अपराध

बहुत लंबी होती है अदावत की उम्र

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला पर एक शादी समारोह के दौरान जानलेवा हमला करने की कोशिश ने एक बार फिर प्रमाणित कर दिया है कि अदावत की उम्र बहुत लंबी होती है. ईश्वर का आभार कि फारूक साहब सकुशल हैं, यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में स्थित एक बैंक्विट हॉल में हुई, जहां एक निजी विवाह समारोह चल रहा था. समारोह में कई राजनीतिक हस्तियां और मेहमान मौजूद थे. इसी दौरान भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने अचानक बंदूक निकालकर फारूक अब्दुल्ला के बेहद करीब पहुंचकर फायरिंग करने की कोशिश की. हालांकि सुरक्षा कर्मियों की तत्परता से वे बाल-बाल बच गए. घटना के तुरंत बाद मौके पर मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने हमलावर को पकड़ लिया और पुलिस के हवाले कर दिया. फारूक अब्दुल्ला पर हमला करने वाले आरोपी कमल सिंह जमवाल के जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का रहने वाला है. पुलिस पूछताछ में आरोपी कमल सिंह जमवाल ने चौंकाने वाला दावा किया है. उसने कहा कि वह पिछले करीब 20 साल से फारूक अब्दुल्ला को मारने का इंतजार कर रहा था. उसने कथित तौर पर पुलिस को बताया कि यह हमला किसी संगठन या साजिश का हिस्सा नहीं बल्कि उसका निजी एजेंडा था. रिपोर्ट्स के अनुसार उसने यह भी कहा कि उसे अपने किए पर कोई पछतावा नहीं है. हालांकि पुलिस उसके बयान की तस्दीक कर रही है.
                                           फारुक साहब पर हमला उस प्रवृत्ति का परिचायक है जो घृणा से उपजती है. इसी घृणा की वजह से 1948 में महात्मा गांधी मारे जाते हैं और यही घृणा बाद में देश के तमाम राष्ट्रीय और प्रांतीय नेताओं की हत्या की वजह बनती है. घृणा का जन्म मजहबी संकीर्णता की गोद से होता है. दुर्भाग्य ये है कि घृणा की खेती इस समय सत्ता प्रतिष्ठान के संरक्षण में व्यापक स्तर पर हो रही है.डाक्टर फारुक अब्दुल्ला 88 वर्ष के हैं. खानदानी सियासतदां हैं. उनके वालिद भी सियासत में थे और उनका बेटा भी सियासत में है. फारुक साहब से घृणा की एक वजह ये भी हो सकती है. ये घृणा जितनी फारुक साहब के प्रति है उतनी ही लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के प्रति भी है. मैं अक्सर सोचता हूँ कि देश की सियासत को इस घृणा से कैसे महफूज रखा जा सकता है ?मैं डाक्टर फारुक अब्दुल्ला से कोई 42 साल पहले मिला था. वे तब भी उतने ही खूबसूरत, उतने ही हाजिरजबाब और उतने ही मस्तमौला थे जितने कि आज हैं. वे तब भी विवादों से घिरे रहते थे और आज भी विवाद उनके आगे-पीछे चलते हैं. मैं जाती तौर पर उनका मुरीद हूँ इसलिए मैं उनके ऊपर हुए हमले से क्षुब्ध हूँ.असल सवाल यही है कि जो इनसान आपसे सहमत नहीं है तो उसकी हत्या कर देना चाहिए?फारूख अब्दुल्ला तीन बार जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बने .तीनों कार्यकाल को मिलाकर उन्होंने करीब 12 साल तक मुख्यमंत्री की भूमिका का निर्वाह किया, जाहिर है कि सूबे की जनता उनसे मोहब्बत करती रही होगी. फारूख अब्दुल्ला मनमोहन सिंह की सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रहे.वह जम्मू-कश्मीर के ऐसे राजनेता हैं, जो पिछले पांच दशक से सक्रिय हैं. राजनीति में वह हमेशा एक शक्तिशाली ध्रुव रहे। 2014 के बाद उन्होंने बीजेपी विरोधी मोर्चे का खुलकर समर्थन किया.ये हकीकत है कि फारुक साहब अपने पाकिस्तान समर्थित बयानों के लिए आलोचना के शिकार भी होते रहे है.लेकिन इसी वजह से वे नायक से खलनायक नहीं बन जाते..21 अक्तूबर 1937 को जन्मे फारूख अब्दुल्ला विरासत की राजनीति की पुराने स्तंभों में से एक हैं। इस स्तंभ की सुरक्षा बहुत जरूरी है.फारुक साहब सर्वधर्म समभाव की मिसाल हैं. वे राम के भी भक्त हैं और कृष्ण के भी. वे भजन भी गाते हैं और अग्निमुखी भाषण भी देते हैं. वे देश के पंत प्रधान भी हो सकते थे लेकिन हुए नहीं क्योंकि इस पद की कोई लकीर उनके हाथेली में नहीं थी. बहरहाल वे शतायु हों.
@ राकेश अचल

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