इन सब घटनाओं के बावजूद दिग्विजय सिंह को चुनाव जीतने का पूरा भरोसा था वह कहते थे कि चुनाव मैनेजमेंट से जीते जाते हैं। मैनेजमेंट के फंडे के चलते कांग्रेसी सरकार ने पिछड़े वर्गों के लिए नौकरियों में आरक्षण की घोषणा कर दी चुनाव के ठीक पहले किसानों के बिजली का बिल माफ करने का सरकार ने निर्णय किया लेकिन निष्पक्ष चुनाव कराने की गरज से तत्कालीन चुनाव आयोग जेम्स माइकल लिंगदोह ने उसे आचार संहिता के नाम पर निरस्त कर दिया हालांकि जब यह घोषणा हुई थी तब आचार संहिता नहीं लगी।
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इसके पहले साल के आरंभ में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रवाद के मुद्दे से निपटने के लिए दिग्विजय सिंह ने ‘झंडा ऊंचा रहे’ अभियान की शुरुआत की यह अभियान विवेकानंद की जयंती 12 जनवरी से लेकर महात्मा गांधी के शहीदी दिवस 30 जनवरी तक चलाया गया। इसके अलावा उन्होंने अप्रैल 2003 में प्रभाष जोशी द्वारा लिखित एक पुस्तक विधायकों में बटवाई । इस पुस्तक में जहां हिंदुत्व को लेकर दक्षिणपंथी पार्टियों को खरी-खोटी सुनाई गई थी वहीं आर एस एस की तीखी आलोचना भी थी। लेकिन पुस्तक को लेकर दिग्विजय खुद विवादों में फंस गए पुस्तक में कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे को भी उठाया गया था। बाबूलाल गौर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष थे , उन्होंने दिग्विजय से पत्र लिखकर पूंछा की लेखक के हिंदुत्व के विचारों के अलावा क्या वे सोनिया गांधी पर कही गई बातों से भी सहमत है ? यह पुस्तक विवाद कई दिनों तक विधानसभा में भी छाया रहा खोजबीन हुई तब पता चला कि यह पुस्तक संस्कृति विभाग के अधिकारी श्री राम तिवारी की सलाह पर बटवाई गई थी दिग्विजय ने इस मामले में तिवारी पर कोई कार्यवाही नहीं की बल्कि पूरे विवाद को अपने सर ले लिया।
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