भारतीय लोककला की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो केवल कलाकार नहीं, बल्कि एक परंपरा का पर्याय बन जाते हैं। पंडवानी गायन की महान साधिका तीजनबाई का जीवन भी ऐसा ही था। उनका निधन भारतीय लोक संस्कृति के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उन्होंने केवल छत्तीसगढ़ की लोककला को देश-दुनिया तक नहीं पहुँचाया, बल्कि यह भी साबित किया कि दृढ़ इच्छाशक्ति, प्रतिभा और संघर्ष किसी भी सामाजिक बंधन से बड़े होते हैं।छत्तीसगढ़ के एक साधारण परिवार में जन्मी तीजनबाई बचपन से ही महाभारत की कथाओं और लोकगाथाओं की ओर आकर्षित थीं। उस दौर में पंडवानी गायन मुख्यतः पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था। महिलाओं के लिए मंच पर खड़े होकर अभिनय के साथ महाभारत गाना सामाजिक मान्यताओं के विरुद्ध समझा जाता था।लेकिन तीजनबाई ने परंपरा को चुनौती दी। उन्होंने केवल बैठकर गाने वाली शैली तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि खड़े होकर अभिनय, संवाद और भाव-भंगिमाओं के साथ प्रस्तुति देने वाली कपालिक शैली को अपनाया। यही उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी।
तीजनबाई के जीवन का सबसे मार्मिक अध्याय उनका निजी संघर्ष था। कम उम्र में उनका विवाह हुआ, लेकिन पंडवानी गाने के उनके जुनून को परिवार ने स्वीकार नहीं किया। मंच पर जाकर सार्वजनिक प्रस्तुति देना उस समय सामाजिक रूप से अस्वीकार्य माना जाता था।कला के प्रति उनकी प्रतिबद्धता इतनी प्रबल थी कि उन्होंने समाज और पारिवारिक दबाव के सामने झुकने से इनकार कर दिया। परिणामस्वरूप उनका वैवाहिक संबंध टूट गया। उन्हें सामाजिक बहिष्कार तक झेलना पड़ा, लेकिन उन्होंने पंडवानी छोड़ने के बजाय उसी को अपना जीवन बना लिया।आज यही निर्णय भारतीय लोककला के इतिहास में उनकी सबसे बड़ी पहचान बन चुका है।
तीजनबाई की प्रतिभा को धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने लगी। उनकी आवाज़, अभिनय और महाभारत के पात्रों को जीवंत कर देने वाली शैली ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।उन्होंने भारत के साथ-साथ अनेक देशों में पंडवानी की प्रस्तुतियाँ दीं। दुनिया ने पहली बार महसूस किया कि भारतीय लोककला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि गहरी सांस्कृतिक और दार्शनिक परंपरा का जीवंत स्वरूप है।उनकी प्रस्तुतियों में भीम की वीरता, अर्जुन की दुविधा, द्रौपदी का स्वाभिमान और कृष्ण की नीति केवल शब्दों में नहीं, बल्कि अभिनय और स्वर में जीवित हो उठते थे।
तीजनबाई को उनके असाधारण योगदान के लिए अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए।
उनके प्रमुख सम्मानों में शामिल हैं—
इन पुरस्कारों ने केवल एक कलाकार का सम्मान नहीं किया, बल्कि भारतीय लोककलाओं के महत्व को भी राष्ट्रीय पहचान दिलाई।तीजनबाई ने केवल मंच पर प्रस्तुति देने तक स्वयं को सीमित नहीं रखा। उन्होंने अनेक युवा कलाकारों को प्रशिक्षण दिया और पंडवानी की परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का निरंतर प्रयास किया।उनकी वजह से आज पंडवानी केवल छत्तीसगढ़ की लोककला नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत का वैश्विक परिचय बन चुकी है।
तीजनबाई का निधन केवल एक महान लोक कलाकार की विदाई नहीं है, बल्कि भारतीय लोक संस्कृति के एक स्वर्णिम अध्याय का समापन भी है। फिर भी उनकी आवाज़, उनके अभिनय और महाभारत की अमर कथाओं को जीवंत करने की उनकी अनोखी शैली आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।उन्होंने यह सिद्ध किया कि सच्ची कला सामाजिक बंदिशों से बड़ी होती है। जिस पंडवानी की वजह से कभी उनका विवाह टूट गया था, उसी पंडवानी ने उन्हें विश्वभर में सम्मान दिलाया और पद्म विभूषण जैसे सर्वोच्च सम्मानों तक पहुँचाया।तीजनबाई अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन भारतीय लोककला के इतिहास में उनका नाम सदैव स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा। जब-जब पंडवानी की चर्चा होगी, तीजनबाई का स्वर, उनकी ऊर्जा और उनका संघर्ष भारतीय संस्कृति की अमर धरोहर के रूप में याद किया जाएगा।
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