शीर्षक पढकर चौँकिए मत! मैं सचमुच सोच रहा हूँ कि क्या भारत के मौन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खाडी में चल रही जंग को रुकवा सकते हैं यानि सीजफायर करा सकते हैं? दर असल ये बात मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि भाजपा में एक जुमला चलता है कि ‘ मोदीजी हैं तो मुमकिन है.’भारत में मोदी समर्थकों की तरह ही खाडी के कुछ देशों को लगता है कि मोदीजी कोशिश तो करें, शायद सीजफायर हो जाए! आज अमेरिका, इजराइल और ईरान आमने-सामने हैं।ड्रोन, मिसाइल और नौसेना की तैनाती से पूरा खाड़ी इलाका बारूद के ढेर पर बैठा है। सबसे बड़ा सवाल है—यह युद्ध कितने दिन चलेगा? सीजफायर कौन कराएगा? और क्या सचमुच प्रधानमंत्री मोदी का एक फोन इस जंग को रोक सकता है?
इस समय संघर्ष का केंद्र है पश्चिम एशिया और खाड़ी क्षेत्र।यह वही इलाका है जहाँ से दुनिया के लगभग30 फीसदी तेल की आपूर्ति गुजरती है।सबसे अहम हैहोर्मुज जलडमरूमध्य।यदि यह रास्ता बंद होता है तोतेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं.भारत, चीन, यूरोप सभी प्रभावित होंगे.भारत की लगभग 60 फीसदी से अधिक तेल आपूर्ति खाड़ी देशों से आती है।इसलिए यह युद्ध सिर्फ सैन्य संघर्ष नहीं,वैश्विक अर्थव्यवस्था का संकट बन सकता है।
अमेरिका क्यों लड़ रहा है?अमेरिका के लिए यह युद्ध तीन कारणों से महत्वपूर्ण है—इजराइल की सुरक्षा ईरान की सैन्य ताकत को रोकना,खाड़ी के ऊर्जा मार्गों पर नियंत्रण बनाए रखना. जंग का असली मैदान ईरान है लेकिन सवाल उठने लगा है—क्या अमेरिका इस युद्ध से थक रहा है?अफगानिस्तान और इराक के लंबे युद्धों के बाद.अमेरिकी जनता अबनई जंगों से बचना चाहती है। ईरान के लिए यह अस्तित्व की लड़ाई है.ईरान के लिए यह सिर्फ युद्ध नहीं,सत्ता बचाने की लड़ाई है। ईरान की इस्लामिक सरकार मानती है कि यदि वह पीछे हटती है तोउसकी क्षेत्रीय ताकत खत्म हो सकती है.उसके सहयोगी संगठन कमजोर पड़ जाएंगेइसलिए ईरान लगातार ड्रोन, मिसाइल और नौसैनिक ताकत का इस्तेमाल कर रहा है।खाड़ी देश यूएई, सऊदी अरब, कतर और बहरीनइस युद्ध को लंबा नहीं देखना चाहते।भारत में यूएई के पूर्व राजदूत हुसैन हसन मिर्जा ने कहा—अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीईरान और इजराइल के नेताओं से बात करेंतो एक फोन कॉल से भी समाधान निकल सकता है।उनका दावा है किमोदी की प्रतिष्ठा दोनों देशों में है।लेकिन सवाल यह है—क्या सचमुच एक फोन कॉल से युद्ध रुक सकता है?भारत की स्थिति दिलचस्प है।भारत के अच्छे संबंध हैं—इजराइल से,ईरान से.खाड़ी देशों सेअमेरिका सेइसलिए भारत मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है।लेकिन भारत की नीति अभी तक साफ है—“संयम और कूटनीति।”भारत सीधे युद्ध में कूदने से बचेगा।
इतिहास बताता है कि खाड़ी क्षेत्र के युद्ध जल्दी खत्म नहीं होते.उदाहरण के लिए आपको बता दूं कि ईरान-इराक युद्ध – 8 साल और सालइराक युद्ध – लगभग 9 साल चला था. रूस -यूक्रेन को भी 4 साल पूरे चुके हैं.यदि यह संघर्ष अमेरिका और ईरान के बीच सीधी लड़ाई बन गया तो यह युद्ध कई महीनों या वर्षों तक भी चल सकता है।इस जंग में सीजफायर कौन कराएगा इसे लेकर तीन संभावनाएँ हैं—
पहली:अमेरिका दबाव बनाकर युद्ध रोक दे.
दूसरी:संयुक्त राष्ट्र या यूरोप मध्यस्थता करे और
तीसरी:भारत या खाड़ी देश दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर लाएँ।
लेकिन फिलहालजमीन पर शांति के संकेत बहुत कमजोर हैं सच यह है कि यह युद्ध सिर्फ तीन देशों का नहीं है। यह युद्ध है ऊर्जा का,शक्ति संतुलन का,और वैश्विक राजनीति का।और जिगर मुरादाबादी का शेर फिर याद आता है—
ये इश्क़ नहीं आसान…बस इतना समझ लीजे।
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है।
अब देखना यह है कि इस आग के दरिया मेंकौन डूबता हैऔर कौन किनारे लगता है।
श्री राकेश अचल ,वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनैतिक समीक्षक, मध्यप्रदेश
⇑ वीडियो समाचारों से जुड़ने के लिए कृपया हमारे चैनल को सबस्क्राईब करें , धन्यवाद।

