कलमदार

अभय जी भय की छाया से जूझते गये

श्री अभय छजलानी जी नहीं रहे। पत्रकारिता जगत के निर्भय युग का अवसान हुआ। अवसान तो उसी दिन हो गया था जिस दिन नयी दुनिया उनके हाथों से निकल गया था। बाकी की जिंदगी अभय जी ने भय के साये में काटी।जैसा कि मैंने कहा कि अभय जी एक निर्भय पत्रकार और अखबार मालिक थे।उनकी और अखबार की तूती बोलती थी। सरकार हो या सियासत सब नयी दुनिया और अभय जी की सुनते थे।आज दुर्भाग्य से इंदौर और मालवांचल में न कोई नयी दुनिया है और न कोई अभय छजलानी। इंदौर रीत गया है।अभय जी क्या थे और क्या होना चाहते थे ये किसी से छिपा नहीं। लेकिन अभय जी ने जितना यश,वैभव अर्जित किया उतना कम भी नहीं है। मप्र के किसी दूसरे पत्रकार और मालिक को ये हासिल नहीं हुआ।नयी दुनिया से वियोग न महेंद्र सेठिया सह पाए और न अभय छजलानी जी। मेरा उनका रिश्ता अनौपचारिक था। मै मामूली सा ऐसा पत्रकार हूं जिसके लिखे पर अभय जी ने अपना नाम चस्पा करने की इजाजत मुझे दी। इतना भरोसा कोई और शायद अपने मातहतों पर न करे।
आज की बिक्री हुई पत्रकारिता में अभय जी का न होना सालता है।वे कभी नहीं बिके, अलबत्ता उनका अखबार बिक गया। अखबार बिकने के बाद अभय जी भी नया अखबार निकाल सकते थे, लेकिन एक आहत आत्मा के लिए शायद ये संभव नहीं था।वे फिर से दूसरी नयी दुनिया कैसे बसाते? उनके पास समय ही नहीं था। आत्मविश्वास भी डिग गया था शायद उनका।मै अंतिम बार एक विवाह समारोह में उनसे मिला था।वे आत्मीयता से मिले लेकिन बुझे हुए नजर आए। उन्हें पद्मश्री सम्मान मिला लेकिन वे इससे ज्यादा के हकदार थे। उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा अपूर्ण रही औरों की भांति। बहरहाल मै अभय जी की विद्वता, उदारता, विनम्रता और स्नेह का हमेशा कायल रहने वाला हूं।अब अभय जी जैसे लोग पैदा ही नहीं होते। विनम्र श्रद्धांजलि

व्यक्तिगत विचार आलेख

श्री राकेश अचल जी  ,वरिष्ठ पत्रकार  एवं राजनैतिक विश्लेषक मध्यप्रदेश  ।

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