व्यंग्य-बाण

चापलूसी पर चर्चा

चापलूसी: एक दिव्य गुण या आत्मसम्मान का पतन?

“*मेरे लहजे में ‘जी हुजूर’ न था,इसके अलावा साहब मेरा कोई कसूर न था।* अगर *पल भर को भी मैं बे-जमीर हो जाता,* *यकीन मानिए, कब का वज़ीर हो जाता।”*

जी हाँ साहब, बात हो रही है चाटुकारिता की। यह कोई आम कला नहीं, बल्कि एक दिव्य गुण है — न स्कूल में सिखाया जाता है, न किसी कोचिंग में। यह तो जन्मजात हुनर है, जो कुछ खास लोगों के खून में बहता है और ज़ुबान पर झलकता है। चाटुकार उस फूल की तरह होता है, जो हर मौसम में महकता है — फर्क बस इतना है कि इत्र की बोतल बदलती रहती है। आज का दौर ऐसा है कि नेता हो या अफसर, बॉस हो या बाबू — सबको एक अदद चापलूस चाहिए। जो बॉस की खाँसी में भी सुर-ताल ढूंढ कर कह दे, “क्या बात है सर! आपकी खाँसी में भी एक रिदम है!” चापलूस का काम है हकीकत को इस तरह लपेटना कि सामने वाला खुद को सच्चाई के आईने में देखता हुआ महसूस करे। और जब काम निकल जाए — तो वही चापलूस साइलेंट मोड में चला जाता है। यह समाज के हर कोने में फैला वो वायरस है, जो तारीफों की छींक से फैलता है। तो ज़रा सतर्क हो जाइए… क्या पता आपके आस-पास भी कोई “चमचा” घूम रहा हो! एक व्यंग्य कथा: चापलूसी का चरम एक कर्मचारी था जो कंपनी के ऑफिशियल कामों से बचता था, मगर बॉस को मक्खन लगाने में उस्ताद था। बॉस के बेटे की कॉलेज फीस जमा करना हो या बेटी की डांस कॉस्ट्यूम लानी हो, कार सर्विसिंग हो या प्रोजेक्ट बनाना — वह सब करता था। इसलिए जाहिर था कि वह बॉस का चहेता था और उसे समय पर सारी सुविधाएँ मिलती थीं। बाकी कर्मचारी, जो अपने दायित्व ईमानदारी से निभाते थे, फिर भी डाँट खाते थे। एक दिन खबर आई कि बॉस की मां का निधन हो गया। सारे कर्मचारी उदास मन से उनके घर पहुँच गए. लेकिन वह चापलूस नदारद था। सब सोच में पड़ गए — “ऐसे मौके पर ये कहाँ है?” बॉस की मां को जब श्मशान ले जाया गया तो वहाँ पहले से 10-12 शव कतार में थे। हर शव को जलने में लगभग 1 घंटा लग सकता था। अचानक, कतार में पड़ा दूसरा शव उठ बैठा! सब लोग डर के मारे भाग खड़े हुए… फिर पता चला — वो शव नहीं, वही चापलूस था! उसने बॉस से कहा: “सर, माफ़ी चाहता हूँ कि सुबह से नहीं आ पाया, लेकिन जब आपकी माता जी के निधन की खबर मिली, तो सबसे पहले यहाँ दौड़ आया। देखा कि तकनीकि खराबी से एक ही शवदाहगृह चल रहा है और काफी भीड़ भी है, तो मैंने सुबह 8 बजे से ही आपकी माताजी का नंबर लगा दिया और खुद शव बनकर यहाँ लेटा रहा… ताकि आपको इंतज़ार न करना पड़े!” सभी उसकी प्रतिबद्धता देखकर दंग रह गए। बॉस कभी उसे देख कर मुस्कराते और कभी बाकी कर्मचारियों को खा जाने वाली नज़र से घूरते… यह तो व्यंग्य हुआ।

‘ अब सवाल है कि क्या हर किसी को चापलूसी करनी चाहिये?… नहीं…चापलूसी, दरअसल, भय का प्रतीक है। जो अपने अस्तित्व को लेकर असुरक्षित होता है, वही दूसरों के सामने झुकता है, उनकी झूठी प्रशंसा करता है। लेकिन जिसने जीवन के सत्य को जान लिया हो, वह जानता है — “जो तुम्हारा है, वह बिना चापलूसी के भी मिलेगा। और जो नहीं है, वह लाख सिर झुका लो — नहीं मिलेगा।” चापलूसी से तात्कालिक लाभ भले मिल जाए, परन्तु इसका असर अस्थायी होता है। ऐसे लोग दूसरों की नज़र में अपना आत्मसम्मान खो देते हैं। बॉस भी आखिरकार समझ जाते हैं — कौन सच्चा है, और कौन नकली। निष्कर्ष: अगर कोई चापलूसी से भी सफलता पा ले, तो क्या वह सफलता उसकी अपनी होगी? नहीं! वह किसी और की कृपा पर टिकी होती है, और ऐसी सफलता हमेशा खतरे में रहती है। जो व्यक्ति अपने श्रम, ईमानदारी और आत्मबल से कुछ पाता है — वही निश्चिंत होता है। या तो तुम अपनी आत्मा की सच्चाई में खड़े रह सकते हो, या फिर दूसरों के अहंकार की सेवा करके खुद को खो सकते हो। चुनाव तुम्हारा है।

सोर्स – सोशल मीडिया पर प्राप्त सन्देश 

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