सम्पादकीय

उत्तरप्रदेष (लखीमपुर खीरी ) : जनमानष का मुददा,सियासत की सीढी !

यूं तो कोरोना काल की दूसरी लहर के तांडव को देख चुके लोगो के लिये अब मौत की थोक खबर ज्यादा विचलित नहीं करती या हमारी संवेदना ने इसके प्रति प्रतिक्रिया देना कम कर दिया है लेकिन फिर भी तीन लक्जरी गाडियों को आंदोलन कर रहे पैदल बुजुर्ग किसान को रोदते हुए देखना हॉलीवुड फिल्मे देखने के आदि हो चले भारतीयों के लिए आज भी रूह को कंपा देने वाला है और वह भी जानबूझकर ऐंसा करना लखीमपुर में अंजाम दी जाने वाली इस घटना का हर नया वीडियो उस दर्द को बढा देने वाला होता है और आरोपियो की गिरफतारी न होना उस जख्म पर नमक छिड़कने के समान उत्तरप्रदेष में 3 अक्टूबर को हुए घटनाक्रम ने संपूर्ण देष को झकझोर कर रख दिया है लंबे समय बाद किसी घटना ने सीधा आम आदमी के अंर्तमन पर प्रहार किया है यही वजह है कि तमाम राजनैतिक दल सियासी नफा नुकसान मे सने होने के बाद भी अंदर कुछ विचलित से नजर आ रहे है, अपने माथे पर गोदी मीडिया का कलंक लिये घूम रहे टीवी चैनल बैखौफ होकर कथित आरोपी मंत्री और मंत्री पुत्र की गिरफतारी को लेकर सवाल पूंछ रहे है और देष का हर वर्ग बुद्धिजीवी हो , परिश्रमजीवी हो या आंदोलनजीवी आंख मूदकर इसे गलत मान रहा है ,खुद सत्ताधारी दल के सर्मथक भी या तो चुप है या अभी तक सियासतदारों की चुप्पी को लेकर हैरान हैं।
दुनिया भर में राजनैतिक उठा पटक और कब्जाई लोकतांत्रिक परंपरा को देखते हुए आने वाले ढाई वर्षो मे भारत देश मे होने वाला हर चुनाव बहुत महत्वपूर्ण होने वाला है जिसकी शुरूवात 5 महीनो बाद होने वाले विधानसभा चुनावो से होगी सबसे महत्वपूर्ण सियासी राज्य उत्तरप्रदेष पर सबकी नजर है हाल फिलहाल उत्तरप्रदेष की राजनीति में भाजपा महासचिव और अध्यक्ष के रूप में वर्तमान गृहमंत्री अमित शाह ने 2014 के आमचुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव में जो खम ठोका था उसको सियासी आनाकानी, कानाफूसी ,आरोप प्रत्यारोप के बाद भी अब तक कोई भी घटनाक्रम इस प्रकार नहीं हिला पाया है जैसे लखीमपुर खैरी ने किया है उत्तरप्रदेष में अपराध का अपना पुराना इतिहास रहा है और समय समय पर सत्ता ने इस पर लगाम भी लगाई है और उपयोग भी किया है मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार ने भी आमजनमानस में अपराध नियंत्रण के प्रति जो विश्वास जगाया है उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और यही कारण है कि देश भर का ध्यान खीचने वाले एसे कई आपराधिक प्रकरंण सामने आने पर भी कानून व्यवस्था और संविधान की छत्रछाया में जनता ने इसे अपराधिक पृवति की तरह ही देखा है जिसका संबध शासकीय न होकर मानवीय पृवति से अधिक रहा है।
लेकिन लखीमपुर में जो हुआ वह अविश्वसनीय के साथ साथ अतुल्नीय भी है क्या आप कल्पना भी कर सकते है कि अपने खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगो पर कोई पीछे से गाडी चलाकर कुचलता हुआ जा सकता है और तमाम प्रकार के सबूत और वायरल होते वीडियो के बाद भी वाहन मालिक से घटना के चार दिन बाद भी यह नहीं पूछा जाता कि क्या यह गाडी आपकी ही है ? आपकी है तो घटना के दिन वाहन चालक कौन था ? क्या वीडियो में दिख रहे शख्स आप हीं है ? क्या किसी षडयंत्र के तहत आपके वाहन को कोई और चला रहा था ? इन सब सवालो पर एक चुप्पी है जो सबको चुभती सी है तो इसे सत्ता का कौन सा रूप कहंेगे यह समझ से परे है और कोई कितने भी आरोप लगाये, इतिहास से गढे मुर्दे उखाडे , नैतिकता के नाम पर पक्षपात की दुहाई दे लेकिन विपक्ष और मीडिया ने इस सारे प्रकरंण में जो भूमिका निभाई है बस लोकतंत्र के जख्म पर एक वही मलहम है।
उत्तरप्रदेष के चुनावों में लगभग अचेत पड़ी कांग्रेस के लिये भी यह उतनी ही काम आवेगी। कई प्रकार के राजनैतिक आरोप – प्रत्यारोप के बीच भी बीते चार दिनो से सत्ता की चुप्पी से घुटन महसूस कर रही जनता को सत्ता के सामने प्रियंका गांधी को लड़ते हुए देखकर कुछ तो जरूर लगा कि तमाम राजनैतिक दल दूसरे ही दिन लखीमपुर जाने के लिये निकल पड़े और जाना भी चाहिए यह उनका भी नैतिक कर्तव्य है सिर्फ विरोधी या विपक्षी होने के नाते नहीं बल्कि कभी न कभी जनता के द्धारा, जनता के लिए चुने जाने वाले जनप्रतिनिधि होने के नाते चाहे समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव हो, बासापा के ब्रजेश मिश्रा हो या दबंगई से अपनी बात रखने वाले आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह हो , कृषि कानून बिल की समझ या इसके प्रत्यक्ष प्रभावो से अनजान जनता को पहली बार किसान नेता राकेश टिकैत में किसान नेता दिखा याकि इन सबसे बढकर उत्तरप्रदेष से सांसद भाजपा के वरूण गांधी हो जिन्होने घटना के पहले दिन से ही घटना के प्रति वो संवेदना दिखाई है जिसकी उम्मीद जनता शीर्ष नेताओं से कर रही थी इन सभी में जनता ने कहीं कहीं अपने सवालो का अक्श देखा है ।
राजनीति में कई प्रकार के मुददे होते है जो आमजनता की समझ से परे होते है और अपनी निजी जिंदगी मंे तनावपूर्ण दिनचर्या के बाद शायद एक आम आदमी उस पर अपना दिमाग नहीं खपाना चाहता बहस करना तो दूर की बात है लेकिन फिर भी कोई एंसा घटनाक्रम जो आम जनमानस को लगभग अवाक कर दे तो उसे साधारण आपराधिक घटनाक्रम नहीं कहा जा सकता और यदि घटना असाधारंण है तो उसका प्रभाव भी साधारण नही हो सकता तो उत्तरप्रदेष की राजनीति में लखीमपुर में हुआ किसान हत्याकांड पक्ष विपक्ष की सियासत से परे आमजनमानस के साथ जुड चुका है जो अब न तो सता पक्ष के सहारे है और न ही विपक्ष के यह घटनाक्रम आने वाले चुनावो मे उन सभी बड़े मुददो के साथ बराबरी के साथ खडा हुआ दिखाई देगा जो उत्तरप्रदेश में हमेषा से चुनावी मुददे रहें है अब यह राजनैतिक दलों को तय करना है वह इस मुददे के पक्ष में खड़े होते है या विपक्ष में क्याकि इस मुददे पर की जा रही लेट लतीफी किसी का भी करें लेकिन एक बड़ा नफा – नुकसान करने की ताकत रखती है।

 

संपादक 

भारतभवः 

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