लोकतंत्र-मंत्र

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार -“तौबा मेरी तौबा “

जो चीज नंगी आंखों से भी दिखे, उसे मत देखो. काले को काला और सफेद को सफेद मत कहो. ये मेरा नहीं देश की सबसे बडी अदालत का अलिखित, अघोषित हुक्म है. इसीलिए सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी के बाद ‘ज्यूडीशियल करप्शन’ चैप्टर वाली एनसीईआरटी की किताब की बिक्री पर रोक लगा दी गई है। क्योंकि इस विषय का सीधा ताल्लुक माननीय न्यायपालिका की बदनामी से जुडा है.देश के नामी वकील द्वय कपिल सिब्बल और अभिषेक सिंघवी ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में यह मामला उठाया था। सिब्बल ने मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की बेंच को बताया कि कक्षा 8 के बच्चों को न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में पढ़ाया जा रहा है। यह निंदनीय है। सिंघवी ने कहा कि लगता है कि एनसीईआरटी ने मान लिया है कि राजनीति, नौकरशाही और अन्य संस्थानों में भ्रष्टाचार है ही नहीं।जाहिर है कि इस पर मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत को गुस्सा आना ही था. उन्होंने कहा कि – दुनिया में किसी को भी न्यायपालिका को बदनाम करने की इजाजत नहीं दी जाएगी। यह एक सोची-समझी और गहरी साजिश लगती है। मुझे पता है इससे कैसे निपटना है।मैं यह केस खुद हैंडल करूंगा। हम इस बारे में और कुछ नहीं कहना चाहते.एनसीआरटीई के चेयरमैन दिनेश प्रसाद सकलानी का इस मुद्दे पर कोई जवाब नहीं आया है। काउंसिल के एक सीनियर अधिकारी ने कहा कि मामला अब कोर्ट में विचाराधीन है। इसलिए वे इस मुद्दे पर कुछ भी नहीं बोंलेंगे।इस बीच सरकारी सूत्रों ने कहा कि भले ही एनसीईआरटी एक स्वायत्त संस्था है, लेकिन न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का अध्याय जोड़ने से पहले अधिकारियों को ध्यान देना चाहिए था।
मजे की बात ये है कि जिस मुद्दे पर माननीय न्यायमूर्तिगण क्षुब्ध हैं उस विषय यानि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित आंकड़े संसदीय अभिलेखों और नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड में मौजूद हैं, लेकिन किसी किताब में इन्हे शामिल करना एक तरह का दुस्साहस है. कहा जा रहा है कि कम से कम तथ्यों के कूट सत्यापन लिए केंद्र से परामर्श लिया जाना चाहिए था.
                                   उल्लेखनीय है कि एनसीईआरटी ने 23 फरवरी को कक्षा 8 के छात्रों के लिए समाज विज्ञान की नई पाठ्यपुस्तक जारी की थी। ये किताब 2026-27 से अकादमिक सत्र में स्कूलों में पढ़ाई जानी थी। इसका पहला भाग जुलाई 2025 में जारी किया गया था।किताब का नाम ‘एक्सप्लोरिंग सोसायटी: इंडिया एंड बियॉन्ड पार्ट 2’ है। इसमें ‘द रोल ऑफ द ज्यूडीशियरी इन अवर सोसायटी’ चैप्टर के अंदर ‘करप्शन इन द ज्यूडिशियरी’ का अध्याय जोड़ा गया है।इसमें कहा गया है कि भ्रष्टाचार, बड़ी संख्या में लंबित मामले और जजों की भारी कमी न्याय प्रणाली के सामने प्रमुख चुनौतियों में शामिल हैं। जज आचार संहिता से बंधे होते हैं, जो न केवल कोर्ट में उनके व्यवहार को नियंत्रित करता है, बल्कि अदालत के बाहर उनके आचरण को भी तय करती है।किताब अपनी जगह है और हकीकत अपनी जगह. देश की सबसे बडी अदालत नीचे की अदालतों में भ्रष्टाचार होते देख लें तो मुमकिन है कि उनकी रूह कांप जाए. पर बडी अदालत को लगता है कि इस विषय को लिखने-पढने से न्यायपालिका की बदनामी होगी. मी लार्ड बदनाम तो हमारी न्यायपालिका न जाने कब से है लेकिन कोई अवमानना के डर से बोलता नहीं.अन्यथा गरीब आदमी को छोटी अदालतों में आज भी तारीख लेने, बढाने और हाजरी माफी के लिए नजराना देना पडता है. वो भी झक मारकर.सबको पता है कि हमारी न्यायपालिका काम बाढ का शिकार है. देश के सुप्रीम कोर्ट में 81 हजार, हाईकोर्ट्स में 62 लाख 40 हजार, जिला और उप न्यायालयों के 4 करोड़ 70 लाख मामले लंबित हैं. लेकिन इससे न्यायपालिका बदनाम नही होती. उसकी बदनामी होती है भ्रष्टाचार का जिक्र करने भर से जिस किताब को लेकर हमारे मी लार्डस आग बबूला हो रहे हैं उसी किताब में भारत के पूर्व चीफ जस्टिस बीआर गवई का भी जिक्र है, जिन्होंने जुलाई 2025 में कहा था कि ज्यूडिशियरी के अंदर करप्शन और गलत कामों के मामलों का पब्लिक ट्रस्ट पर बुरा असर पड़ता है। उन्होंने कहा था, “हालांकि, इस ट्रस्ट को फिर से बनाने का रास्ता इन मुद्दों को सुलझाने के लिए उठाए गए तेज, निर्णायक और ट्रांसपेरेंट एक्शन में है… ट्रांसपेरेंसी और अकाउंटेबिलिटी डेमोक्रेटिक गुण हैं।”
                                    माननीय मुख्यन्यायाधीश की नाराजगी के बाद किताब एनसीईआरटी की की वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं है। किताब की ऑफलाइन बिक्री भी मंगलवार 24 फरवरी से बंद कर दी गई है। हालांकि अब तक संस्था की तरफ इसको लेकर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।लगता है आने वाले दिनों में देश की जनता न भ्रष्टाचार पर बोल पाएगी न अनैतिकता पर. बोलेगी तो या तो जनता सरकार का कोपभाजन बनेगी या अदालत का.क्योंकि यहाँ किसी को भी बदनाम करने की इजाजत नहीं दी जाएगी.आप अदालत को छोडकर किसी को भी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बदनाम कर सकते हैं, फिर चाहे वो महात्मा गांधी हो, देश का पहला पंत प्रधानमंत्री हो.मी लार्ड ! वैसे पूरी दुनिया में किसी को बदनाम करने के लिए इजाजत लेने की जरुरत शायद ही पडती हो.ऐसी कोई नजीर भी नहीं है कि दुनिया में किसी ने इजाजत लेकर किसी व्यक्ति या संस्था को बदनाम किया हो. मेरे मन में भी माननीय अदालत के प्रति पूरी श्रद्धा और विश्वास है किंतु भ्रष्टाचार तो भ्रष्टाचार है.
श्री राकेश अचल  ,वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनैतिक समीक्षक, मध्यप्रदेश

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