समाज

समीक्षा और शुभेच्छा का संधिकाल

नया साल भी दूसरे तीज -त्यौहरों की ही तरह बाजार की मुठ्ठी में है। नया साल जश्न से ज्यादा गये साल की सफलताओं, असफलताओं की समीक्षा और नये साल के लक्ष्यों और उनकी पूर्ति की शुभेच्छाओं का संधिकाल है।जो अंक गणना के साथ शुरू होता है। जब तक मनुष्य ने समय को गणित के हिसाब से महीने, पखवाड़े, सप्ताह,दिन,पहर और पर,क्षण में विभक्त नहीं किया था तब तक न कुछ नया था और न पुराना।आगत,विगत तो मनुष्य के विकास और चिंतन की अवधारणा है। तकलीफ़ ये है कि इस अवधारणा में भी तेजी से बदलाव हो रहा है। इक्कीसवीं सदी में तो ये परिवर्तन इतनी तेज गति से हो रहा है कि इससे तालमेल बैठाना भी असंभव सा लगने लगा है। विज्ञान के विकास के साथ जिस रफ्तार से तकनीक चल रही है,उस गति से मनुष्य नहीं चल पा रहा है। मनुष्य की लड़खड़ाहट साफ दिखाई दे रही है किन्तु हम आंखें बंद कर तूफान के गुजरने का इंतजार कर रहे हैं।हम शतुरमुर्ग हो रहे हैं। नववर्ष से ठीक पहले हम ब्लैक फ्राइडे, बड़ा दिन यानि क्रिसमस के जश्न देख चुके हैं। नववर्ष भी हमारे खलीतै की ओर ताक रहाा है। नये वर्ष के जश्न अर्थशास्त्र से संचालित होते हैं।दुख, तकलीफ,तनाव, घृणा, अवसाद से घिरी मनुष्यता पर भर के सूकून की कोई भी कीमत देने को तैयार हैं। बाजार इनसान की इस विवशता को पहचान चुका है। बाजार उजाले की, उमंग की, कीमत वसूल करना जानता है।

कृपया यह भी पढ़ें –

अब खुशी रंग-बिरंगी रोशनी में है, कानफाड़ू संगीत में,शराब की बोतल में और किराए की स्त्री में तलाशी जा रही है। शुभेच्छाएं मंहगे तोहफों में लिपटी हुई हैं। मुझे हैरानी होती है जब भारत की चौथी पीढ़ी के समर्थ लोग जब नये साल की अगवानी करने अपने घर से नहीं अपितु अपने देश से दूर उन ठिकानों पर जा रहे हैं जहां सिर्फ़ जिस्म की नुमाइश लगती है। कोई प्रकृति के साथ, परिवार के साथ नववर्ष को आते नहीं देखना चाहता।वे बदनसीब है जो अपने घर की छत या फ्लैट की बालकनी में खड़े होकर नववर्ष की अगवानी को विवश हैं। मै अपने जीवन में पहली बार अमेरिका में बसे अपने बच्चों के साथ नववर्ष को आते हुए निहारुंगा। यहां आसमान दुर्दिन का है, अर्थात बादल छाए हुए हैं, छुटपुट पानी भी बरस रहा है। तापमान हमारे मूल्यों की तरह ठंडा है।पारा आदमी की तरह गिर और बढ़ रहा है। लेकिन मुझे न सूरज में कुछ नवीनता नजर आ रही है और न चंद्रमा में कोई अतिरिक्त चमक दिखाई दे रही है। ये दृष्टिदोष भी हो सकता है और हकीकत भी। लेकिन मुझे पता है कि 2022 क्या देकर और क्या छीनकर जा रहा है? नये वर्ष 2023 के आने और पुराने के जाने से बहुत कुछ बदलने वाला नहीं है। बदलाव आ सकता है तब, जब हम अपने आप को बदलें। धरती के लिए, हवा के लिए, आसमान के लिए,पशु, पक्षियों के लिए हमारा बदलना जरूरी है।हम ही इन सबके प्रथम शत्रु हैं। तो आइए मिलकर बदलें दुनिया की,देश की, प्रदेश की,शहर की और अपने आपकी तस्वीर। तदवीर हमारे पास है, तकदीर हमारे साथ है।अनन्य शुभेच्छाओं के साथ विनयावत!

व्यक्तिगत विचार-आलेख-

श्री राकेश अचल जी ,वरिष्ठ पत्रकार , मध्यप्रदेश  । 

https://www.youtube.com/c/BharatbhvhTV

वीडियो समाचारों से जुड़ने के लिए  कृपया हमारे चैनल को सबस्क्राईब करें और हमारे लघु प्रयास को अपना विराट सहयोग प्रदान करें , धन्यवाद।

Share this...
bharatbhvh

Recent Posts

पद्मश्री अखाड़ा गुरु भगवानदास रायकवार ‘दाऊ’ जी पंचतत्व में विलीन

एसडीएम द्वारा ने पुष्प चक्र अर्पित कर श्रद्धांजलि दी,  गार्ड ऑफ ऑनर प्रदान किया गया,…

29 mins ago

सुरखी मेरा परिवार, परिवार के हर सदस्य का विकास करना मेरा संकल्प- गोविंद सिंह

ग्राम सोठिया, बरौदासागर और हिन्नोद में मंत्री राजपूत ने किया 15 करोड़ के विकास कार्यों…

2 days ago

DTAB प्रस्ताव के खिलाफ एमपी फार्मासिस्ट एसोसिएशन का ज्ञापन

केंद्र सरकार से सिफारिश निरस्त करने और होलसेल दवा लाइसेंस में फार्मासिस्ट की अनिवार्यता की…

2 days ago

तीन दशक का इंतजार खत्म,अब 33% भागीदारी का रास्ता साफ –  सांसद वानखेड़े

 सागर संसद में सागर लोकसभा क्षेत्र की सांसद डॉ. लता वानखेड़े ने संविधान संशोधन विधेयक, संघराज्य क्षेत्र…

2 days ago

क्रॉस वोटिंग रोकने कांग्रेस की कोशिशें हुई तेज

जिस तरह से भाजपा खेमे से चर्चा चल पड़ी है कि वह प्रदेश की राज्यसभा…

3 days ago

महिलाओं को आरक्षण पर भाजपा कांग्रेस में ठनी

संसद में महिला आरक्षण बिल को सभी दलों का सर्मथन प्राप्त है फिर भी इसमें…

5 days ago