दिसंबर 1956 में जब रविशंकर शुक्ल का निधन हुआ तब मध्य प्रदेश को संभालने के लिए कई दावेदार सामने आने लगे द्वारका प्रसाद मिश्र उन दिनों जवाहरलाल नेहरू का विरोध करने के कारण कांग्रेस से बाहर थे रविशंकर शुक्ल की मृत्यु के 1 दिन बाद ही 1 जनवरी को इंदौर में कांग्रेस महासमिति का अधिवेशन होना था जिसे 1 दिन आगे बढ़ाया गया कार्यवाहक मुख्यमंत्री के रूप में मंत्रिमंडल के वरिष्ठ सदस्य भगवंतराव मंडलोई को शपथ दिलाई गई।तखतमल जैन को यह ठीक नहीं लगा तख्तमल जैन विलय पूर्व मध्य भारत के प्रधानमंत्री तथा बाद में मुख्यमंत्री बने थे और स्वयं को रविशंकर शुक्ल का उत्तराधिकारी मानते थे . मुख्यमंत्री के विधिवत चयन के लिए तख्तमल जैन और भगवंतराव मंडलोई दोनों के पक्ष में पहल पैरवी भी हुई।
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मध्य प्रदेश के कांग्रेस नेताओं में असमंजस था मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री पद के लिए आंतरिक घमासान हो चुका था और नेहरु यहां के संकट से कुछ खाते ही चिंतित थे केंद्र में उनके साथ उनके सहयोगी डॉ कैलाश नाथ काटजू मंत्री थे नेहरू को लगा कि यही सही समय है जब काटजू को मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री बनाकर भेजा जा सकता है शायद नेहरू उन्हें मध्यप्रदेश में व्यस्त रखकर वीके कृष्ण मैनन को रक्षा मंत्री बनाना चाहते थे डॉक्टर काटजू मोतीलाल नेहरू के साथ वकालत सहायक रह चुके थे तथा उनकी स्थिति जवाहरलाल के ऊपर थी जवाहरलाल के साथ प्रसिद्ध आई एन ए लालकिला ट्रायल में भी काला कोट पहनकर वकालत में साथ थे । कद्दावर होने के साथ-साथ नेहरू को भाई कहकर बुलाने वाले कम ही लोगों में से एक थे काटजू नेहरू से 2 साल बड़े थे कश्मीरी पंडित होने के बावजूद डॉ कैलाश नाथ काटजू का जन्म स्थान जावरा जिला रतलाम है हालांकि उनकी कर्मभूमि इलाहाबाद रही जहां उनकी गणना सफल वकीलों में होती थी । सन 1952 में वे मंदसौर संसदीय क्षेत्र से लोकसभा के सदस्य चुने गए। इसके पहले काटजू को आजादी के बाद उत्तर प्रदेश से संविधान सभा में जगह ना मिलने के कारण सीताराम जाजू को मंदसौर से इस्तीफा दिलाकर उनकी जगह भेजा गया था जावरा रियासत में काटजू के पिता दीवान थे।
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