विशेष - बात

व्यक्ति विशेष – गोपाल भार्गव – जनता का नेता

मध्यप्रदेश में बीते   लगभग ढाई दशकों से भाजपा सत्ता की सिरमौर रही है , गुजरात के बाद मध्यप्रदेश ही एक राज्य है जहाँ की जनता ने भाजपा पर लगातार विश्वास दिखाया है । 2003 की विधानसभा चुनावो में दिग्विजय सिंह की सरकार को सत्ता से बेदखल कर मुख्यमंत्री बनी उमा भारती  और उनके  बाद  लम्बे समय तक मध्यप्रदेश सरकार के मुखिया रहे शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश में विकाश की एक नई परिभाषा लिखी और मध्यप्रदेश से कई ऐसी जनहितैषी योजनाओ की उत्पत्ति हुई जो देश भर में रोल मॉडल बनी । मप्र के मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान कभी मंचों से अपने भाषण में कहते थे कि सरकार ने लोगों के कल्याण के लिए जन्म से लेकर मृत्यु तक अनेक योजनाएं चलाई हैं। शायद कम ही लोग जानते होंगे कि इन योजनाओं में से कई चुनिंदा योजनाओं का जनक कौन था ? खास तौर से मुख्यमंत्री कन्यादान योजना का। जी हां इस योजना का जनक कोई और नहीं शिवराज मंत्रिमंडल के सबसे वरिष्ठ सदस्य गोपाल भार्गव थे। सबसे पहला सामूहिक कन्यादान विवाह समारोह गढ़ाकोटा में सन् 2002 में हुआ था। तब सरकार कांग्रेस की थी। गोपाल भार्गव विपक्ष के विधायक थे। निजी प्रयासों से उन्होंने 11 गरीब बेटियों का विवाह एक ही मंडप में कराया था। बाद में जब भाजपा की सरकार बनी तो उन्होंने इसे सरकारी बनाने का प्रस्ताव दिया और योजना प्रदेश भर में लागू हो गई। और आप जानते होंगे कि तब से अब तक वे 23 कन्यादान विवाह समारोह करवा कर हजारों बेटियों के धर्म पिता बनने का रिकॉर्ड कायम कर चुके हैं।
                     इसी तरह विधायक भार्गव के घर के बाहर एक वाहन हमेशा तैयार खड़ा रहता है। इसे अस्थि कलश रथ के नाम से जाना जाता है। रहली क्षेत्र के किसी नागरिक की मृत्यु के बाद परिवार जन अस्थि विसर्जन के लिए जाना चाहते हैं तो यह रथ उनके लिए नर्मदा तट पर पहुंचा कर विसर्जन करवा कर लौटता है। यह सेवा भी सालों से जारी है।जब वे मंत्री थे तो भोपाल स्थित उनके बंगले का आधा हिस्सा रहली क्षेत्र से इलाज के लिए भोपाल पहुंचने वाले लोगों से भरा रहता था। ऐसे जरुरत मंदों को भोपाल के अस्पतालों में इलाज कराए जाने के बाद लौटने तक का इंतजाम रहता था। सेवा के ऐसे कई प्रकल्प उन्होंने निजी और सरकारी स्तर पर चलाए और वो आज भी जारी हैं। अगर मैं सभी का जिक्र यहां करुंगा तो बात बहुत लंबी हो जाएगी। बहरहाल ये चर्चा उनके व्यक्तित्व, विजन और कार्य व्यवहार को दर्शाने के लिए बानगी मात्र है।
                इन तीन उदाहरण का आशय यही है कि भार्गव लोगों के जीवन से लेकर मृत्यु तक बहुत पहले से मददगार बने हैं। शायद यही वजह है कि वे कभी चुनाव नहीं हारे।1 जुलाई को उनका जन्म दिवस है। अपने जीवन की हीरक जयंती (75 वर्ष)और राजनीति की स्वर्ण जयंती (50 वर्ष) के करीब जा रहे गोपाल भार्गव की राजनीतिक प्रोफाइल इतनी बड़ी और भारी हो चुकी है जो शायद ही किसी दूसरे राजनेता के खाते में आए। 40 साल से विधायक, 20 साल मंत्री और डेढ़ साल नेता प्रतिपक्ष रह चुके भार्गव आज भी युवा नेताओं से अधिक सक्रिय हैं। वे सुनार में गोते लगा रहे हैं तो स्वीमिंग पूल में तैर भी रहे हैं। कभी अखाड़े में उतर जाते हैं तो जिम में कसरत करते नजर आते हैं।उनके बारे में बहुत कुछ कहा और लिखा जा सकता है। यहां मेरी सीमाएं हैं। उसके लिए मैं अलग अवसर तलाश करुंगा। फिलहाल संक्षिप्त में उनकी राजनीतिक यात्रा का जिक्र करुंगा। गढ़ाकोटा नगर पालिका अध्यक्ष पद से शुरुआत करने वाले गोपाल भार्गव पहला विधानसभा चुनाव 1984/85 में तब भाजपा के टिकट पर जीते थे जब इंदिरा गांधी जी की हत्या के बाद देश में कांग्रेस की लहर चल रही थी। उसके बाद भार्गव ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। विपक्ष के मुखर विधायक के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले भार्गव उस वक्त देश भर में चर्चा में आ गए जब कौमार्य परीक्षण को लेकर विधानसभा में एक टिप्पणी कर दी। वाकपटुता और संसदीय चर्चा में हर कोई उनका लोहा मानने लगा। उनके तीखे सवालों और कटाक्षों से तब के मंत्री घबराते थे। 2003 में जब राज्य में उमा जी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी तो भार्गव के लिए कृषि और सहकारिता का कैबिनेट मंत्री बनाया गया। तब से लेकर बीते सत्र 2023 तक विभिन्न विभागों में लगातार मंत्री और कांग्रेस की कमलनाथ सरकार के समय करीब डेढ़ साल नेता प्रतिपक्ष रहे। अभी वे 9वीं बार रहली से विधायक हैं। हैरानी की बात है कि भाजपा अब इतनी बड़ी पार्टी हो चुकी है कि उनके जैसे नेता के पास फिलहाल कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं है। उनके अनुभवों का लाभ भी पार्टी नहीं ले पा रही। खैर ये उनके और पार्टी के बीच का मामला है। इस पर ज्यादा कुछ कहना उचित नहीं है। भगवान गणेश जी के उपासक गोपाल भार्गव की राजनीति के अलावा आध्यात्म में भी गहरी रुचि और समझ है। हाल ही में उन्होंने प्राचीन गणेश मंदिर में अष्ट विनायक की स्थापना कराई है। गढ़ाकोटा के संस्कृत विद्यालय का आधुनिकीकरण वे पहले ही करवा चुके हैं।सिनेमा मे भी उनकी रुचि रही है। गढ़ाकोटा की गणेश टाकीज की स्थापना के साथ उसका परिसर ही उनकी तमाम गतिविधियों का गवाह भी है।
जन्म दिवस की अनंत शुभकामनाएं।
प्रवीण पाण्डेय
लेखक मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनैतिक विश्लेषक हैं ।

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