संस्कृति

बाधाओं के दौर में रक्षाबंधन हुआ अहम

जिस तरह से असुरक्षा बढ़ी है पग पग पर बाधायें आ रही हैं उसको देखते हुए आज रक्षाबंधन का त्यौहार बहुत अहम हो गया है सबसे बड़ी बाधा तो सीमित परिवार की एक बेटा एक बेटी जिस घर में हैं वहां रक्षाबंधन घर में नहीं बाहर ही मनाया जाएगा इसलिए इस त्यौहार को केवल भाई बहन तक सीमित ना रखा जाए बल्कि विश्व बंधुत्व की भावना को देखते हुए विस्तार किया जाना जरूरी है दरअसल इस बार रक्षाबंधन विशेष शुभ मुहूर्त लेकर आ रहा है सौभाग्य शोभन और सर्वार्थ सिद्धि योग में 1930 के बाद 95 साल बाद इस बार रक्षाबंधन का त्यौहार आया है इस बार भद्रा का साया नहीं रहेगा केवल सुबह 9:08 से 10:45 तक राहुकाल रहेगा जिसमें राखी ना बांधे भारतीय संस्कृति में रक्षाबंधन का पर्व अर्थात पवित्र और भावनात्मक संबंधों का प्रतीक है यह विशेष रूप से भाई और बहन के रिश्ते को सुदृढ़ करने के लिए मनाया जाता है सोचो हम सब हजारों वर्षों से रक्षाबंधन का त्यौहार मना रहे हैं एक बार देव और दानव में युद्ध हुआ तब दानव हावी होते नजर आने लगे तब इंद्र की पत्नी इंद्राणी ने रेशम का धागा पति इंद्र मिली की कलाई पर बांधा वह श्रावण पूर्णिमा का ही दिन था और इंद्र को विजय महाभारत में भी रक्षाबंधन का उल्लेख मिलता है हम बहन से राखी साहस और संयम का बंधवा कर उसकी रक्षा करने का वचन देते हैं लेकिन आज बहनें निर्भय नहीं हैं वे निडर होकर घूम नहीं सकती वास्तव में रक्षाबंधन का त्योहार दृष्टि परिवर्तन का त्यौहार है जहां बहन द्वारा रखी हाथ पर बांधते ही भाई की दृष्टि बदल जाती है राखी केवल एक धागा नहीं यह तो शील और स्नेह का रक्षण करने वाला और जीवन में संयम का महत्व समझाने वाला पवित्र बंधन है आज के दिन भाई-बहन का मिलन अर्थात पराक्रम और प्रेम संयोग माना जाता है

भारतीय संस्कृति में हमेशा से स्त्री पूजन किया जाता है जहां स्त्री की पूजा की जाती है उनका मान  संभाला जाता है वहां देवता निवास करते हैं लेकिन आज समाज में एक तरफ जहां नारी के साथ अपमान की दुष्कर्म की घटनाएं बढ़ रही हैं वहीं दूसरी ओर नारी भी मर्यादाएं लांघ रही है जिससे परिवारों में कलह बढ़ रही है आज आवश्यकता है कि संबंधों की रक्षा की जाए और उसके लिए प्रेम का धागा बांधा जाए जिससे न केवल परिवार और समाज में शांति आएगी वरन आने वाली पीढ़ियां को भी हम संस्कार देकर जाएंगे जाहिर है वर्तमान दौर में स दीपावली होली जैसे त्योहारों से भी बढ़कर रक्षाबंधन का त्यौहार अहम हो गया है हर कोई असुरक्षित महसूस कर रहा है रक्षाबंधन के इस पावन पवित्र पावन पर हम ना केवल रक्षा सूत्र बांधे वरन अपने भाव और दृष्टि में भी परिवर्तन लाएं।

श्री देवदत्त दुबे  जी  ,वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनैतिक समीक्षक, मध्यप्रदेश  

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