कलमदार

“अभिव्यक्ति की आजादी” को नंगा करता अहंकार…

बीते दशक में वैश्विक स्तर पर और खासकर भारत जैंसे प्रगतिशील देश में यदि किसी क्षेत्र में हुए विकास को क्रांति का नाम दिया जाये तो निश्चित ही वह संचार क्षेत्र में इंटरनेट के इस्तेमाल को माना जायेगा यह एक एंसी क्रांति है जिसने सबसे तेज गति से प्रत्येक क्षेत्र में बदलाव प्रतिस्थापित किये आज हमारा जीवन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इंटरनेट पर लगभग निर्भर है । इंटरनेट में भी सोशल मीडिया इंटरनेट का वह भाग है जिसने आम आदमी तक अपनी पहुँच बनायी और उसे इंटरनेट की आवश्यकता का अनुभव कराया । सोशल मीडिया आज लगभग हर क्षेत्र में हमारे विचारों को बनाने,परिर्वतित करने या मोड़ने में हस्तक्षेप करता है खासतौर पर राजनीतिक क्षे़त्र में सोशल मीडिया की भूमिका क्या हो सकती है इसका अंदाजा सत्ताधारी दल भाजपा ने सबसे पहले लगा लिया था और सोशल मीडिया पर प्रचार और विचारों के दम पर ही भाजपा ने 2014 और उसके बाद के चुनावों में अपनी विजय यात्रा को जारी रखा । अन्य दल देर से ही सही लेकिन सोशल मीडिया की ताकत का अंदाजा लगाने में अब दुरूस्त हो गये है यही कारंण है कि आज हर राजनैतिक दल की अपनी सोशल मीडिया टीम होती है जो अपनी पार्टी की विचारधारा को सोशल मीडिया के माध्यम से आसानी से आम आदमी तक पहंुचाने का कार्य करती है । लेकिन इसके बढते प्रभाव ने जहां भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में संविधान में प्रदत्त  अनुच्छेद 19.1 (a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता  जिसमें “भारत देश के प्रत्येक नागरिक को भाषण द्वारा लेखन, मुद्रण, चित्र या किसी अन्य तरीके से स्वतंत्र रूप से किसी के विचारों और विश्वासों को व्यक्त करने का अधिकार प्रदान करती है”। के प्रति जागरूक बनाया तो इसके दुरूपयोग ने इस अधिकार की संवेदनशीलता को सुदृढ बनाये रखने की चुनौती से भी अवगत कराया । बीते वर्षो में कई ऐसं प्रकरण सामने आये है जिसमें इसी आधिकार के तहत किये गये प्रदर्शन को सरकारों द्धारा राजद्रोह की श्रेणी में रखा गया हांलाकि सुप्रीम कोर्ट द्धारा अधिकांश मामलों में इसे राजद्रोह या गंभीर नहीं माना गया ।
राजनैतिक क्षेत्र में सोशल मीडिया के बढते इस्तेमाल और इसके प्रयोग में किसी भी प्रकार की कोई तय गाईडलाईन के न होने के कारंण ही सोशल मीडिया जर्नलिज्म इन जरबदस्त रूप से पत्रकारिता के कार्यक्षेत्र में न सिर्फ हस्तक्षेप कर रही है वरन कई बार एंसे मुददे भी खोजकर सामने लाती है जो पारंपरिक पत्रकारिता को आईना दिखाने का काम करती है हालाकि प्रत्येक क्षेत्र की तरह ही सोशल मीडिया जर्नलिज्म केे भी अपने साइड इफेक्ट हैं। लकिन यह भी सरकार की लचर नीति के कांरण ही जन्म लेते है । सवाल यह है कि जिस कार्य को करने के लिये कोई शासकीय नियम या योग्यता ही नहीं है उसके गलत उपयोग पर आप उसे फर्जी या अवैध कैसे घोषित कर सकते है। मतलब जब तक तथ्य आपके पक्ष में है तो सब स्वीकार्य है और वही तथ्य जब आपके खिलाफ होती है तो आप उसे अवैध घोषित कर देते है । मीठा- मीठा गप और कड़वा- कड़वा थू।
इसी प्रकार का ताजा मामला मध्य प्रदेश के सीधी ज़िले से आया है जिसमे पुलिस थाने की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रही है इस तस्वीर में कुछ अर्धनग्न लोग खड़े नज़र आ रहे और सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि तस्वीर में थाने के भीतर अर्धनग्न खड़े लोग स्थानीय पत्रकार हैं जिन्हे पुलिस प्रशासन या स्थानीय राजनेताओं के खिलााफ खबर चलाये जाने के कारंण इस प्रकार दंडित किया गया । हांलाकि इस खबर के पीछे की असली तथ्य कुछ और ही कहानी बयान कर रहे है जिसके अनुसार ये तस्वीर 2 अप्रैल शाम क़रीब साढ़े आठ बजे सीधी कोतवाली की है तस्वीर में दिख रहे आठ अर्धनग्न लोगों में से सिर्फ दो स्थानीय पत्रकार हैं और बाकी लोग रंगमंच से जुड़े हुए नाट्यकर्मी हैं। जिन पर आरोप है कि ये सभी एक स्थानीय रंगकर्मी की गिरफ़्तारी का विरोध कर रहे थे जिसके बाद पुलिस ने इन सभी को और इस घटना की कवरेज करने गये स्थानीय यूट्यूबर और उसके कैमरामेन को भी पकड़ कर उनके कपड़े उतरवाए और थाने में इनकी परेड निकाली। घटनाक्रम के बाद पीड़ित का कहना है कि तस्वीर में दिख रहे लोगों में हम दो पत्रकार हैं एक मैं और एक मेरा कैमरामैन बाकी सभी स्थानीय नाट्यकर्मी और आरटीआई एक्टिविस्ट हैं जो एक मामले में रंगकर्मी नीरज कुंदेर की गिरफ़्तारी का विरोध कर रहे थे पुलिस ने नीरज कुंदेर को फर्ज़ी फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल बनाकर स्थानीय विधायक केदारनाथ शुक्ला के ख़िलाफ़ अपमानजनक टिप्पणी करने के आरोप में गिरफ़्तार किया था नाट्यकर्मी इसी का विरोध कर रहे थे मैं अपने कैमरामैन के साथ कवरेज करने गया था कनिष्क का आरोप है कि वो स्थानीय बीजेपी विधायक केदारनाथ शुक्ला के विरोध में ख़बरें चलाते रहे हैं और उन्हीं के इशारे पर पुलिस ने नाट्यकर्मियों के साथ.साथ उन्हें भी हिरासत में लिया और उनके साथ मारपीट की और आगे से खबर चलाने पर अर्धनग्न अवस्था में ही नगर में जुलूस निकालने की धमकी दी। हालांकि पुलिस ने इस तरह के सभी आरोपों को ख़ारिज किया है और मामले में खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की नाराजगी के बाद दो पुलिस अधिकारियों को निलंबित कर मामले की जांच करने की बात कही है।
पूरे घटनाक्रम पर गंभीर सवाल यह है कि

क्या सोशल मीडिया के माध्यम से किसी राजनैतिक दल , राजनैतिक व्यक्ति,या व्यवस्था पर अपने विचार व्यक्त करना अपराध की श्रेंणी में आता है ? और यदि आता भी है तो उसके लिये संबधित व्यक्ति के खिलाफ इस प्रकार की कार्यवाही की जा सकती है ?

क्या इस प्रकार पुलिस थाने से किसी की अर्धनग्न तस्वीरों को समाज के सामने प्रदर्शित करना उसके मानवअधिकारों का उल्ल्घंन नहीं माना जायेगा?

क्या सत्ता या नेतओं या अधिकारियों के अहंकार को पुष्ट करने के लिये सोशल मीडिया के ही सही , तथाकथित ही सही पत्रकार या नागरिक के प्रति इस प्रकार का व्योवहार उचित है या वैध है ?

और यदि सरकार इसे अवैध की श्रेंणी में मानती है तो पहले वैध होने की गाईडलाइन या दिशानिर्देश तो तय करे।

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