सम्पादकीय

बिहार चुनाव 2025 – पुरानी राजनीति ने भी अपने चश्में के नंबर बदले !

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के परिणामों ने सभी को चौकाया है न केवल विपक्ष को बल्कि सत्ताधारी भाजपा और राजद ने भी इस कदर छप्परफाड़ जीत की कल्पना नहीं की थी यह नतीजे एक बार फिर यह साबित करते हैं कि राज्य की राजनीति तेज़ी से बदल रही है।लंबे समय से चली आ रही पारंपरिक जातीय गणित एमवाई समीकरण और लालू परिवार बनाम बाकी की सोच को इस बार जनता ने नए नज़रीये से देखा।परिणाम भाजपा जदयू गठबंधन की स्पष्ट और निर्णायक जीत और राजद की अप्रत्याशित हार।

यह चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं बल्कि राजनीतिक सोच नेतृत्व और जनता की प्राथमिकताओं में बदलाव का संकेत भी है। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा जदयू को मिली यह सफलता केवल चुनावी गणित को समझ लेना बस है या फिर इसका आधार विकास है । जब जमीनी स्तर पर इसका अवलोकन किया जायेगा तो स्पष्ट रूप सेविकास बनाम विरासत की लड़ाई में विकास आगे रहा है बीते वर्षों में बिहार में सड़क बिजली स्वास्थ्य शिक्षा, कानूनव्यवस्था और आधारभूत सुविधाओं की स्थिति बेहतर हुई है। नीतीश कुमार की प्रशासनिक छवि और भाजपा की केंद्र से मिलने वाली मदद एक संयुक्त गवर्नेंस मॉडल  के रूप में जनता को भरोसेमंद लगा।नीतीश कुमार के मदिरा निषेध, साइकिल योजना, कन्या उत्थान और भाजपा के लाभार्थी योजनाओं ने महिलाओं का वोट निर्णायक ढंग से मोड़ा। चुनाव प्रचार में पीएम मोदी की सभाओं का असर साफ़ दिखा।डबल इंजन सरकार का नारा लाभार्थियों के बीच मजबूत पकड़ और मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता भाजपा को फायदा दिलाती रही।भाजपा ने अति पिछड़े वर्ग कुर्मी कोइरी और अन्य छोटे समूहों को सशक्त रूप से जोड़ा। यह वह वर्ग था जिसे पहले राजद का एमवाई समीकरण करता था। पिछले कुछ वर्षों के उतारचढ़ाव के बाद जदयू भाजपा गठबंधन इस बार अधिक स्थिर और एकमत दिखा। वोटरों ने इसे स्थायी सरकार के विकल्प के रूप में चुना।तो वहीं दूसरी तरफ विपक्ष की हार भी उनकी कल्पनाओं से अधिक भयावह है तो आखिर राजद की हार में क्या गलत हो गया राजद का पारंपरिक मुस्लिमयादव समीकरण भले आज भी मजबूत है पर युवाओं और नए वर्गों तक पार्टी अपनी पकड़ मजबूत नहीं कर पाई। तेजस्वी यादव की छवि नौकरी देने वाले नेताकी थी लेकिन ठोस नींव और प्रशासनिक भरोसा जनता को कम दिखा। जमीन पर विकास की तुलना में राजद का नैरेटिव कमजोर पड़ा। लालू- राबड़ी शासनकाल की यादें अभी भी बुजुर्ग मतदाताओं के मन में ताज़ा हैं । जिसे विपक्ष ने जंगलराज के रूप में लगातार उछाला।तेजस्वी यादव प्रयासशील तो हैं लेकिन जनता ने उन्हें अभी भी पूर्ण विकल्प के रूप में मजबूत नहीं माना। इसके अलावा गठबंधन की कमी और रणनीति की भूलों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । राजद कई सीटों पर ओवरकॉन्फिडेंस में चल पड़ा।महागठबंधन की कमजोर स्थिति और संगठनात्मक कमजोरी ने भी नुकसान पहुंचाया। और इसका सीधा फायदा भाजपा को हुआ ।पहली बार इस चुनाव में युवा लहर भाजपा के हक में दिखाई दी। नौकरी और शिक्षा के नए दावे राजद को मजबूती नहीं दिला सके।
कुलमिलाकर बिहार चुनाव परिणाम के राजनैतिक मायने यह है कि अब बिहार की राजनीति जातीय समीकरणों से आगे बढ़ रही हैपरिणाम इस बात का संकेत हैं कि अब जनता सिर्फ जाति के आधार पर वोट नहीं दे रही बल्कि नेतृत्व की स्थिरता और गवर्नेंस को प्राथमिकता दे रही है। भाजपा-जदयू गठबंधन अब अधिक नियंत्रित स्थिति में है इस जीत के बाद भाजपा राज्य में निर्णायक शक्ति बनकर उभरी है जबकि जदयू अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने में सफल रहा है।

अभिषेक तिवारी

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