राजनीतिनामा

भारतीय राजनीति को लगे ग्रहण को पहचानिये

भारत में सोमवार को सूर्यग्रहण दिखाई नहीं दिया लेकिन सूर्यग्रहण था। यही हाल भारतीय राजनीति का है। भारतीय राजनीति को एक अदृश्य/दृश्य ग्रहण लगा हुआ है लेकिन न उसके सूतक का पता चला और न उसके विमोचित की कोई सूचना है। दरअसल ये ग्रहण है ही ऐसा कि जिसके बारे में कोई ज्योतिषी काल गणना कर ही नहीं सकता। इस अनूठे ग्रहण से भारतीय राजनीति को केवल जनता ही मुक्ति दिला सकती है ,बाशर्त की जनता जागे।मुझे राजनीति और नेताओं पर लिखते -लिखते अब अजीर्ण होने लगा है ,लेकिन मै लगातार इन दोनों पर लिख रहा हूँ ताकि भारतीय राजनीति पर लगा ग्रहण समाप्त हो सके। लेकिन ये कोशिश ठीक वैसी ही है जैसे कोई कांजी की एक बूँद से समुद्र का जल दोफाड़ करना चाहे। किन्तु कोशिश तो कोशिश है , की जाती है। हमारे गुरुजन तो कहते थे कि-‘ हवा में अपनी तर्जनी घुमाना भी एक तरह का हस्तक्षेप है ‘। जनता को भी ये हस्तक्षेप करना चाहिए,क्योंकि अब समय आ चुका है हस्तक्षेप करने का। अब भारत की राजनीति बेपटरी हो चुकी है। भारत की राजनीति और राजनेता उस सांड की तरह हैं जो लाल रंग का कपड़ा देखते ही भड़क उठते हैं।मुश्किल ये है कि आप इस ‘ ग्रहण लगी सियासत ‘ से अपने आपको बचा भी नहीं सकते। आपको इसमें लिप्त होना ही पड़ता है। चाहे भी और अनचाहे भी। यूपी जाइये तो वहां माफिया डॉन मुख्तार अंसारी की जेल में संदिग्ध मौत के बाद समाजवादी पार्टी मातमपुर्सी के लिए अपने सुप्रीमो को अंसारी के घर भेजती है। दिल्ली में भाजपा को शराब से शीश महल अभियान चलकर आप के सुप्रीमो का आभामंडल धूमिल करने का जतन करना पड़ता है। बिहार में पप्पू यादव और लालू यादव के परिवार के बीच जुबानी जंग शुरू हो जाती है। मप्र में टिनोपाल मंत्री रहे भाजपा के हारे नेता दावा करते हैं कि मप्र कांग्रेस के ढाई लाख कार्यकर्ता भाजपा में शामिल हो चुके हैं। हिमाचल में कांग्रेस को भाजपा की रानी लक्ष्मी बाई के खिलाफ मुहीम चलने के लिए उनके खानपान पर उँगली उठाना पड़ती है। लेकिन देश की जनता के असल मुद्दों पर कोई नहीं बोलना चाहता।
                                    राजनीति में चल रही ‘जगलरी’ को कोई रेखांकित करने के लिए राजी ही नहीं है ,क्योंकि ‘ सबहि नचावत गुजराती भाई’ । गुजरातियों के प्रति मेरे मन में कोई घृणा नहीं है ,क्योंकि आखिर गुजरात भी तो हमारे देश का ही अभिन्न अंग है। गुजरात के ही मोहनदास करमचंद गांधी ने आजादी की लड़ाई का नेतृत्व किया था। लेकिन दुर्भाग्य ये है कि आज देश गुजरात के गांधी मॉडल पर नहीं बल्कि गुजरात के मोदी-शाह मॉडल पर चल रहा है। ये मॉडल भी अस्पृश्य नहीं है। लेकिन दोषपूर्ण अवश्य है। इसी मॉडल की वजह से देश की राजनीति को ग्रहण लगा है। इस ग्रहण को आप न सूर्य ग्रहण कह सकते हैं और न चंद्र ग्रहण। ये ग्रहण ‘ लोटस ग्रहण ‘ है। कीचड़ से सना ‘ लोटस । लोटस यानि कमल ,यानि पंकज। इस ग्रहण ने न सिर्फ देश के सामाजिक ताने -बाने को तार-तार कर दिया है बल्कि देश की एक बड़ी आबादी को ‘रतौंधी ‘ का रोग भी लगा दिया
                              ‘ रतौंधी ‘ एक नेत्र व्याधि है। इसमें या तो सब कुछ धुंधला दिखाई देता है या फिर मरीज को सब कुछ भगवा रंग का दिखाई देने लगता है । ठीक वैसे ही जैसे ‘सावन के अंधे को हरा-हरा दिखाई देता है’ । देश की जनता इस मामले में बेकसूर है। जनता को एक दशक के लम्बे भ्रष्ट कांग्रेसी शासन से मुक्ति चाहिए थी। उसने बदलाव के लिए ,अच्छे दिनों के लिए भाजपा को नहीं बल्कि मोदी जी को वोट दिया और यही उसके साथ चोट हो गयी। मोदी जी ने जनता कि उदारता को ऐसे दुहा कि बस पूछिए मत !। जनता बेसब्री नहीं थी ,उसने पांच साल जुमलों के सहारे काटे और एक बार फिर पांच साल के लिए देश की कमान भाजपा कि मोदी -शाह जोड़ी को सौंप दी ,लेकिन जनता के साथ दोबारा से ठगी हो गयी। इन दस सालों में देश ज्यादा मजबूत हुआ या भाजपा ? देश बना या मंदिर ? आप सोच सकते हैं कि जब मंदिर बन गया तो मस्जिद क्यों नहीं बनी ? इसका विश्लेषण करने के लिए अब वक्त आ चुका है।भारतीय राजनीति को सचमुच भाजपा का ग्रहण लग चुका है। पहले ग्रहण कांग्रेस का लगा था । कुछ समय के लिए आंशिक ग्रहण गठबंधन की सरकारों का भी लगा था ,लेकिन सबसे मुक्ति मिल। सब ग्रहणों के विमोचन का एक वक्त मुकर्रर होता है। भाजपा का भी वक्त अब आ चुका है ,लेकिन जनता को इस वक्त का सही इस्तेमाल करना होगा। अन्यथा ज़रा सी गलती जनता पर भारी पड़ सकती है। जनता को देश की संसद में ‘ लाइव ‘ गालियां सुनना हो ,अगले पांच साल तक हर महीने पांच किलो फोकट की दाल-रोटी खाना हो ,या केवल रामधुन पर नाचना हो तो अलग बात है। ऐसे में मै या कोई दूसरा कुछ न कह सकता है और न कर सकता है। जो करना है वो जनता को ही करना है। हम वाचडॉग तो सिर्फ भौंक सकते हैं। जागो-जागो ,चिल्ला सकते हैं। जो ऐसा नहीं कर सकते वे पहले से किसी न किसी की गोदी में दुम दबाकर बैठे ही हैं।
ग्रहणकाल में भारत में दान-पुण्य करने की सनातन परम्परा है। इसलिए मै जनता से निवेदन करना चाहता हूँ कि वे भारतीय राजनीति पर लगे ग्रहण से मुक्ति पाना चाहते हैं तो जिस दिन भी आपके यहां चुनाव हो झूरकर मतदान करें। यही पुण्यकार्य है। इसी से मोक्ष की प्राप्ति होगी । अन्यथा जो दस साल से इस देश में हो रहा है वही सब आगे भी होता रहेगा। बिना परिवर्तन के बात बनने वाली नहीं है। लोकतंत्र की रोटी को जलने से बचाना है तो उसे बदलना भी होगा। लोकतंत्र की रोटी जली तो फिर आपके सामने तानाशाही का भात परोसा जायेगा । मर्जी है आपकी कि आप क्या खाना चाहते है। जली रोटी या तानाशाही का गर्मागर्म भात ?
राकेश अचल

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