डॉ. हरीसिंह गौर का जन्म महाकवि पद्माकर की नगरी, सागर शहर मध्यप्रदेश में, शनीचरी टौरी में एक गरीब परिवार में 26 नवम्बर 1870 को हुआ था। उनके पिता का नाम गंगाराम गौर था। आर्थिक तंगी और सामाजिक कठिनाईयों के बावजूद डॉ. गौर ने शिक्षा को अपना लक्ष्य बनाया और कठिन परिश्रम से अपने जीवन की दिशा बदली। उन्होंने सागर के ही गवर्नमेंट हाईस्कूल से मिडिल शिक्षा प्रथम श्रेणी में हासिल की। पढ़ाई में बुद्धिमान, अब्बल होने से उन्हें छात्रवृत्ति भी मिली, जिसके सहारे उन्होंने अपनी पढ़ाई का क्रम जारी रखा। हाईस्कूल की शिक्षा के लिए वे जबलपुर गये, फिर महाविद्यालय की पढ़ाई के लिए नागपुर के हिसलप कॉलेज में दाखिला ले लिया, जहाँ से उन्होंने
इंटरमीडियट की परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी। उन्होंने प्रांत में प्रथम स्थान प्राप्त किया जिससे उन्हें कई पुरस्कार मिले।
सन् 1889 में उच्च शिक्षा के लिए स्कालरशिप के माध्यम से वे इंग्लैंड गए। सन् 1892 में दर्शनशास्त्र व अर्थशास्त्र में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से डॉ. गौर ने ऑनर्स की उपाधि प्राप्त की, तत्पश्चात् सन् 1896 में एम.ए., सन् 1992 में एल. एल.एम. और अंततः सन् 1908 में एल.एल.डी. की उपाधि हासिल की। कैम्ब्रिज में पढ़ाई से जो समय बचता था, उसमें वे ट्रिनिटी कॉलेज में डी.लिट. तथा एल.एल. डी. की पढ़ाई करते थे। उन्होंने अंतर-विश्वविद्यालयीन शिक्षा समिति में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व किया, जो उस समय किसी भारतीय के लिए अत्यन्त गौरव की बात थी। डॉ. सर हरीसिंह गौर ने छात्र जीवन में ही दो काव्य संग्रह की रचना की, जिससे सुप्रसिद्ध रॉयल सोसायटी ऑफ लिटरेचर द्वारा उन्हें स्वर्णपदक प्रदान किया गया था।
सन् 1902 में बैरिस्टर बनकर वे स्वदेश लौटे। उन्होंने अखिल भारतीय स्तर पर वकालत प्रारम्भ कर दी तथा 4 वर्षों तक इंग्लैंड की प्रीवि काउंसिल से वकालत भी की थी। उन्हें एल.एल.डी. तथा डी.लिट की सर्वोच्च उपाधि से भी विभूषित किया गया। सन् 1902 में उनकी पुस्तक “द लॉ ऑफ ट्रांसफर इन ब्रिटिश इंडिया” प्रकाशित हुई। वर्ष 1909 में “दि पीनल लॉ ऑफ ब्रिटिश इंडिया” नामक पुस्तक भी प्रकाशित हुई, जो देश-विदेश में मान्यता प्राप्त पुस्तक है। प्रसिद्ध विधिवेत्ता सर फ्रेडरिक पैलाक ने भी उनके ग्रंथ की प्रशंसा की थी। इसके अतिरिक्त डॉ. गौर ने बौद्ध धर्म पर कई पुस्तकें लिखीं, जिसमें “द स्प्रिट ऑफ बुद्धिज्म” नामक पुस्तक प्रसिद्ध है। इस पुस्तक की प्रस्तावना कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा लिखी गई है। इस पुस्तक को पढ़कर डॉ. भीमराव अम्बेडकर भी बहुत प्रभावित हुए थे। डॉ. गौर द्वारा लिखी गई पुस्तक “द स्प्रिट ऑफ बुद्धिज्म”, एवं बौद्ध दर्शन पर विशेष ज्ञान होने के कारण, जापान में उन्हें धर्मगुरु का सम्मान दिया गया था।
वे शिक्षाविद् भी थे, सन् 1921 में केन्द्रीय सरकार ने जब दिल्ली विश्वविद्यालय की स्थापना की, तब डॉ. हरीसिंह गौर को विश्वविद्यालय का संस्थापक कुलपति नियुक्त किया गया। 9 जनवरी 1925 को शिक्षा के क्षेत्र में ब्रिटिश सरकार ने “सर” की उपाधि से विभूषित किया था, तत्पश्चात् डॉ. सर हरीसिंह गौर को दो बार नागपुर विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया था।
यह भी एक संयोग की बात है कि स्वतंत्र भारत व सागर विश्वविद्यालय का जन्म एक ही समय हुआ। डॉ. सर हरीसिंह गौर को अपनी जन्मभूमि सागर में उच्च शिक्षा की व्यवस्था न होने से हमेशा दुख रहा। इसी कारण द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् ही इंग्लैंड से लौटकर उन्होंने अपने जीवनभर की मेहनत की कमाई से इस विश्वविद्यालय की स्थापना की। वे कहते थे कि राष्ट्र का धन न सोने-चाँदी के खजाने में या न कारखानों में सुरक्षित रहता है, यह केवल नागरिकों के मन और ज्ञान में समाया रहता है। उनकी सेवाओं के प्रति सम्मान प्रकट करने हेतु भारतीय डाक व तार विभाग ने 1976 में एक डाक टिकिट जारी किया, जिस पर उनके चित्र को प्रदर्शित किया गया है।
डॉ. सर हरीसिंह गौर सामाजिक कुरीतियों के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने स्त्रियों की शिक्षा, विधवा पुर्नविवाह जैसे मुद्दों पर कार्य किया। वे जातिवाद के प्रबल विरोधी थे एवं समाज में समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के सिद्धान्तों को बढ़ावा देते थे। उन्होंने महिलाओं के अधिकारों की वकालत की और कई बार स्त्रियों को संपत्ति में अधिकार दिलाने जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे उठाये।
इस महान विभूति का निधन 25 दिसम्बर 1949 में हुआ। लेकिन उन्होंने जो कार्य किये, जो संस्थान बनाये और जो विचार छोड़ गये, वे आज भी समाज के लिए पथ-प्रदर्शक हैं। वे एक ऐसे व्यक्तित्व थे जिन्होंने अपने जीवन में अनेक क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य किए और एक मिसाल कायम की। वे भारतीय शिक्षा व्यवस्था के निर्माता, विधि के ज्ञाता और समाज सुधारक के अग्रदूत थे। उनकी दूरदर्शिता, समर्पण एवं सेवा भावना आज भी हमें प्रेरित करती है। डॉ. हरीसिंह गौर, गरीब परिवार में जन्मे, आर्थिक तंगी एवं कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने शिक्षा को अपना लक्ष्य बनाया एवं अथक परिश्रम और लगन से अपने जीवन को सफल बनाया। भारत की वर्तमान पीढ़ी को उनके जीवन से प्रेरणा लेनी होगी, जिससे हम एक समतामूलक, शिक्षित एवं प्रगतिशील समाज की ओर बढ़ सकें। डॉ. हरीसिंह गौर का जीवन हमें यह सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी शिक्षा, दृढनिश्चय एवं परिश्रम के बल पर महान कार्य किये जा सकते हैं। आज डॉ. हरीसिंह गौर के 156 वें जन्म जयंती पर हम सागरवासी गर्व से उन्हें नमन करते हैं।
डॉ. नीलिमा पिम्पलापुरे लेखिका, शिक्षाविद समाजसेविका, सागर
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