियन थे और महाराष्ट्र के लोग उन्हें स्वांतत्र्य संग्राम का महानायक मानते हैं? स्वयं इंदिरा गांधी ने उन्हें महान स्वतंत्रता-सेनानी कहा है।

राहुल ने ब्रिटिश सरकार को लिखे सावरकर के एक पत्र को उद्धृत करते हुए कहा है कि सावरकर ने अपने आप को अण्डमान की जेल से छुड़वाने के लिए ब्रिटिश सरकार से माफी मांगी और रिहा होने के बाद उसके साथ पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया। राहुल का कहना है कि सावरकर ने ऐसा करके गांधी, पटेल और नेहरु के साथ विश्वासघात किया और वे अंग्रेजों का साथ देते रहे। ऐसा कहने में मैं राहुल का कोई दोष नहीं मानता हूं। यह दोष उनका है, जो लोग राहुल को पट्टी पढ़ाते हैं। बेचारे राहुल को स्वाधीनता संग्राम के इतिहास के बारे में क्या पता है? अंग्रेज के ज़माने के गुप्त दस्तावेजों का स्वाध्याय और अनुसंधान करना तो राहुल क्या, किसी पढ़े-लिखे नेता से भी उम्मीद नहीं की जा सकती लेकिन सावरकर पर इधर छपे 5-6 प्रामाणिक ग्रंथों को भी राहुल ने सरसरी नजर से भी देख लिया होता तो उन्हें पता चल जाता कि सावरकर और उनके भाई ने आजन्म जेल से छूटने के लिए ब्रिटिश सरकार को एक बार नहीं, कई बार चिट्ठियां लिखी थीं और वे हर कीमत पर जेल से छूटकर अंग्रेज के खिलाफ सशस्त्र क्रांति का षड़यंत्र रच रहे थे।

यह बात मैं नहीं कह रहा हूं। लगभग 40 साल पहले नेशनल आर्काइव्ज़ के गोपनीय दस्तावेजों को खंगालने पर मुझे पता चला कि उनके माफीनामे पर प्रतिक्रिया देते हुए गवर्नर जनरल के विशेष अधिकारी रेजिनाल्ड क्रेडोक ने लिखा था कि सावरकर झूठी माफी मांग रहा है और वह जेल से छूटकर यूरोप के ब्रिटिश-विरोधी आतंकवादियों से हाथ मिलाएगा और सशस्त्र क्रांति के द्वारा ब्रिटिश सरकार को उलटाने की कोशिश करेगा। सावरकर को जेल से छोड़ने के बाद भी बरसों-बरस नजरबंद करके क्यों रखा गया? यदि सावरकर अंग्रेजभक्त थे तो महात्मा गांधी खुद उनसे मिलने लंदन के ‘इंडिया हाउस’ में क्यों गए थे? स्वयं गांधीजी ब्रिटिश-विरोधी तो 1916 में बने। 1899 में वे अफ्रीका के बोइर-युद्ध में अंग्रेजों के साथ दे रहे थे। उन्हें ‘केसरे-हिंद’ की उपाधि भी अंग्रेज सरकार ने दी थी। सावरकर उनके बहुत पहले से ही ब्रिटिश सरकार को उलटाने की कोशिश कर रहे थे? क्या वजह है कि मदाम भीकायजी कामा, सरदार भगतसिंह और सुभाषचंद्र बोस सावरकर के भक्त थे?

यह ठीक है कि आप सावरकर और सुभाष बोस के सशस्त्र क्रांति के हिंसक तरीकों से असहमत हों लेकिन सावरकर को लांछित करने और अंग्रेजों को लिखे उनके पत्रों की मनमानी व्याख्या करने की तुक क्या है? यदि राहुल का सोच यह है कि इससे वे ज्यादा वोट कबाड़ सकेंगे तो उन्हें पता होना चाहिए कि महाराष्ट्र में आजकल उनका साथ देने वाली उद्धव ठाकरे की शिवसेना को उन्होंने कितनी अधिक तकलीफ पहुंचाई है। सावरकर को नीचा दिखाकर भाजपा को हानि पहुंचाने की रणनीति कांग्रेस के लिए आत्मघाती सिद्ध हो सकती है।

 

आलेख श्री वेद प्रताप वैदिक जी, वरिष्ठ पत्रकार ,नई दिल्ली।

साभार राष्ट्रीय दैनिक  नया इंडिया  समाचार पत्र  ।

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