सम्पादकीय

इंग्लिश वो बला – जो जरूरी भी है और नहीं भी !

बीते दिनो देश के दो बड़े नेताओ ने अंग्रेजी भाषा के पक्ष और विरोध में जो बयान दिये वे सुर्खियां बने हुए है लेकिन इन दोनो ही बयानो पर पहली ही नजर मे एक राय बना लेना अनुचित ही लगता है । भारत एक बहुभाषी देश हैए जहाँ भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं बल्कि सांस्कृतिक पहचान सामाजिक पहुंचए और शिक्षा एवं रोजगार के अवसरों का आधार भी बन चुकी है। हाल ही में इस मुद्दे पर देश के दो बड़े नेताओं केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और कांग्रेस नेता राहुल गांधी  के बीच तीखी बयानबाज़ी सामने आई जिसने अंग्रजी  बनाम भारतीय भाषा की बहस को एक नई धार दे दी। अमित शाह द्धारा दिये गये बयान के पीछे सीधा तर्क यह है कि भारतीय भाषाएं हमारी असली पहचान है।
उन्होने कहा कि – विश्व में में अंग्रेज़ी बोलने वाले लोग शर्मिंदा होंगे। भारतीय भाषाएं ही हमारी असली पहचान हैं। हमें भाषा की गुलामी से निकलना होगा। इसके पीछे उनका मूल तर्क है कि अंग्रेज़ी भाषा का अत्यधिक प्रभाव औपनिवेशिक मानसिकता का प्रतीक है।भारतीय भाषाओं को सशक्त बनाने की जरूरत है खासकर शिक्षा और प्रशासन में। मातृभाषा में शिक्षा से विद्यार्थियों की समझ और सोचने की क्षमता बेहतर होती है।भाषा के कारण पैदा हो रही सामाजिक असमानता को समाप्त करना आवश्यक है। और यकीन मानिये जब आप ग्रामीण क्षेत्रो या कि कस्बाई इलाको में होते है तो यह बात सौ प्रतिशत सच साबित होती है जहां भाषाई ज्ञान सामाजिक असमानता को जन्म देती है इसलिये गृहमंत्री शाह का बयान राष्ट्रीय दृष्टिकोण से सकारात्मक दिखाई देता है लेकिन जब आप इसी बयान को व्यापक दृष्टिकोण से देखते है तो अंग्रेज़ी को शर्मिंदगी से जोड़ना उदारवाद और वैश्विकता के खिलाफ माना जा सकता है। इससे अंतरराष्ट्रीय शिक्षा और रोजगार की संभावनाओं पर भी प्रभाव पड़ सकता है।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी का भी यही तर्क होना चाहिये था उन्होने अपने बयान में भी यही कहा लेकिन उन्होने इसे राजनैतिक चश्में से देखा और सबसे पहली बात कही कि भाजपा और आरएसएस नहीं चाहते कि गरीब का बच्चा अंग्रेजी सीखे और बोले राहुल गांधी ने अमित शाह के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी उन्हाने कहा कि अंग्रेज़ी शर्म नहीं बल्कि शक्ति है  यह जंजीरें तोड़ने का औजार है। वर्तमान परिवेश में राहुल गांधी की बात तथ्य आधारित भी है आज के दौर में अंग्रेज़ी भाषा वैश्विक अवसरों उच्च शिक्षा और डिजिटल दुनिया का प्रवेश द्वार है।गरीब और ग्रामीण वर्ग के बच्चों को अंग्रेज़ी से वंचित रखना एक प्रकार की भाषाई असमानता तो है ही उनके भविष्य के साथ अन्याय भी है ।अंग्रेज़ी ने कई सामाजिक बाधाओं को तोड़ा है और भारत के युवाओं को अंतरराष्ट्रीय मंच पर लाया है। लेकिन केवल अंग्रेज़ी पर निर्भरता स्थानीय भाषाओं के पतन का कारण बन सकती है। इससे भारतीय सांस्कृतिक विविधता को नुकसान पहुँच सकता है। दरअसल दोनो नेताओ ने अंग्रेजी का खुला पक्ष लिया या कि विरोध किया जबकि यह बहस केवल भाषा की नहीं बल्कि विचारधारा, शिक्षा ,नीतिऔर सामाजिक समावेश की बहस है।अमित शाह का ज़ोर भारतीय भाषाओं की सांस्कृतिक रक्षा और आत्मनिर्भरता पर है।राहुल गांधी का ज़ोर वंचित वर्गों को अवसर प्रदान करने और अंग्रेज़ी को एक टूल ऑफ एम्पावरमेंट मानने पर है।जबकि भाषा का मुद्दा सिर्फ संवाद का नहीं बल्कि समानता और आत्मसम्मान का है।अमित शाह और राहुल गांधी दोनों के विचार अलग हैं लेकिन उद्देश्य एक ही हो सकता है हर भारतीय को उसकी भाषा में अधिकार सम्मान और अवसर मिले ज़रूरत है कि भाषा को राजनीति का औजार नहीं समाज को जोड़ने का माध्यम बनाया जाए।

अभिषेक तिवारी

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