भारत में राजनितिक विमर्श बड़ी तेजी से बदलते है और आज के दौर में उससे भी जल्द बदलती है नेताओं की विचारधारा बीते दो दिनो से देश की राजनीति में सबसे बड़ी खबर है कि राघव चड्ढा ने आम आदमी पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया है राघव चड्ढा ने केवल पार्टी नहीं बदली बल्कि अपने साथ आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसदों के बड़े हिस्से को भी भाजपा के साथ जोड़ दिया। आाप के 10 में से 7 राज्यसभा सांसदों ने भाजपा के साथ जाने का फैसला किया है। इसके बाद सोशल मीडिया पर जबरदस्त राजनीतिक बवाल है जहाँ भाजपा इसे श्सही समय पर सही निर्णय बता रही है वहीं आम आदमी पार्टी समर्थक और विपक्षी खेमे के लोग राघव चड्ढा को गद्दार कहकर जमकर निशाना बना रहे हैं। और देश का बुद्धिजीवी वर्ग दल बदल कानून की समीक्षा की बात भी कर रहा है राघव चड्ढा ने अपने फैसले का बचाव करते हुएआम आदमी पार्टी पर कटाक्ष किया और कहा कि पार्टी अपने मूल सिद्धांतों से भटक चुकी थी।उन्होंने कहा कि जनता की सेवा के लिए उन्हें नया रास्ता चुनना पड़ा। अब सवाल यह उठ रहा है क्या यह वैचारिक बदलाव है या फिर राजनीतिक भविष्य बचाने की रणनीति क्या यह भाजपा की मजबूती है या आम आदमी पार्टी की अंदरूनी कमजोरी और सबसे बड़ा सवाल क्या जनता ऐसे नेताओं को स्वीकार करती है जो विचारधारा बदलते हैं या उन्हें गद्दार कहकर अस्वीकार कर देती है फिलहाल सोशल मीडिया का फैसला साफ है बहस अभी खत्म नहीं हुई है।
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