राजनीतिनामा

राम को नहीं ‘झुठाराम’ को हराना चाहता है देश

इस लोकसभा चुनाव में जितना मजा आ रहा है उतना मजा मैंने पिछले एक दर्जन लोकसभा चुनावों में नहीं उठाया। पहले चुनाव में जोकरों,मुंगेरी लालों,और शेखचिल्लियों ,और तो और धरती पकड़ों के लिए सीमित स्थान था। अब चौतरफा इन्हीं की गूँज है ,धूम है। कौन ,किसे क्या ,समझता है ये बता पाना कठिन है ,लेकिन एक बात मै दावे के साथ कह सकता हूँ कि इस चुनाव में ‘ राम ‘ नहीं बल्कि ‘ झूठाराम ‘ निशाने पर हैं और देश की जनता [ जिसमें विपक्ष भी शामिल है ] झूठाराम को हराना चाहती है। राम का नाम लेकर झूठाराम अपने आपको बचने की कोशिश कर रहे हैं।चुनाव के छठवें चरण से ठीक पहले झूठाराम का आर्त्तनाद सुनाई दिया कि विपक्ष राम को चुनाव हराना चाहता है। सवाल ये है कि ये रामजी क्या सचमुच इस चुनाव में लोकसभा की 543 सीटों में से किसी एक पर ,किसी एक दल के या निर्दलीय प्रत्याशी हैं ? राम को हारने की एडवाइजरी पढ़ी तो मै पूरे दो दिन केंद्रीय चुनाव आयोग की वेबसाइट पर राम को तलाशता रहा । मुझे एक भी सीट पर दशरथ नंदन राम की और से दाखिल कोई पर्चा नजर नहीं आया। मेवाराम,सेवाराम,दाताराम,सियाराम,झुठाराम जैसे प्रत्याशी जरूर नजर आये। जब राम चुनाव लड़ ही नहीं रहे तो कोई उन्हें कैसे हरा सकता है?
                                    राम को समझना आसान भी है और कठिन भी। राम दीनबंधु भी हैं और दीनानाथ भी। वे अपराजेय भी है। दशानन भी उन्हें हरा नहीं पाया । परशुराम भी उनके सामने युद्ध करने के बजाय शीश नवकार वापस रंगभूमि छोड़ गए थे। राम से लड़ना किसी के बूते की बात है ही नही। कांग्रेस और समूचे विपक्ष की तो बिसात ही क्या है ? कांग्रेस में या किसी भी दल में [भाजपा में भी ] राम के सामने खड़े होने की कूबत किसी में भी नहीं है। हाँ रामनामी चादर ओढ़कर चुनाव लड़ने वालों से लड़ने और हारने की ताकत बहुतों में है। चुनावी जंग में कोई भी किसी का भी ‘राम नाम सत्य है ‘करने की ताकत और हैसियत रखता है भले ही उसके पास इलेक्टोरल बांड से मिला पैसा हो या न हो।हारा हुआ हर खिलाड़ी अंत में या तो अपनी माँ का नाम लेता है या राम का। छठवें चरण से ठीक पहले जो लोग राम का नाम ले रहे हैं वे सचमुच मन से हार चुके है। ऐसे मन से हारे हुए लोग आखिर में कह उठे हैं कि -‘ फलां साहब राम को हराना चाहते हैं। ‘राम के नाम पर मतदाता को बरगलाने की ये आखरी कोशिश है ,क्योंकि इसके बाद यदि मतदाता ने अपना मन बना लिया तो रामजी भी उसे नहीं बदल सकते ,हाँ ईवीएम है जो ये काम कर सकती है। शायद यही वजह है कि केंचुआ देश कि सबसे बड़ी अदालत में हलफनामा देकर कह रहा है कि यदि -मतदान केंद्र स्तर के आंकड़े जाहिर किये गए तो देश में अराजकता फ़ैल जाएगी। ‘मेरे अनुभव में ये झूठी सरकार के झूठे केंचुए का अब तक का बोलै गया सबसे बड़ा झूठ है।
                              इस देश में अराजकता आंकड़ों से नहीं अदावत कि सियासत से फ़ैल रही है । हिकारत की बोलियों से फ़ैल रही है । एक जाति विशेष को ,एक दल विशेष को हौवा बनाकर खड़ा करने से फ़ैल रही है। देश कि सबसे बड़ी अदालत इस झूठ का संज्ञान लेती है या नहीं ,मुझे नहीं पता। किन्तु देश इस झूठ का संज्ञान ले रहा है। सब जानते हैं कि मनुष्य निर्मित मशीने झूठ नहीं बोलतीं ,उनसे झूठ बुलवाया जाता है ,बुलवाया जा रहा है। मशीने आदमी की गुलाम है। वे चुनाव ही नहीं करतीं अब तो झाड़ू,पौंछा करने के साथ ही बर्तन भी धोतीं हैं। इसलिए मशीनों की और राम की आड़ लेकर न कोई जनाक्रोश से बच सकता है और न चुनाव की दशा और दिशा को मोड़ सकता है।अपनी कहूँ तो मै आज भी बिना राम का नाम लिए,बिना राम कथा का परायण किये बिना अन्न-जल ग्रहण नहीं करता ,हालाँकि मै आज तक न अयोध्या गया और न श्रीलंका। मुझे पीले चावल देकर भाजपा वालों ने बुलाया भी था ,किराया भी दे रही थी लेकिन मैं नहीं गया। अयोध्या जाना या न जाना आपके रामभक्त होने के लिए आवश्यक नहीं है। तमाम कांग्रसी,समाजवादी ,वामपंथी भी अभी तक अयोध्या नहीं गए। चारों शंकराचार्य नहीं गए तो इसका अर्थ ये तो नहीं है कि सबके सब रामद्रोही है। या अयोध्या न जाने वाले लोग राम के ठेकदार झुठाराम और उनकी पार्टी को वोट नहीं देंगे।इस चुनाव में झूठाराम को भी खूब वोट मिलेंगे लेकिन राम के नाम पर नहीं। जो वोट मिलेंगे वे हिन्दू-मुसलमान के नाम पर ,मंगलसूत्र के नाम पर ,भैंस के नाम पर मिलेंगे।तीन तलाक कानून या नारी शक्ति वंदना के नाम पर नहीं मिलेंगे। इसलिए जिन मतदाताओं को छठवें और सातवें चरण में मतदान का अवसर मिल रहा है वे इस गलतफमी का शिकार न हों कि झुठाराम के खिलाफ दिया उनका वोट राम के खिलाफ चला जाएगा। राम को आपके वोट कि जरूरत कभीं थी ही नहीं ,और न हैं न होगी। राम तो विरासत से ही राजाराम बने थे । उन्होंने मर्यादाएं स्वीकार की उन्हें तोड़ा नहीं। सत्ता के लिए तो बिलकुल नहीं तोड़ा। राम ने धनुष भी तोड़ा तो अपने गुरु की आज्ञा पर । यहां तो झुठाराम और उनकी पार्टी कह रही है कि हमें गुरु रुपी संस्था की जरूरत ही नहीं है। जय सियाराम।
@ राकेश अचल

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