राजनीतिनामा

मध्यप्रदेश – अक्सर भूल होती है दिग्विजय को आंकने में

मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह एक ऐसा किरदार हैं जिनका आकलन करने में अक्सर उनके विरोधी भूल कर बैठते हैं. दिग्विजय सिंह ने एक बार फिर धर्मरक्षा यात्रा की घोषणा कर अपने विरोधियों को गफलत में डाल दिया है.
दिग्विजय सिंह मप्र की राजनीति का एक स्थाई किरदार हैं. कांग्रेस के साथ ही भाजपा भी उन्हे कभी नायक, कभी खलनायक और कभी अधिनायक के रुप में चिन्हित करती है और हर बार आकलन गलत हो जाता है. इस बार भी भाजपा और कांग्रेस दोनों दिग्विजय की ‘क्षिप्रा टू सरजू ‘ की पदयात्रा को लेकर पशोपेश में हैं.दिग्विजय सिंह ने ऐसे समय में अपनी पदयात्रा का शंखनाद किया है जब क्षिप्रा किनारे का महालोक और सरजू के तीर पर बना राम मंदिर अलग-अलग कारणों से सुर्खियैं में है. उज्जैन में मुख्यमंत्री डा मोहन यादव का जमीन घोटाला और अयोध्या में राममंदिर के चढावे की चोरी सबसे बडा मुद्दा है. कांग्रेस और विपक्ष इन्ही दो मुद्दों पर भाजपा को घेरना चाहता है.
दिग्वजिय सिंह अकेले ऐसे चने हैं जो भाजपा के भाड को फोडना चाहते हैं. वे अपने तरीके से भाजपा के लिए चुनौती और कांग्रेस के लिए नेतृत्व का मसला हल करन चाहते हैं.राजनीति में धार्मिक यात्रा करने वाले दिग्विजय पहले नेता नही है. उनसे पहले भाजपा के पितृ पुरुष लालकृष्ण आडवाणी तक रथयात्रा कर चुके हैं.
                                   आपको पता है कि धर्म की राजनीति पर भाजपा का एकाधिकार है, किंतु दिग्विजय सिंह जैसे कांग्रेसी नेता जब तब भाजपा के इस एकाधिकार को चुनौती दे उठते हैं. मुश्किल ये है कि भाजपा दिग्विजय की प्रस्तावित धर्म यात्रा को रोक भी तो नहीं सकती, जबकि ये यात्रा सीधे-सीधे मप्र और उत्तर प्रदेश की राजनीति को प्रभावित कर सकती है.अपनी धर्म यात्रा को दिग्विजय ने निजी यात्रा बताया है अर्थात इसमें पार्टी का डंडा- झंडा नहीं होगा. ये एक तरह से बचाव है जबकि दिग्विजय अपने आप में कांग्रेस का डंडा-झंडा खुद हैं. वे पक्के और सच्चे कांग्रेसी हैं भले ही तमाम कांग्रेसी दिग्विजय को भाजपा का स्लीपर सैल कहते हैं. कांग्रेस के ही तमाम नेताओं की नजर में दिग्विजय ने पार्टी का सत्यानाश किया है, लेकिन प्रमाणित कोई नहीं कर सका. उम्र के लिहाज से देखें तो दिग्विजय के लिए अब राजनीति का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि अब कांग्रेस हाईकमान उन्हे पार्टी की कमान सौंपने वाली नहीं है. दिग्विजय के सामने एक ही विकल्प है कि वे स्वर्गीय मोतीला वोरा की तरह चुपचाप पार्टी हाईकमान के ‘यस मैन ‘ बने रहें. पर खामोश रहना दिग्विजय की फितरत नहीं. वे आज की पीढी के नेतृत्व में पार्टी का झंडा उठाकर चलने को तैयार हैं. पार्टी चाहकर भी उन्हे उनके फैसलों से डिगा नहीं सकती.
                                    भाजपा को आज भी दिग्विजय सिंह का भूत परेशान करता है, कल भी करता था. दिग्विजय को खलनायक बनाकर ही भाजपा 2003 में मप्र की सत्ता में आई थी, लेकिन न थकने वाले दिग्विजय ने 2018 तक सत्ता में कांग्रेस की वापसी का इंतजार किया. इसका प्रतिफल भी उन्हे मिला. वे अपने बेटे को अपनी आंखों के सामने कैबिनेट मंत्री बनवाने में कामयाब रहे.भाजपा को लगता है कि जब तक प्रदेश में दिग्विजय सक्रिय हैं, भाजपा निशंक होकर राज नहीं कर सकती. दिग्विजय रंग में भंग करते ही रहेंगे.बहरहाल अब दो-ढाई महीने का इंतजार और है ये देखने के लिए कि दिग्विजय की ‘क्षिप्रा टू सरयू यात्रा’ कांग्रेस के लिए लाभदायक साबित होगी या फिर नुकसान पहुंचाएगी? उनकी यात्रा में कांग्रेसी शामिल होंगे भी या नहीं? # दिग्विजय सिंह यात्रा #bharatbhvh #madhypradesh news

@ राकेश अचल

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