डिजिटल लेन-देन की सुविधा कहीं आम आदमी के लिए आर्थिक मुसीबत तो नहीं बनती जा रही? साइबर ठगी और डिजिटल अरेस्ट के बढ़ते मामलों पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता ने एक बार फिर देश की डिजिटल सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।देश में डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए सरकार लगातार अभियान चला रही है। मोबाइल बैंकिंग, यूपीआई और ऑनलाइन भुगतान ने आम आदमी की जिंदगी को भले ही आसान बनाया हो, लेकिन इसके साथ साइबर अपराधियों का जाल भी तेजी से फैल रहा है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि पढ़े-लिखे और जागरूक लोग भी ठगों के निशाने से नहीं बच पा रहे हैं। सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश किए गए आंकड़े इस खतरे की भयावहता बयां करते हैं। इस साल अब तक डिजिटल अरेस्ट और साइबर ठगी के 22 हजार से अधिक मामले दर्ज किए जा चुके हैं, जिनमें करीब 800 करोड़ रुपये की ठगी हुई है। वहीं पिछले साल 58 हजार से ज्यादा मामलों में लोगों को 1,211 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा था।
डिजिटल अरेस्ट और साइबर ठगी के बढ़ते मामलों पर गुरुवार को सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई। अदालत ने सवाल उठाया कि लगातार जागरूकता अभियान चलाए जाने और मीडिया में खबरें आने के बावजूद शिक्षित लोग भी साइबर अपराधियों के जाल में कैसे फंस रहे हैं? अदालत का मानना था कि ठगी होने के बाद जांच और रिपोर्ट तैयार करना ही पर्याप्त नहीं है। जरूरत इस बात की है कि ऐसी घटनाओं को होने से पहले रोका जाए।सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने एक महत्वपूर्ण सुझाव देते हुए कहा कि यदि बैंक की लापरवाही के कारण किसी व्यक्ति के साथ साइबर ठगी होती है तो बैंक को पीड़ित को मुआवजा देना चाहिए। जिम्मेदारी तय होने पर संबंधित संस्थान को कार्रवाई का सामना भी करना चाहिए।सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब किसी बैंक खाते में अचानक असामान्य लेन-देन होता है तो बैंक उसे सत्यापन के लिए अस्थायी रूप से रोक क्यों नहीं सकते? अदालत ने संदिग्ध लेन-देन की जांच करने और इसकी सूचना स्थानीय पुलिस को देने की व्यवस्था पर भी जोर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक से सभी अधिकृत वित्तीय संस्थानों की सूची मांगी है। साथ ही प्रस्तावित KYC संशोधन निर्देश, 2026 की समीक्षा करने को कहा है।अदालत ने यह भी संकेत दिया कि प्रस्तावित नियमों में उन परिस्थितियों में पीड़ितों को मुआवजा देने का प्रावधान होना चाहिए, जहां बैंक या वित्तीय संस्थान आवश्यक सावधानियां बरतने में विफल रहते हैं।सुनवाई के दौरान अदालत की सहायता कर रहीं एमिकस क्यूरी और वरिष्ठ अधिवक्ता एनएस नप्पिनई ने बताया कि डिजिटल अरेस्ट के मामलों में अपराधी लोगों को गिरफ्तारी का डर दिखाकर मानसिक दबाव में ले आते हैं। भयभीत व्यक्ति अपराधियों के निर्देशों का पालन करते हुए अपनी जीवनभर की कमाई गंवा बैठता है।इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि देश में डिजिटल क्रांति तो तेजी से आगे बढ़ रही है, लेकिन डिजिटल सुरक्षा की व्यवस्था उसी गति से मजबूत होती दिखाई नहीं दे रही।सरकार चाहती है कि हर व्यक्ति नकदी के बजाय डिजिटल भुगतान अपनाए। लेकिन सवाल यह है कि जब कोई नागरिक अपनी मेहनत की कमाई मोबाइल के एक क्लिक से गंवा देता है, तब उसकी आर्थिक सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है?
https://www.youtube.com/c/BharatbhvhTV?sub_confirmation=1
⇑ वीडियो समाचारों से जुड़ने के लिए कृपया हमारे चैनल को सबस्क्राईब करें , धन्यवाद ।
नई दिल्ली। भारतभवः देश के प्रमुख औद्योगिक समूह टाटा को लेकर अब सियासत तेज हो…
शिवपुरी/करैरा। मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के करैरा में चल रही पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री…
भोपाल। बंगाल की खाड़ी में उठे चक्रवाती तूफान ‘अर्नब’ को लेकर मौसम विभाग की चेतावनी…
हर्ष यादव के नेतृत्व में राज्यपाल के नाम सौंपा ज्ञापन खाद, बिजली और सिंचाई के…
सागर। 27अक्टूबर 2026 इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) की 68वीं मध्य प्रदेश स्टेट कॉन्फ्रेंस IMA MPCON…
बंडा शराब कांड के बाद प्रशासनिक बदलावों की चर्चा के बीच दिलीप कुमार यादव होंगे…