हाल ही में श्रीलंका बांग्लादेश और नेपाल जैसे पड़ोसी देशों में जनता के उग्र विरोध के चलते सरकारें गिरती नजर आई हैं। श्रीलंका में आर्थिक मंदी और व्यापक भ्रष्टाचार के खिलाफ व्यापक प्रदर्शन ने सरकार को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया। वहीं बांग्लादेश और नेपाल में भी बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन और तखतापलट ने शासन व्यवस्था को चौंका दिया है और जिस प्रकार लोकतांत्रिक तानेबाने को ध्वस्त किया गया वह हैरान करने वाला है ऐसे हालात सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा का विषय बन गए हैं और हैरानी है कि कई लोग इस पर टिप्पणी करते हुए भारत में भी इसी प्रकार के आंदोलन के संभावित खतरे को लेकर मोदी सरकार को चेतावनी दे रहे हैं। लेकिन क्या भारत में यह संभव है क्या इस बात की कभी कल्पना भी की जा सकती है कि आधे देश की गुस्साई भीड़ लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को उखाड़ फकेगी शायद नही फिर भी सोशल मीडिया पर कुछ विचारधारायें पड़ोसी देशों के हवाले से मोदी सरकार को खुली चेतावनी दे रही है जो हास्यास्पद ही है ।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है जहाँ चुनाव संवैधानिक संस्थाएं ,न्यायपालिका और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की मजबूती जनता के अधिकारों की रक्षा करती है। भारत में हर पांच साल में सत्ताधारी सरकार बदलने की व्यवस्था है। जनता अपने मत के जरिए सरकार को चुनती और बदलती है और दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण हमारा इतिहास रहा है । विरोध का स्वर लोकतांत्रिक अधिकार है और इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ही व्यक्त किया जाता है सरकार चाहे कांग्रेस की रही हो या भाजपा की विरोध प्रदर्शनों ने कभी भी अपनी लोकतांत्रिक मर्यादा का उल्लंघन न पहले किया था और न ही वर्तमान में किया जा रहा है ।भारत का संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता , विरोध प्रदर्शन की अनुमति और न्यायालयीन उपाय उपलब्ध कराता है हिंसा की बजाय न्यायिक रास्ता अपनाने की प्रेरणा दी जाती है।स्वतंत्र न्यायपालिका और सक्रिय मीडिया भ्रष्टाचार और गलत नीतियों पर रोक लगाने में प्रभावी भूमिका निभाते रहे हैं और आज गोदी मीडिया जैसे शब्दों की उत्पत्ति के बाद भी सरकार की आलोचना करने वालों की कोई कमी नहीं है । श्रीलंका, नेपाल ,बांग्लादेश जैसी सीमित संसाधनों और राजनीतिक अस्थिरता वाले देशों में अचानक आर्थिक या राजनीतिक संकट के कारण विद्रोह की चिंगारी भड़की इसके अतिरिक्त ये देश बड़े देशों के प्रभुत्व की राजनीति का शिकार भी बने ये हालात सुपरपावर कहलाने वाले देशों की देन है जो छोटे देशों के संशाधनो पर कठपुतली सरकार के माध्यम से अपना कब्जा चाहते है पिछले कुछ सालों से भारत में भी कई बड़े आंदोलनो के माध्यम से यह कोशिशें हुई है लेकिन परिपक्व जनता ने इसे अराजकता में नहीं बदलने दिया भारत में यह संभव नहीं है । आज का भारत अपनी राष्ट्रीय और अंर्तराष्ट्रीय नीतियों में नेशन फर्स्ट को सबसे आगे रखता है हाल ही में अमेरिका के टैरिफ वार से यह सिद्ध भी हुआ है कि भारत अब किसी भी प्रकार के अंर्तराष्ट्रीय दबाब से कैसे निपटता है ।
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